भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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२८८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १ आ० न चोत्पत्तित्कारणोपलब्धिः शक्या प्रत्याख्यातुम्, न चाविषया काचिदुपलब्धिः । उपलब्धिसामर्थ्यात् कारणेन समानगुणं कार्यमुत्पद्यते-इत्यनुमीयते । स खलूपलब्धे- र्विषय इति । एवं च तल्लक्षणावरोधोपपत्तिरिति । उत्पत्तिविनाशकारणप्रयुक्तस्य ज्ञातुः प्रयत्नो दृष्ट इति । प्रसिद्धश्चावयवी तद्धर्मा । उत्पत्तिविनाशधर्मा चावयवी सिद्ध इति । शब्दकर्मबुद्ध्यादीनां चाव्याप्तिः । पञ्चभूतनित्यत्वात् तल्लक्षणावरोधाच्चे- त्यनेन शब्दकर्मबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्च न व्याप्ताः । तस्मादनेकान्तः । स्वप्नविषयाभिमानवत् मिथ्योपलब्धिरिति चेत् ? भूतोपलब्धौ तुल्यम् । यथा स्वप्ने विषयाभिमानः, एवमुत्पत्तिकारणाभिमान इति । एवं चैतद् भूतोपलब्धौ तुल्यम्-पृथिव्याद्युपलब्धिरपि स्वप्नविषयाभिमानवत् प्रसज्यते । पृथिव्याद्यभावे सर्वव्यवहारविलोप इति चेत् ? तदितरत्र समानम् । होते हैं और यह उत्पत्तिकारण तथा कार्यों की उपलब्धि नित्य की नहीं होती । उधर उन गोघटादि की उत्पत्ति तथा उस उत्पत्ति का कारण किसी भी प्रमाण से प्रत्याख्यात नहीं हो सकता; न तो किसी की उपलब्धि निर्विषयक हुआ करती है, अतः उपलब्धि- सामर्थ्य से 'कारण से समानगुण कार्य उत्पन्न होता है'—ऐसा अनुमान होता है । वही (गोघटादि) उत्पन्न कार्य उपलब्धि का विषय है । इस प्रकार भूतों के कार्य (गोघटादि) में भूतों का नित्यत्वलक्षण अवरुद्ध हो जाता है । उत्पत्ति तथा विनाश के कारणों को लेकर ही लोक में पुरुषों के प्रयत्न देखे जाते हैं, यदि सभी द्रव्य नित्य हों तो इन प्रेक्षावान् पुरुषों के प्रयत्न निष्फल ही होंगे । अव- यवी अवयवधर्म ( उत्पत्तिविनाश ) वाला होता है । अवयवी उत्पत्ति-विनाशशील है— यह सभी जानते हैं । अथ च, 'पञ्चभूतों के नित्य होने के कारण भूतोत्पन्न द्रव्यों के भूतलक्षणाक्रान्त होने से सब कुछ नित्य हैं'—ऐसा लक्षण मानोगे तो शब्द, कर्म, बुद्धि आदि में अव्याप्ति होने लगेगी, क्योंकि ये पञ्चभूतात्मक नहीं हैं वे पञ्चभूतोत्पन्न हैं परन्तु वे तल्लक्षणा- क्रान्त भी नहीं हैं । इस रीति से इन दार्शनिकों का सर्वनित्यत्ववाद भी अनेकान्त ( अव्यापक ) है । यदि यह कहें कि उक्त उत्पत्तिविनाशकारणोपलब्धि स्वप्नविषय की तरह मिथ्या है ? तो यह मिथ्यात्व भूतोपलब्धि में भी समान है। जैसे स्वप्न में विषय मिथ्या उपलब्ध होता है, उसी तरह उत्पत्तिकारण भी मिथ्या है—ऐसा नहीं कह सकते; क्योंकि यह बात भूतोपलब्धि में भी तुल्य ही है, अर्थात् तब पृथिव्यादि-भूताद्युपलब्धि भी स्वप्नविषय- वत् मिथ्या ही होगी । पृथिव्यादि भूतों की उपलब्धि को मिथ्या मानोगे तो समग्र जगद्व्यवहार भी विलुप्त