भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 338, कुल 410 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 338

३२० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० प्रासङ्गिकम् अवयविप्रकरणम् [ ४-१७ ] अथेदानीमर्थं निराकरिष्यताऽवयव्युपपाद्यते— विद्याऽविद्याद्वैविध्यात् संशयः ? ॥ ४ ॥ सदसतोरुपलम्भाद्विद्या द्विविधा, सदसतोरनुपलम्भादविद्यापि द्विविधा । उप- लभ्यमानेऽवयविनि विद्याद्वैविध्यात् संशयः, अनुपलभ्यमाने चाविद्याद्वैविध्यात् संशयः । सोऽयमवयवी यद्युपलभ्यते, अथापि नोपलभ्यते—न कथञ्चन संशयान्मु- च्यते इति ? ॥ ४ ॥ तदसंशयः; पूर्वहेतुप्रसिद्धत्वात् ॥ ५ ॥ तस्मिन्ननुपपन्नः संशयः । कस्मात् ? पूर्वोक्तहेतूनामप्रतिषेधादस्ति द्रव्या- न्तरारंभ इति ॥ ५ ॥ वृत्त्यनुपपत्तेरपि तर्हि न संशयः ? ॥ ६ ॥ संशयानुपपत्तिर्नास्त्यवयवीति ? ॥ ६ ॥ तद्विभजते— पूर्वोक्त निमित्त-अनुव्यञ्जन संज्ञाओं का अवयवी ही विषय है, उन संज्ञाओं में से कतिपय के परिवर्जन के लिये 'अशुभ संज्ञा' का उपदेश किया गया । अब विज्ञानवादी बौद्ध के मत में जब अर्थमात्र नहीं है तो अवयवी तथा तदाश्रित उक्त संज्ञाएँ कहाँ होंगी ! अतः वह अर्थ का खण्डन करना चाहता हुआ पहले अवयवी का निराकरण कर रहा है— विद्या, अविद्या के द्वैविध्य से संशय होता है ? ॥ ४ ॥ सत्, असत् की उपलब्धि से विद्या दो प्रकार की है। सत्, असत् की अनुपलब्धि से अविद्या भी दो प्रकार की है। अवयवी के उपलब्ध होने पर विद्याद्वैविध्य से संशय होता है ! तथा उसके अनुपलब्ध रहने पर अविद्याद्वैविध्य से भी संशय होगा । इस तरह यह अवयवी भले ही उपलब्ध होता हो या न उपलब्ध होता हो—किसी भी तरह संशय से मुक्त नहीं होता ॥ ४ ॥ पूर्व हेतु की सिद्धि से संशय उपपन्न नहीं है ॥ ५ ॥ उस अवयवी में संशय नहीं है; क्योंकि पूर्वोक्त हेतुओं से अवयवी के बारे में सिद्धि की जा चुकी है कि अवयवी द्रव्यान्तर से आरब्ध होता है। ऐसा सिद्ध हो जाने के बाद उसमें संशय क्यों होगा ! ॥ ५ ॥ (हमारा भी यही कहना है कि) सत्तानुपपत्ति से भी उसमें संशय नहीं है ? ॥ ६ ॥ विज्ञानवादी ( बौद्ध ) प्रतिबन्दी उत्तर देता है—हमारा भी यही कहना है कि वहाँ संशय नहीं होता; क्योंकि अवयवी की सत्ता ही सिद्ध नहीं होती ? ॥ ६ ॥ इसी का वह (विज्ञानवादी) उपपादन करता है—