भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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३१८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० विभक्तमासेवमानस्याभ्यस्यतो भावयतः सम्यग्दर्शनं यथाभूतावबोधस्तत्त्वज्ञान- मुत्पद्यते । एवं च— दोषनिमित्तानां तत्त्वज्ञानादहङ्कारनिवृत्तिः ॥ १ ॥ शरीरादि दुःखान्तं प्रमेयं दोषनिमित्तम्; तद्विषयत्वान्मिथ्याज्ञानस्य । तदिदं तत्त्वज्ञानं तद्विषयमुत्पन्नमहङ्कारं निवर्त्तयति; समानविषये तयोर्विरोधात् । एवं तत्त्वज्ञानाद् 'दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायाद- पवर्गः' (१.१.२) इति । स चायं शास्त्रार्थसङ्ग्रहोऽनूद्यते, नापूर्वो विधीयते इति ॥१॥ प्रसंख्यानानुपूर्वी तु खलु— दोषनिमित्तं रूपादयो विषयाः १सङ्कल्पकृताः ॥ २ ॥ कामविषया इन्द्रियार्था इति रूपादय उच्यन्ते, ते मिथ्यासङ्कल्प्यमाना रागद्वेषमोहान् प्रवर्त्तयन्ति, तान् पूर्वं प्रसञ्चक्षीत । तांश्च प्रसञ्चक्षाणस्य रूपादि- विषयो मिथ्यासङ्कल्पो निवर्त्तते । तन्निवृत्तावध्यात्मं शरीरादि प्रसञ्चक्षीत । तत्प्रसंख्यानादध्यात्मविषयोऽहङ्कारो निवर्त्तते । सोऽयमध्यात्मं वहिश्च विविक्त- चित्तो विहरन्मुक्त इत्युच्यते ॥ २ ॥ बार-बार मनन भावना करने वाले को सम्यग्दर्शन, याथातथ्य ज्ञान अर्थात् तत्त्वज्ञान हो जाता है । और इस तरह— दोषनिमित्त शरीरादि के तत्त्वज्ञान से अहङ्कार निवृत्त हो जाता है ॥ १ ॥ शरीर से लेकर दुःख तक प्रमेय दोष का हेतु है, क्योंकि मिथ्याज्ञान तद्विषयक होता है । तद्विषयक तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता हुआ अहङ्कार को निवृत्त करता है; क्योंकि समान- विषय में उन दोनों तत्त्व एवं मिथ्या ज्ञानों का विरोध है। इस प्रकार तत्त्वज्ञान से 'दुःख, जन्म, प्रवृत्ति, दोष, मिथ्या ज्ञानों के उत्तरोत्तर अपाय से उससे पूर्व-पूर्व के न होने से अप- वर्ग हो जाता हैं' (१. १. २) । यहाँ यह शास्त्रार्थसंग्रह तत्रोक्त तत्त्वज्ञान का उत्पत्ति प्रकार दिखाने के लिए उक्त सूत्र का अनुवाद ही है कोई अपूर्व विषय नहीं उठाया गया है ॥ १ ॥ ( इस समाधिज ) तत्त्वज्ञान् का क्रम यह है— सङ्कल्पकृत रूपादि विषय दोषों के कारण होते हैं ॥ २ ॥ इन्द्रियों के अर्थ रूपादि कामविषय हैं । वे मिथ्या संकल्पित किये जाते हुए राग द्वेष मोह को प्रवृत्तित करते हैं । जिज्ञासु पहले उनका तत्त्वज्ञान करें । उनका तत्त्वज्ञान होने पर तत्त्ववेत्ता का रूपादिविषयक मिथ्यासंकल्प निवृत्त हो जाता है । उनके निवृत्त होने पर वह अध्यात्म शरीरेन्द्रियादि का तत्त्व जानने का प्रयास करे । उसके तत्त्वज्ञान से अध्यात्मविषयक अहङ्कार निवृत्त हो जाता है । इस प्रकार रूपादि विषय तथा शरीरादि को तत्त्वतः जानकर यह ज्ञानी रागद्वेषादि से विमुक्तचित्त होकर लोकयात्रा करता हुआ भी 'मुक्त' कहलाता है ॥ २ ॥ १. 'सङ्कल्पः = समीचीनोऽयमिति मानसं' इति वार्त्तिककृतः ।