न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 337, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें३. सू० ] तत्त्वज्ञानोत्पत्तिप्रकरणम् ३१९ अतः परं काचित्संज्ञा हेया, काचिद्भावयितव्येत्युपदिश्यते, नार्थनिराकरणम्, अर्थोपादानं वा । कथमिति ? तन्निमित्तं त्ववयव्यभिमानः ॥ ३ ॥ तेषां दोषाणां निमित्तं त्ववयव्यभिमानः । सा च खलु स्त्रीसंज्ञा सपरिष्कारा पुरुषस्य, पुरुषसंज्ञा च स्त्रियाः । परिष्कारश्च निमित्तसंज्ञा, अनुव्यञ्जनसंज्ञा च । निमित्तसंज्ञा—रसनाश्रोत्रम्, दन्तोष्ठम्, चक्षुर्नासिकम् । अनुव्यञ्जनसंज्ञा-इत्थं दन्तौ इत्थमोष्ठाविति । सेयं संज्ञा कामं वर्धयति, तदनुषक्तांश्च दोषान् विवर्ज- नीयान् । वर्जनं त्वस्या भेदेनावयवसंज्ञा केशलोममांसशोणितास्थिस्नायुशिरा- कफपित्तोच्चारादिसंज्ञा, तामशुभसंज्ञेत्याचक्षते । तामस्य भावयतः कामरागः प्रहीयते । सत्येव च द्विविधे विषये काचित्संज्ञा भावनीया, काचित्परिवर्जनीयेत्यु- पदिश्यते, यथा विषसम्पृक्तेऽन्नेऽन्नसंज्ञोपादानाय, विषसंज्ञा प्रहाणायेति ॥ ३ ॥ अब इससे आगे 'कौन सी बात छोड़नी चाहिए, किस का ग्रहण करना चाहिए'— इसी का उपदेश किया जा रहा है। न कि उसका सर्वांशतः ग्रहण या त्याग अपेक्षित है। कैसे ?— अवयवी (कामिनी-शरीरादि) का अभिमान ही दोषों का कारण है ॥ ३ ॥ उन दोषों का कारण है अवयव्यभिमान । जैसे पुरुष को स्त्रीविषय में 'सुन्दर स्त्री' यह भावना राग का कारण होती है, तथा स्त्री की पुरुष के विषय में 'सुन्दर पुरुष' यह भावना राग का कारण होती है । संज्ञा के दो भेद होते हैं— १. निमित्त, २. अनुव्यञ्जन । जैसे—उसके कान, दांत, आँख नाक को लेकर सम्मुग्ध की तरह भावना निमित्त है; तथा 'इसके ऐसे सुन्दर दांत है, ऐसे सुन्दर ओठ हैं'—इत्यादि भावना अनुव्यञ्जन है। यह कामुक- भावना वासना को बढ़ाती है तथा तदनुषक्त विवर्जनीय दोषों को भी बढ़ावा देती है। इस भावना का परिहार अवयवभावना से होता है। अर्थात् स्त्री-विषयक आसक्ति को हटाने के लिए उस स्त्री के अवयवों के वारे में जिज्ञासु तत्त्वतः सोचे कि यह समग्र शरीर तो केश, रोम, मांस, रक्त, अस्थि, स्नायु, शिरा, कफ-पित्त, मल-मूत्र से भरा पड़ा है, इसमें कौन सी अच्छी चीज है, जिसके लिए मेरी इतनी अधिक आसक्ति हो ! इन अवयवों पर इस रूप से विचार को 'अशुभसंज्ञा' भी कह देते हैं। इस प्रकार उक्त साधक का कामज राग क्षीण हो जाता है । इस तरह विषय के शुभ-अशुभ रूप से दो भेद दिखाते हुए उक्त कामिनी- शरीरादि में कोई संज्ञा (निमित्त संज्ञा, तथा अनुव्यञ्जन संज्ञा) छोड़ने के लिए तथा किसी संज्ञा (अवयव संज्ञा या अशुभ संज्ञा) का ग्रहण (भावना) करने के लिए उपदेश देते हैं । जैसे विषसम्पृक्त अन्न में 'अन्न' संज्ञा ग्रहण के लिए होती है, तथा 'विष' संज्ञा त्याग के लिए होती है ॥ ३ ॥