भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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२५ सू० ] आकस्मिकत्वनिराकरणप्रकरणम् २८५ अनिमित्तनिमित्तत्वान्नानिमित्तः १ ॥ २३ ॥ अनिमित्ततो भावोत्पत्तिरित्युच्यते, यतश्चोत्पद्यते तन्निमित्तम् । अनिमित्तस्य निमित्तत्वान्नानिमित्ता भावोत्पत्तिरिति ॥ २३ ॥ निमित्तानिमित्तयोरर्थान्तरभावादप्रतिषेधः १ ॥ २४ ॥ अन्यद्धि निमित्तम्, अन्यच्च निमित्तप्रत्याख्यानम्, न च प्रत्याख्यानमेव प्रत्या- ख्येयम्, यथा—अनुदकः कमण्डुलुरिति नोदकप्रतिषेध उदकं भवतीति । स खल्वयं वादः 'अकर्मनिमित्तः शरीरादिसर्गः' (३. २. ७२) इत्येतस्मान्न भिद्यते, अभेदात् तत्प्रतिषेधेनैव प्रतिषिद्धो वेदितव्य इति ॥ २४ ॥ · सर्वानित्यत्वनिराकरणप्रकरणम् [ २५-२८ ] अन्ये तु मन्यन्ते— सर्वमनित्यम्; उत्पत्तिविनाशधर्मकत्वात् ? ॥ २५ ॥ किमनित्यं नाम ? यस्य कदाचिद् भावस्तदनित्यम् । उत्पत्तिधर्मकमनुत्पन्नं नास्ति, विनाशधर्मकं चाविनष्टं नास्ति । किं पुनः सर्वम् ? भौतिकं च शरीरादि, एकदेशी का उत्तर— अनिमित्त से निमित्त उत्पन्न होने से वह अनिमित्त नहीं रहा करता ॥ २३ ॥ अनिमित्त से भावों की उत्पत्ति आप बतलाते हैं, परन्तु जिससे उत्पत्ति हो वह तो निमित्त हो गया, यों उस अनिमित्त के निमित्त बन जाने से अब वह अनिमित्त कहाँ रहा ! ॥ २३ ॥ सिद्धान्तपक्ष— निमित्त तथा अनिमित्त में अर्थभेद होने से प्रतिषेध नहीं बनता ॥ २४ ॥ निमित्त दूसरा है, तथा निमित्त का प्रत्याख्यान आप दूसरा कर रहे हैं। निषेध ही निषेध्य नहीं होता। जैसे 'अनुदक कमण्डलु' में उदक का प्रतिषेध है तो क्या यह प्रति- षेध उदक हो जायेगा ! चार्वाक का यह आकस्मिकवाद भी पूर्व ( ३.२.७२ में ) वर्णित अकर्मनिमित्तक भूतसृष्टिवाद जैसा ही है, अतः समान होने से उस वाद की प्रतिषेधक युक्तियाँ इस वाद के प्रतिषेध में भी समझ लेनी चाहियें ॥ २४ ॥ दूसरे दार्शनिक यह मानते हैं— सभी प्रमेय उत्पत्तिविनाशधर्मा होने से अनित्य हैं ॥ २५ ॥ 'अनित्य' किसे कहते हैं ? जिस की सत्ता कभी हो कभी न हो, वह 'अनित्य' होता है। जो वस्तु उत्पत्तिशील है, तो वह अनुत्पन्न नहीं है तथा जो वस्तु विनाश- शील है वह अविनष्ट नहीं, अतः सब कुछ अनित्य है। यह 'सब' क्या है ? भौतिक १. सूत्रद्वयमिदं वार्त्तिककृताऽन्यथापि व्याख्यातमिति ध्येयम् । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri