न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
३१८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० विभक्तमासेवमानस्याभ्यस्यतो भावयतः सम्यग्दर्शनं यथाभूतावबोधस्तत्त्वज्ञान- मुत्पद्यते । एवं च— दोषनिमित्तानां तत्त्वज्ञानादहङ्कारनिवृत्तिः ॥ १ ॥ शरीरादि दुःखान्तं प्रमेयं दोषनिमित्तम्; तद्विषयत्वान्मिथ्याज्ञानस्य । तदिदं तत्त्वज्ञानं तद्विषयमुत्पन्नमहङ्कारं निवर्त्तयति; समानविषये तयोर्विरोधात् । एवं तत्त्वज्ञानाद् 'दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायाद- पवर्गः' (१.१.२) इति । स चायं शास्त्रार्थसङ्ग्रहोऽनूद्यते, नापूर्वो विधीयते इति ॥१॥ प्रसंख्यानानुपूर्वी तु खलु— दोषनिमित्तं रूपादयो विषयाः १सङ्कल्पकृताः ॥ २ ॥ कामविषया इन्द्रियार्था इति रूपादय उच्यन्ते, ते मिथ्यासङ्कल्प्यमाना रागद्वेषमोहान् प्रवर्त्तयन्ति, तान् पूर्वं प्रसञ्चक्षीत । तांश्च प्रसञ्चक्षाणस्य रूपादि- विषयो मिथ्यासङ्कल्पो निवर्त्तते । तन्निवृत्तावध्यात्मं शरीरादि प्रसञ्चक्षीत । तत्प्रसंख्यानादध्यात्मविषयोऽहङ्कारो निवर्त्तते । सोऽयमध्यात्मं वहिश्च विविक्त- चित्तो विहरन्मुक्त इत्युच्यते ॥ २ ॥ बार-बार मनन भावना करने वाले को सम्यग्दर्शन, याथातथ्य ज्ञान अर्थात् तत्त्वज्ञान हो जाता है । और इस तरह— दोषनिमित्त शरीरादि के तत्त्वज्ञान से अहङ्कार निवृत्त हो जाता है ॥ १ ॥ शरीर से लेकर दुःख तक प्रमेय दोष का हेतु है, क्योंकि मिथ्याज्ञान तद्विषयक होता है । तद्विषयक तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता हुआ अहङ्कार को निवृत्त करता है; क्योंकि समान- विषय में उन दोनों तत्त्व एवं मिथ्या ज्ञानों का विरोध है। इस प्रकार तत्त्वज्ञान से 'दुःख, जन्म, प्रवृत्ति, दोष, मिथ्या ज्ञानों के उत्तरोत्तर अपाय से उससे पूर्व-पूर्व के न होने से अप- वर्ग हो जाता हैं' (१. १. २) । यहाँ यह शास्त्रार्थसंग्रह तत्रोक्त तत्त्वज्ञान का उत्पत्ति प्रकार दिखाने के लिए उक्त सूत्र का अनुवाद ही है कोई अपूर्व विषय नहीं उठाया गया है ॥ १ ॥ ( इस समाधिज ) तत्त्वज्ञान् का क्रम यह है— सङ्कल्पकृत रूपादि विषय दोषों के कारण होते हैं ॥ २ ॥ इन्द्रियों के अर्थ रूपादि कामविषय हैं । वे मिथ्या संकल्पित किये जाते हुए राग द्वेष मोह को प्रवृत्तित करते हैं । जिज्ञासु पहले उनका तत्त्वज्ञान करें । उनका तत्त्वज्ञान होने पर तत्त्ववेत्ता का रूपादिविषयक मिथ्यासंकल्प निवृत्त हो जाता है । उनके निवृत्त होने पर वह अध्यात्म शरीरेन्द्रियादि का तत्त्व जानने का प्रयास करे । उसके तत्त्वज्ञान से अध्यात्मविषयक अहङ्कार निवृत्त हो जाता है । इस प्रकार रूपादि विषय तथा शरीरादि को तत्त्वतः जानकर यह ज्ञानी रागद्वेषादि से विमुक्तचित्त होकर लोकयात्रा करता हुआ भी 'मुक्त' कहलाता है ॥ २ ॥ १. 'सङ्कल्पः = समीचीनोऽयमिति मानसं' इति वार्त्तिककृतः ।
३. सू० ] तत्त्वज्ञानोत्पत्तिप्रकरणम् ३१९
३. सू० ] तत्त्वज्ञानोत्पत्तिप्रकरणम् ३१९ अतः परं काचित्संज्ञा हेया, काचिद्भावयितव्येत्युपदिश्यते, नार्थनिराकरणम्, अर्थोपादानं वा । कथमिति ? तन्निमित्तं त्ववयव्यभिमानः ॥ ३ ॥ तेषां दोषाणां निमित्तं त्ववयव्यभिमानः । सा च खलु स्त्रीसंज्ञा सपरिष्कारा पुरुषस्य, पुरुषसंज्ञा च स्त्रियाः । परिष्कारश्च निमित्तसंज्ञा, अनुव्यञ्जनसंज्ञा च । निमित्तसंज्ञा—रसनाश्रोत्रम्, दन्तोष्ठम्, चक्षुर्नासिकम् । अनुव्यञ्जनसंज्ञा-इत्थं दन्तौ इत्थमोष्ठाविति । सेयं संज्ञा कामं वर्धयति, तदनुषक्तांश्च दोषान् विवर्ज- नीयान् । वर्जनं त्वस्या भेदेनावयवसंज्ञा केशलोममांसशोणितास्थिस्नायुशिरा- कफपित्तोच्चारादिसंज्ञा, तामशुभसंज्ञेत्याचक्षते । तामस्य भावयतः कामरागः प्रहीयते । सत्येव च द्विविधे विषये काचित्संज्ञा भावनीया, काचित्परिवर्जनीयेत्यु- पदिश्यते, यथा विषसम्पृक्तेऽन्नेऽन्नसंज्ञोपादानाय, विषसंज्ञा प्रहाणायेति ॥ ३ ॥ अब इससे आगे 'कौन सी बात छोड़नी चाहिए, किस का ग्रहण करना चाहिए'— इसी का उपदेश किया जा रहा है। न कि उसका सर्वांशतः ग्रहण या त्याग अपेक्षित है। कैसे ?— अवयवी (कामिनी-शरीरादि) का अभिमान ही दोषों का कारण है ॥ ३ ॥ उन दोषों का कारण है अवयव्यभिमान । जैसे पुरुष को स्त्रीविषय में 'सुन्दर स्त्री' यह भावना राग का कारण होती है, तथा स्त्री की पुरुष के विषय में 'सुन्दर पुरुष' यह भावना राग का कारण होती है । संज्ञा के दो भेद होते हैं— १. निमित्त, २. अनुव्यञ्जन । जैसे—उसके कान, दांत, आँख नाक को लेकर सम्मुग्ध की तरह भावना निमित्त है; तथा 'इसके ऐसे सुन्दर दांत है, ऐसे सुन्दर ओठ हैं'—इत्यादि भावना अनुव्यञ्जन है। यह कामुक- भावना वासना को बढ़ाती है तथा तदनुषक्त विवर्जनीय दोषों को भी बढ़ावा देती है। इस भावना का परिहार अवयवभावना से होता है। अर्थात् स्त्री-विषयक आसक्ति को हटाने के लिए उस स्त्री के अवयवों के वारे में जिज्ञासु तत्त्वतः सोचे कि यह समग्र शरीर तो केश, रोम, मांस, रक्त, अस्थि, स्नायु, शिरा, कफ-पित्त, मल-मूत्र से भरा पड़ा है, इसमें कौन सी अच्छी चीज है, जिसके लिए मेरी इतनी अधिक आसक्ति हो ! इन अवयवों पर इस रूप से विचार को 'अशुभसंज्ञा' भी कह देते हैं। इस प्रकार उक्त साधक का कामज राग क्षीण हो जाता है । इस तरह विषय के शुभ-अशुभ रूप से दो भेद दिखाते हुए उक्त कामिनी- शरीरादि में कोई संज्ञा (निमित्त संज्ञा, तथा अनुव्यञ्जन संज्ञा) छोड़ने के लिए तथा किसी संज्ञा (अवयव संज्ञा या अशुभ संज्ञा) का ग्रहण (भावना) करने के लिए उपदेश देते हैं । जैसे विषसम्पृक्त अन्न में 'अन्न' संज्ञा ग्रहण के लिए होती है, तथा 'विष' संज्ञा त्याग के लिए होती है ॥ ३ ॥
प्रासङ्गिकम् अवयविप्रकरणम् [ ४-१७ ]
३२० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० प्रासङ्गिकम् अवयविप्रकरणम् [ ४-१७ ] अथेदानीमर्थं निराकरिष्यताऽवयव्युपपाद्यते— विद्याऽविद्याद्वैविध्यात् संशयः ? ॥ ४ ॥ सदसतोरुपलम्भाद्विद्या द्विविधा, सदसतोरनुपलम्भादविद्यापि द्विविधा । उप- लभ्यमानेऽवयविनि विद्याद्वैविध्यात् संशयः, अनुपलभ्यमाने चाविद्याद्वैविध्यात् संशयः । सोऽयमवयवी यद्युपलभ्यते, अथापि नोपलभ्यते—न कथञ्चन संशयान्मु- च्यते इति ? ॥ ४ ॥ तदसंशयः; पूर्वहेतुप्रसिद्धत्वात् ॥ ५ ॥ तस्मिन्ननुपपन्नः संशयः । कस्मात् ? पूर्वोक्तहेतूनामप्रतिषेधादस्ति द्रव्या- न्तरारंभ इति ॥ ५ ॥ वृत्त्यनुपपत्तेरपि तर्हि न संशयः ? ॥ ६ ॥ संशयानुपपत्तिर्नास्त्यवयवीति ? ॥ ६ ॥ तद्विभजते— पूर्वोक्त निमित्त-अनुव्यञ्जन संज्ञाओं का अवयवी ही विषय है, उन संज्ञाओं में से कतिपय के परिवर्जन के लिये 'अशुभ संज्ञा' का उपदेश किया गया । अब विज्ञानवादी बौद्ध के मत में जब अर्थमात्र नहीं है तो अवयवी तथा तदाश्रित उक्त संज्ञाएँ कहाँ होंगी ! अतः वह अर्थ का खण्डन करना चाहता हुआ पहले अवयवी का निराकरण कर रहा है— विद्या, अविद्या के द्वैविध्य से संशय होता है ? ॥ ४ ॥ सत्, असत् की उपलब्धि से विद्या दो प्रकार की है। सत्, असत् की अनुपलब्धि से अविद्या भी दो प्रकार की है। अवयवी के उपलब्ध होने पर विद्याद्वैविध्य से संशय होता है ! तथा उसके अनुपलब्ध रहने पर अविद्याद्वैविध्य से भी संशय होगा । इस तरह यह अवयवी भले ही उपलब्ध होता हो या न उपलब्ध होता हो—किसी भी तरह संशय से मुक्त नहीं होता ॥ ४ ॥ पूर्व हेतु की सिद्धि से संशय उपपन्न नहीं है ॥ ५ ॥ उस अवयवी में संशय नहीं है; क्योंकि पूर्वोक्त हेतुओं से अवयवी के बारे में सिद्धि की जा चुकी है कि अवयवी द्रव्यान्तर से आरब्ध होता है। ऐसा सिद्ध हो जाने के बाद उसमें संशय क्यों होगा ! ॥ ५ ॥ (हमारा भी यही कहना है कि) सत्तानुपपत्ति से भी उसमें संशय नहीं है ? ॥ ६ ॥ विज्ञानवादी ( बौद्ध ) प्रतिबन्दी उत्तर देता है—हमारा भी यही कहना है कि वहाँ संशय नहीं होता; क्योंकि अवयवी की सत्ता ही सिद्ध नहीं होती ? ॥ ६ ॥ इसी का वह (विज्ञानवादी) उपपादन करता है—
९. सू० ] अवयविप्रकरणम् ३२१
९. सू० ] अवयविप्रकरणम् ३२१ कृत्स्नैकदेशावृत्तित्वादवयवानामनवयव्यभावः ? ॥ ७ ॥ एकैकोऽवयवो न तावत् कृत्स्नेऽवयविनि वर्त्तते; तयोः परिमाणभेदात्, अवय- वान्तरसम्बन्धाभावप्रसङ्गाच्च । नाप्यवयव्येकदेशेन, न ह्यस्यान्ये अवयवा एक- देशभूताः सन्तोति ? ॥ ७ ॥ अथावयवेष्वेवावयवी वर्त्तते ? तेषु चावृत्तेरवयव्यभावः ? ॥ ८ ॥ न तावत् प्रत्यवयवं वर्त्तते, तयोः परिमाणभेदाद्, द्रव्यस्य चैकद्रव्यत्वप्रसङ्गात् । नाप्येकदेशेन, सर्वेषु अन्यावयवाभावात् । तदेवं न युक्तः संशयः—नास्त्यव- यवोति ? ॥ ८ ॥ पृथक् चावयवेभ्योऽवृत्तेः ॥ ९ ॥ अवयव्यभाव इति वर्त्तते । न चायं पृथगवयवेभ्यो वर्त्तते; अग्रहणात्, नित्यत्व- प्रसंगाच्च । तस्मान्नास्त्यवयवीति ? ॥ ९ ॥ अवयवों के सम्पूर्ण या एकदेश में अवयवों के न रहने से उसकी सिद्धि नहीं होती ? ॥ ७ ॥ एक एक अवयव समग्र अवयवी में नहीं रहता; क्योंकि उन दोनों में परिमाणभेद हैं (अवयव अणुपरिमाण तथा अवयवी महापरिमाण हैं), तथा वैसी स्थिति में अवयवा- न्तर का उससे सम्बन्ध भी न बन पायेगा । और न अवयव उसके एकदेश में ही रहता है; क्योंकि अवयवों को छोड़ कर इसका कोई अन्य एकदेश नहीं है। यदि सब अवयव ही अवयवी हैं इस स्थिति में जितने अवयव हैं उतने ही अवयवी होने लगेंगे; जबकि आप अवयवी को एक मानते हैं ? ॥ ७ ॥ तो अवयवों में अवयवी रहता है—ऐसा मान लें ? उन अवयवों में अवयवी के वर्त्तमानत्व की अनुपपत्ति से अवयवी का अभाव ही है ? ॥ ८ ॥ पूर्वोक्त परिमाणभेद होने से अवयवी प्रत्येक अवयव में नहीं रह सकता; तथा एकावयववृत्ति होने से एक द्रव्य में एकसमवेत द्रव्यत्वप्रसक्ति होने लगेगी। अवयवी अपने एकदेश से प्रत्येक अवयव में नहीं रह सकता; क्योंकि सभी अवयवों में अन्य अवयव का अभाव ही है। अतः इसमें आप सन्देह क्यों कर रहे हैं कि अवयवी नहीं है ? ॥ ८ ॥ अवयव से पृथक् उसकी सत्ता न होने के कारण भी ? ॥ ९ ॥ अवयवी का अभाव ही है। अवयवी अवयवों से पृथक् नहीं हैं, क्योंकि वैसा गृहीत नहीं होता। अथ च, उसे पृथक् मानने पर उसके निराधार होने से उसमें नित्यत्व प्राप्त होगा। अतः अवयवी नहीं है—यही मान लें ? ॥ ९ ॥ न्या० दर्श० २१
३२२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० न चावयव्यवयवाः ? ॥ १० ॥ न चावयवानां धर्मोऽवयवी । कस्मात् ? धर्ममात्रस्य धर्मिभिरवयवैः पूर्ववत् सम्बन्धानुपपत्तेः । पृथक् चावयवेभ्यो धर्मिभ्यो धर्मस्याग्रहणादिति समानम् ॥ १० ॥ एकस्मिन् भेदाभावाद् भेदशब्दप्रयोगानुपपत्तेरप्रश्नः ॥ ११ ॥ किं प्रत्यवयवं कृत्स्नोऽवयवी वर्त्तते, अथैकदेशेन ? इति नोपपद्यते प्रश्नः । कस्मात् ? एकस्मिन् भेदाभावाद् भेदशब्दप्रयोगानुपपत्तेः । 'कृत्स्नम्' इत्यनेकस्या- शेषाभिधानम्, 'एकदेशः' इति नानात्वे कस्यचिदभिधानम्—ताविमौ कृत्स्नैक- देशशब्दौ भेदविषयौ नैकस्मिन्नवयविन्युपपद्येते; भेदाभावादिति ॥ ११ ॥ 'अन्यावयवाभावान्नैकदेशेन वर्त्तते' इत्यहेतुः अवयवान्तरभावेऽप्यवृत्तेरहेतुः ॥ १२ ॥ अवयवान्तरभावादिति । यद्यप्येकदेशोऽवयवान्तरभूतः स्यात्, तथाप्यवयवे- ऽवयवान्तरं वर्त्तत नावयवीति । अन्योऽवयवीति अन्यावयवभावेऽप्यवृत्तेर- 'अवयवों का धर्ममात्र हो अवयवी हैं'—यह मत भी युक्त नहीं ? ॥ १० ॥ 'अवयवों का धर्म' भी अवयवी नहीं है; क्योंकि धर्ममात्र अवयवी का धर्मी अवयवों से किसी भी तरह पूर्ववत् कोई सम्बन्ध नहीं बन सकता । और धर्मी अवयवों से धर्म का पृथक् ग्रहण नहीं हुआ करता, अन्यथा वह नित्य होने लगेगा ? ॥ १० ॥ सिद्धान्ती उत्तर देता है— एक अवयवी में भेद न होने के कारण 'भेद' शब्द प्रयोग अयुक्त होने से आपका प्रश्न नहीं बनता ॥ ११ ॥ 'क्या प्रत्येक अवयव में अवयवी रहता है, या एकदेश में ?' यह प्रश्न उचित नहीं; क्योंकि एक में भेद न होने से भेद ( पार्थक्य ) वाचक शब्द का प्रयोग अनुचित है । क्योंकि 'कृत्स्न' ( समग्र )—यह अनेक होते हुए अशेष का बोधन करता है, 'एकदेश' यह भी अनेक में एक का बोधन करता है । अर्थात् ये 'कृत्स्न' तथा 'एकदेश' शब्द भिन्न वस्तु के बोधक हैं, अतः एक अवयवी में उपपन्न नहीं होते; क्योंकि उनमें भेद नहीं है ॥ ११ ॥ 'परिमाण भेद होने के कारण अवयवी में अवयव न रहने से अवयवान्तर भी न होने से अवयवी एकदेश में नहीं रहता'—यह भी अहेतु है । अवयवान्तर होने पर भी उसमें अवयवी के न रहने से वह अहेतु है ॥ १२ ॥ अवयवान्तर होने से । यद्यपि अवयवी एकदेशेन अवयवान्तर में रह सकता है तो भी अवयव में अवयवान्तर ही रहेगा, अवयवी नहीं । 'अवयवी अन्य है, अवयव अन्य, अतः वह अवयवों से गृहीत नहीं होता, यों अन्यावयव न होने से वह एकदेश से गृहीत नहीं
१३. सू० ] अवयविप्रकरणम् ३२३
१३. सू० ] अवयविप्रकरणम् ३२३ वयविनो नैकदेशेन वृत्तिरन्यावयवाभावादित्यहेतुः । वृत्तिः कथमिति चेत् ? एकस्यानेकत्राश्रयाश्रितसम्बन्धलक्षणा प्राप्तिः । आश्रयाश्रितभावः कथमिति चेत् ? यस्य यतोऽन्यत्रात्मलाभानुपपत्तिः स आश्रयः । न कारणद्रव्येभ्योऽन्यत्र कार्यद्रव्यमात्मानं लभते, विपर्ययस्तु कारणद्रव्येष्विति । नित्येषु कथमिति चेत् ? अनित्येषु दर्शनात् सिद्धम् । नित्येषु द्रव्येषु कथमाश्रयाश्रयिभाव इति चेत् ? अनित्येषु द्रव्यगुणेषु दर्शनादाश्रयाश्रितभावस्य, नित्येषु सिद्धिरिति । तस्माद- वयव्यभिमानः प्रतिषिद्ध्यते निःश्रेयसकामस्य, नावयवी; यथा-रूपादिषु मिथ्या- सङ्कल्पः, न रूपादय इति ॥ १२ ॥ सर्वाग्रहणमवयव्यसिद्धेः ( २.१.३५ ) इति प्रत्यवस्थितोऽप्येतदाह— केशसमूहे तैमिरिकोपलब्धिवत् तदुपलब्धिः ? ॥ १३ ॥ यथैकैकः केशस्तैमिरिकेण नोपलभ्यते, केशसमूहस्तूपलभ्यते, तथैकैकोऽणुर्नो- पलभ्यते, अणुसञ्चयस्तूपलभ्यते । तदिदमणुसमूहविषयं ग्रहणमिति ? ॥ १३ ॥ होता' यह अहेतु ही है ! अवयवों में यह अवयवी की वृत्ति कैसे है ? एक ( अवयवी ) की अनेक ( अवयवों ) में आश्रयाश्रित सम्बन्ध ( समवायसम्बन्ध ) से प्राप्तिवृत्ति । आश्रयाश्रित सम्बन्ध क्या है ? जिसकी जिससे अन्यत्र सत्ता न मिल पाये वह 'आश्रय' है । कारणद्रव्यों से अन्यत्र कार्यद्रव्य की सत्ता नहीं मिलती, अतः कारण कार्यद्रव्य का आश्रय है । इसके विपरीत, कारणद्रव्य ( मृत्तिकादि ) कार्यद्रव्य के अतिरिक्त कुम्भकार के घर में भी मिल सकता है, अतः वह कार्यद्रव्य का आश्रित नहीं । नित्य पदार्थों में यह व्यवस्था कैसे बैठाओगे ? अनित्य ( द्रव्यगुणों ) में यह आश्रयाश्रितभाव देखा जाने से नित्यों में भी उसका अनुमान कर लेंगे । अतः मुमुक्षु के लिये अवयव्यभिमान निषिद्ध बताया है, अवयवी नहीं; जैसे रूपादि में मिथ्यासङ्कल्प निषिद्ध किया है, न कि रूपादि ॥ १२ ॥ ‘अवयवी को न मानोगे तो समग्र द्रव्य का ग्रहण न होगा'—( २.१.३५ ) इस प्रक- रण में हम इस शून्यवादी की युक्तियाँ निरस्त कर चुके हैं, अब फिर बात आ पड़ी तो घुमा फिरा कर वह वही युक्तियाँ दे रहा है— तिमिररोगग्रस्त रोगी को केशसमूह की उपलब्धि के समान ही यह उप- लब्धि है ? १३ ॥ जैसे तिमिरोग ( आन्ध्य = मोतियाबिन्द ) ग्रस्त को एक-एक केश नहीं दिखायी देता, परन्तु केशसमूह ( केशों का गुच्छा ) को वह देख लेता है, उसी तरह अवयव ( अणु ) न दिखायी दे पाने पर भी अवयवसमूह ( अणुसमूह = द्रव्य ) दिखायी दे जाता है—यह मान लेने से काम चल सकता है तो अवयवी ( द्रव्यान्तर ) मानने से क्या लाभ ? ॥ १३ ॥
३२४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [४. अ० २. आ० स्वविषयानतिक्रमेणेन्द्रियस्य पटुमन्दभावाद्विषयग्रहणस्य तथाभावो नाविषये प्रवृत्तिः ॥ १४ ॥ यथाविषयमिन्द्रियाणां पटुमन्दभावाद्विषयग्रहणानां पटुमन्दभावो भवति । चक्षुः खलु प्रकृष्यमाणं नाविषयं गन्धं गृह्णाति, निकृष्यमाणं च न स्वविषयात् प्रच्यवते । सोऽयं तैमिरिकः कश्चिच्चक्षुर्विषयं केशं न गृह्णाति, कश्चिद् गृह्णाति केशसमूहम्; उभयं ह्यतैमिरिकेण चक्षुषा गृह्यते । परमाणवस्त्वतीन्द्रिया इन्द्रिया- विषयभूता न केनचिदिन्द्रियेण गृह्यन्ते, समुदितास्तु गृह्यन्ते—इत्यविषये प्रवृत्तिरिन्द्रियस्य प्रसज्येत । न जात्वर्थान्तरमणुभ्यो गृह्यते इति । ते खल्विमे परमाणवः सन्निहिता गृह्यमाणा अतीन्द्रियत्वं जहति, वियुक्ताश्चागृह्यमाणा इन्द्रियविषयत्वं न लभन्ते इति । सोऽयं द्रव्यान्तरानुत्पत्तावतिमहान् व्याघातः । इत्युपपद्यते द्रव्यान्तरं यद् ग्रहणस्य विषय इति । सञ्चयमात्रं विषय इति चेद् ? न; सञ्चयस्य संयोगाभावात् तस्य चातीन्द्रि- यस्याग्रहणादयुक्तम् । सञ्चयः खल्वनेकस्य संयोगः, स च गृह्यमाणाश्रयो गृह्यते स्वविषय (रूपरसादि) के अनतिक्रम से इन्द्रियों के तीव्र मन्द भाव से विषयज्ञान में तीव्रता-मन्दता आ जाती है, अपने से अविषयों में उनकी प्रवृत्ति नहीं हुआ करती ॥१४॥ स्व-स्व विषय के अनुसार, इन्द्रियों की पटुता-मन्दता से विषयज्ञान में पटुता-मन्दता आ जाती हैं । चक्षु पर कितना भी दबाव डाला जाये वह अपने अविषय गन्ध का ग्रहण नहीं कर पाती । या उस पर कितना भी नियन्त्रण रखा जाये वह स्वविषय (रूप) से प्रच्युत भी नहीं होती । यहाँ कोई तिमिररोगी चक्षुर्विषय केश को नहीं देख पाता, कोई केशसमूह को देख लेता है; परन्तु स्वस्थनेत्र पुरुष केश तथा केशसमूह—दोनों को देख सकता है। परन्तु परमाणु तो अतीन्द्रिय होने से इन्द्रिय के अविषय हैं वे किसी भी चक्षु से देखे नहीं जा सकते, हाँ वे समुदित हों तो देखे जा सकते हैं। तात्पर्य यह निकला कि इन्द्रिय की प्रवृत्ति अविषय में नहीं होगी। यदि ऐसा कहा जाय कि वहाँ परमाणु से अतिरिक्त गृहीत नहीं होता । इसका अर्थ यह हुआ कि परमाणु जब इकट्ठे होते हैं तो अपने अतीन्द्रियत्व को छोड़ देते हैं, पर जब अलग अलग होते हैं तो इन्द्रिय-विषय नहीं बनते । तो जो परमाणु अतीन्द्रिय है वही इन्द्रियविषय भी बन जाता है, यह बात द्रव्या- न्तरानुत्पत्ति में विरुद्ध पड़ रही है । अतः आपके कथन से ही सिद्ध हो जाता है कि जो इन्द्रिय-विषय है वह द्रव्यान्तर (अवयवी) है । परमाणुओं का सञ्चय ही इन्द्रिय का विषय बन जाता है, वह सञ्चय द्रव्यान्तर नहीं है ? ऐसा भी नहीं कह सकते; क्योंकि सञ्चय संयोगसम्बन्ध से अतिरिक्त नहीं है और वह अतीन्द्रिय है-उसका ग्रहण कैसे होगा ! तात्पर्य यह है कि 'सञ्चय' कहते हैं अनेक के
१६. सू० ] अवयविप्रकरणम् ३२५
१६. सू० ] अवयविप्रकरणम् ३२५ नातीन्द्रियाश्रयः। भवति हि-'इदमनेन संयुक्तम्' इति, तस्मादयुक्तमेतदिति। गृह्यमाणस्य चेन्द्रियेण विषयस्याऽऽवरणाद्यनुपलब्धिकारणमुपलभ्यते। तस्मा- न्नेन्द्रियदौर्बल्यादनुपलब्धिरणूनाम्, यथा-नेन्द्रियदौर्बल्याच्चक्षुषाऽनुपलब्धि- र्गन्धादीनामिति ॥ १४ ॥ अवयवावयविप्रसङ्गश्चैवमाप्रलयात् ॥ १५ ॥ यः खल्ववयविनोऽवयवेषु वृत्तिप्रतिषेधादभावः, सोऽयमवयवस्यावयवेषु प्रसज्यमानः सर्वप्रलयाय वा कल्पेत, निरवयवाद्वा परमाणूतो निवर्त्तेत, उभयथा चोपलब्धिविषयस्याभावः, तदभावादुपलब्ध्यभावः। उपलब्ध्याश्रयश्चायं वृत्ति- प्रतिषेधः। स आश्रयं व्याघ्नन्नात्मघाताय कल्पत इति ॥ १५ ॥ अथापि— न प्रलयोऽणुसद्भावात् ॥ १६ ॥ अवयवविभागमाश्रित्य वृत्तिप्रतिषेधादभावः प्रसज्यमानो निरवयवात् पर- संयोग को, वह संयोग इन्द्रियगोचर द्रव्यों का हो तो गृहीत हो सकता है, परन्तु अती- न्द्रियों का नहीं गृहीत होता ! जैसे कि लोक में कहा जाता है 'यह इससे संयुक्त है', यहाँ संयोग और संयुज्यमान दोनों इन्द्रियविषय है। आवरणादिक भी इन्द्रिय से गृह्यमाण विषय की अनुपलब्धि के ही कारण कहलाते हैं; अतीन्द्रिय की अनुपलब्धि के नहीं। अतः परमाणुओं की अनुपलब्धि इन्द्रियदौर्बल्य के कारण नहीं, अपितु उनकी अतीन्द्रियता के कारण है। जैसे चक्षु से गन्ध की अनुपलब्धि उसके दौर्बल्य के कारण नहीं, अपितु उसके अविषय के कारण है ॥ १४ ॥ (पृथक् अवयवी न मानने से) अवयवों के भी अवयवी प्रसक्त होंगे, यों सर्वप्रलय (अभाव) हो जायेगा ॥ १५ ॥ यह जो आप अवयवों में न रहने से अवयवी का प्रतिषेध करते हैं, यह प्रतिषेध फिर अवयवों के अवयव में भी होने लगेगा, तब आश्रयव्याघात से वह सब कुछ रहेगा ही नहीं, अर्थात् यह प्रतिषेध उसे प्रलय (अभाव) की तरफ ढकेल देगा। यदि निरवयव होने से उक्त प्रतिषेध परमाणु से निवृत्त होगा तो भी दोनों ही पक्ष में उपलब्धि-विषय कोई रहेगा नहीं, उसके न रहने से उपलब्धि कहाँ से होंगी ! जो उपलब्धि का आश्रय (अवयवी) है, उसको आप मान नहीं रहे हैं। इस तरह आश्रय का विरोध करके आप अपने ही पक्ष से अपने पक्ष का खण्डन कर रहे हैं ! ॥ १५ ॥ [तुष्यतुदुर्जनन्याय से हमने कह दिया था कि प्रलय (सर्वाभाव) हो जायेगा, वस्तुतः सर्वाभाव है नहीं; क्योंकि परमाणु अविनाशी है। वही प्रसङ्ग उठा रहे हैं—] अणु के रहने से प्रलय नहीं होगा ॥ १६ ॥ अवयवविभाग मानने पर, वृत्ति का प्रतिषेध होने से प्रलय (अभाव) प्रसक्त होगा।
३२६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० माणोर्निवर्तते न सर्वप्रलयाय कल्पते । निरवयवत्वं खलु परमाणोर्विभागैरल्पतर- प्रसङ्गस्य यतो नाल्पीयस्तत्रावस्थानात् । लोष्टस्य खलु प्रविभज्यमानावयवस्या- ल्पतरमल्पतममुत्तरमुत्तरं भवति । स चायमल्पतरप्रसङ्गो यस्मान्नाल्पतरमस्ति यः परमोऽल्पस्तत्र निवर्त्तते, यतश्च नाल्पीयोऽस्ति तं परमाणुं प्रचक्ष्महे इति ॥१६॥ परं वा त्रुटेः १ ॥ १७ ॥ अवयवविभागस्यानवस्थानाद् द्रव्याणामसंख्येयत्वात् त्रुटित्वनिवृत्तिरिति ॥१७ औपोद्धातिकं निरवयवप्रकरणम् [ १८-२५ ] अथेदानीमानुपलम्भिकः सर्वं नास्तीति मन्यमान आह— आकाशव्यतिभेदात् तदनुपपत्तिः ॥ १८ ॥ तस्याणोर्निरवयवस्य नित्यस्यानुपपत्तिः । कस्मात् ? आकाशव्यतिभेदात् । अन्तर्बहिश्चाणुराकाशेन समाविष्टो व्यतिभिन्नो व्यतिभेदात् सावयवः; सावयव- त्वादनित्य इति ? ॥ १८ ॥ निरवयव होने से परमाणु में यह सिद्धान्त लागू नहीं होता, अतः सर्वप्रलय की कल्पना नहीं हो सकती । निरवय से तात्पर्य है कि छोटे-से छोटा विभाग करने पर उससे छोटा कोई विभाग न हो पाये । परमाणु की यही स्थिति है, इसका कोई विभाग नहीं हो पाता । जैसे ढेले को जब हम खण्डशः विभक्त करते हैं तो उसका अल्प से अल्प या बड़े से बड़ा विभाग हो सकता है, यह विभाग परमाणु में प्रसक्त नहीं होता । अर्थात् यह विभागवाली बात जहाँ जाकर रुक जाती है जिससे कोई अल्पतर विभाग न हो, यों जो स्वयं सबसे छोटा हो । जिससे कोई अल्पतर नहीं है उसे ही हम परमाणु कहते हैं, वह निरवयव है ॥ १६ ॥ त्रसरेणु से परे अन्तिम (सबसे लघु विभाग) है ॥ १७ ॥ अवयवविभाग की कोई सीमा न मानोगे तो अवयवपरम्परा में द्रव्यों के असंख्य होने से त्रसरेणु का 'त्रसरेणु' यह नाम व्यर्थ हो जायेगा । क्योंकि उसमें भी अनन्त विभागों की कल्पना होती चलेगी, उसकी विरति कहाँ होगी ! ॥ १७ ॥ अब शून्यवादी 'सव कुछ नहीं हैं' मानता हुआ कहता है— अणु आकाश से अन्तर्भिद्यमान होने के कारण वह निरवयव नहीं है, अतएव नित्य नहीं माना जा सकता ? ॥ १८ ॥ वह अणु नित्य, निरवयव नहीं हो सकता; क्योंकि वह भी आकाश से संयुक्त होने के कारण अन्तर्भिद्यमान है । अणु भीतर और बाहर देशभेद से आकाश से व्याप्त है, इस आकाशव्याप्ति से उसमें भी अवयव उपपन्न हो सकता है । यदि वह सावयव सिद्ध हो गया तो उसमें नित्यता कैसी ? ॥ १८ ॥ १. त्रुटिः = त्रसरेणुरिति तात्पर्यकृतः । द्व्यणुक एवेत्यन्ये । जालसूर्यमरीचिस्थं त्रसरेणुरजः स्मृतम् ।
२२. सू० ] निरवयवप्रकरणम् ३२७
२२. सू० ] निरवयवप्रकरणम् ३२७ आकाशासर्वंगतत्वं वा ? ॥ १९ ॥ अथैतन्नेष्यते—परमाणोरन्तर्नास्त्याकाशमिति असर्वंगतत्वं प्रसज्यते इति ? अन्तर्बहिश्च कार्यद्रव्यस्य कारणान्तरवचनादकार्ये तदभावः ॥ २० ॥ अन्तरिति पिहितं कारणान्तरैः कारणमुच्यते । बहिरिति च व्यवधायक- मव्यवहितं कारणमेवोच्यते । तदेतत् कार्यद्रव्यस्य सम्भवति; नाणोरकार्यत्वात् । अकार्ये हि परमाणौवन्तर्बहिरित्यस्याभावः । यत्र चास्य भावोऽणुकार्यं तन्न परमाणुः, यतो हि नाल्पतरमस्ति स परमाणुरिति ॥ २० ॥ शब्दसंयोगविभवाच्च सर्वंगतम् ॥ २१ ॥ यत्र क्वचिदुत्पन्नाः शब्दा विभवन्त्याकाशे तदाश्रया भवन्ति, मनोभिः पर- माणुभिस्तत्कार्यैश्च संयोगा विभवन्त्याकाशे, नासंयुक्तमाकाशेन किञ्चिन्मूर्त्तं- द्रव्यमुपलभ्यते, तस्मान्नासर्वंगतमिति ॥ २१ ॥ अव्यूहाविष्टम्भविभुत्वानि चाकाशधर्माः ॥ २२ ॥ या फिर 'आकाश सर्वंगत है' यह अपना सिद्धान्त छोड़ना पड़ेगा ? ॥ १९ ॥ यदि परमाणु में आकाश नहीं मानते हो तो आप ( नैयायिक ) का 'आकाश सर्वंगत हैं' यह सिद्धान्त खण्डित हो जायेगा ? ॥ १९ ॥ अवयवाभिधायक 'अन्तर्' तथा 'बहिर्' शब्द कार्यद्रव्य ( अवयवी ) के कारण- विशेष को ही बतलाते हैं, अतः अकार्यं होने से ( अनवयवी ) परमाणु के वे दोनों सम्भव नहीं हो सकते ॥ २० ॥ 'अन्तर्' अर्थात् पिहित प्रदेश जो घट के अन्दर उसके बाह्य अवयवों से ढका हुआ हो, इसी तरह 'बहिर्' वह कहलाता है जो घट के अन्दर के अवयवों को ढका रखे । 'अन्तर्' यह कारणान्तर से कारण का बोधन कर रहा है तथा बहिर्' यह स्वयं कारण है । ये दोनों शब्द कार्यद्रव्य के बोध में सम्भव हो सकते हैं, परन्तु परमाणु के नहीं, क्योंकि वह अकार्यं है । अकार्य ( निरवयव ) परमाणु में 'अन्तर्' 'बहिर्' क्या बनेंगे ! जिसके ये होते हैं वह अणु-कार्य है, उसे परमाणु नहीं कहते । जैसा कि हम अभी पीछे कह आये हैं कि परमाणु उसे कहते हैं जिसका कोई अन्य लघुतर विभाग न किया जा सके ॥ २० ॥ हमारा आकाश का सर्वंगतत्व शब्दसंयोग के सार्वत्रिक होने से उपपन्न हो जाता है ॥ २१ ॥ जहाँ कहीं उत्पन्न शब्द वर्तमान होते हैं वहाँ वे आकाश में रहते ही हैं क्योंकि वे आकाशाश्रित हैं । तथा मन, परमाणु और कार्य-द्रव्यों के संयोग आकाश में आश्रय पाते हैं । ऐसा कोई मूर्त द्रव्य नहीं जो आकाश से असंयुक्त हो । अतः यह मानना ही पड़ेगा कि आकाश असर्वगत नहीं है ॥ २१ ॥ अव्यूह ( मिश्रित द्रव्य का अपरावर्तन ), अविष्टम्भ ( अन्य देश में गत्यभाव ) तथा विभुत्व—ये आकाश के धर्म हैं ॥ २२ ॥
३२८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० संसर्पता प्रतिघातिना द्रव्येण न व्यूह्यते यथा काष्ठेनोदकम् । कस्मात् ? निरवयवत्वात् । सर्पच्च प्रतिघाति न विष्टभ्नाति—नास्य क्रियाहेतुं गुणं प्रति- बध्नाति, कस्मात् ? अस्पर्शत्वात्, विपर्यये हि विष्टम्भो दृष्ट इति स भवान् सावयवे स्पर्शवति द्रव्ये दृष्टं धर्मं विपरीते नाशङ्कितुमर्हति । अण्ववयवस्याणुतरत्वप्रसङ्गादणुकार्यप्रतिषेधः । सावयवत्वे चाणोरण्ववयवोऽणुतर इति प्रसज्यते । कस्मात् ? कार्यकारण- द्रव्ययोः परिमाणभेददर्शनात् । तस्मादण्ववयवस्याणुतरत्वम्, यस्तु सावयवोऽणु- कार्यं तदिति । तस्मादणुकार्यमिदं प्रतिषिध्यते इति । कारणविभागाच्च कार्यस्यानित्यत्वम्; नाकाशव्यतिभेदात् । लोष्टस्यावयव- विभागादनित्यत्वम्; नाकाशसमावेशादिति ॥ २२ ॥ मूर्तिमतां च संस्थानोपपत्तेरवयवसद्भावः ? ॥ २३ ॥ परिच्छिन्नानां हि स्पर्शवतां संस्थानम्—त्रिकोणं चतुरस्रं समं परिमण्डल- मित्यपपद्यते, यत्तत् संस्थानं सोऽवयवसंन्निवेशः । परिमण्डलाश्चाणवः, तस्मात् सावयवा इति ? ॥ २३ ॥ आकाश, निरवयव होने से, क्रियावान् द्रव्य द्वारा मिश्रित होकर वह रूपान्तर में परावृत्त नहीं किया जा सकता और क्रियावान् द्रव्य अभिमुख उपस्थित द्रव्य की तरह आकाश द्वारा प्रतिबद्ध नहीं होता, अर्थात् इस द्रव्य के क्रियाहेतुगुण को आकाश स्पर्शवान् न होने से प्रतिबद्ध नहीं कर पाता। क्योंकि निरवयव स्पर्शवान् से विष्टम्भ देखा गया है, इसलिये आप निरवयव तथा अस्पर्शवान् आकाश में भी उस विष्टम्भ की कल्पना करें—यह उचित नहीं ! अणु का भी अवयव मानने पर वह अवयव उससे भी छोटा होगा तथा उस अवयव का भी अन्य अवयव कल्पित किया जा सकता है—इस आनन्त्य-कल्पना से अनवस्था- दोष आने लगेगा—अतः हम अणु के कार्य ( अवयव ) नहीं मानते। तात्पर्य यह है कि अणु को सावयव मानने पर अणु का अवयव उससे भी लघ्वाकार होगा; क्योंकि कार्य- द्रव्य से कारणद्रव्य में परिमाणभेद हुआ ही करता है। अतः अण्ववयव में अणुतरत्व आयेगा, वह अण्ववयव ही अणुकार्य है। उपर्युक्त हेतु ( अनवस्था-दोष ) से हम इस अणु में कार्यत्व का प्रतिषेध करते हैं। यह जो आप लोक में कार्य की अनित्यता देखते हैं वह कारण के विभाग से होती है, न कि आकाश का समावेश होने से । लोष्ट का नाश उसके अवयवों के विनाश से होता है, न कि आकाश के समावेश से ॥ २२ ॥ मूर्तिमान् द्रव्यों में आकारोपपत्ति देखी जाने से अणु के अवयव की सत्ता सिद्ध है ? ॥२३॥ लोक में परिच्छिन्न ( मूर्तिमान् ) स्पर्शवान् द्रव्यों का त्रिकोण, चौकोर, गोल, चपटा—आदि परमाणु का आकार देखा जाता है। वह आकार अवयवों का मिश्रण है। अणु में ऐसा चौकोर आदि भेद उसकी सावयवता से देखा जाता है। अतः वे भी सावयव हैं ? ॥ २३ ॥
२४. सू० ] निरवयवप्रकरणम् ३२९
२४. सू० ] निरवयवप्रकरणम् ३२९ संयोगोपपत्तेश्च ? ॥ २४ ॥ मध्ये सन्नणुः पूर्वापराभ्याम् अणुभ्यां संयुक्तस्तयोर्व्यवधानं कुरुते । व्यव- धानेनानुमीयते—पूर्वभागेन पूर्वेणाणुना संयुज्यते परभागेन परेणाणुना संयुज्यते, यौ तौ पूर्वापरौ भागौ तावस्यावयवौ । एवं सर्वतः संयुज्यमानस्य सर्वतो भागा अवयवा इति ? ॥ २४ ॥ यत्तावत् 'मूर्तिमतां संस्थानोपपत्तेरवयवसद्भावः' इति ? अत्रोक्तम् । किमु- क्तम् ? विभागेऽल्पतरप्रसङ्गस्य यतो नाल्पीयस्तत्र निवृत्तेरण्ववयवस्य चाणु- तरत्वप्रसङ्गादणुकार्यप्रतिषेध इति । यत् पुनरुच्यते—'संयोगोपपत्तेश्चेति स्पर्शवत्त्वाद्व्यवधानमाश्रयस्य चाव्याप्त्या भागभक्तिः' ? उक्तं चात्र स्पर्शवानणुः स्पर्शवत्तोरण्वोः प्रतिघाताद्व्यवधायकः; न सावयवत्वात् । स्पर्शवत्त्वाच्च व्यवधाने सत्यणुसंयोगो नाश्रयं व्याप्नोतीति भागभक्तिर्भवति संयोग के उपपादन से भी अणु के अवयव की सत्ता सिद्ध है ? ॥ २४ ॥ अणु बीच में रहता हुआ, पूर्व तथा पर वाले अणुओं से संयुक्त है, वह उन दोनों को पृथक् किये हुए हैं—यह पार्थक्य ही सिद्ध करता है कि मध्य अणु अपने पूर्व भाग द्वारा पूर्व अणु से संयुक्त है, तथा अपर भाग द्वारा अपर अणु से संयुक्त है ! यहाँ ये अपर भाग वाले अणु से संयुक्त भाग उस मध्यस्थ अणु के अवयव हैं। यों सब ओर से संयुक्त उसके सभी ओर अवयव हैं ? ॥ २४ ॥ यह जो आपने कहा कि 'मूर्तिमान् द्रव्यों की आकारोपपत्ति से अवयव की सत्ता अनुमति होती हैं' ? (४.२४.२३) इसका उत्तर दिया जा चुका है । क्या दिया गया ? यह 'अवयव-क्रम वहाँ ( अणु में ) जाकर रुक जाता है जहां उससे लघु कोई अवयव न बन सके; क्योंकि अणु का अवयव मानने से अनवस्था होने लगेगी, अतः हम अणु का अवयव नहीं मानते ।' यह आपने कहा कि 'संयोगोपपत्ति से अवयव की सत्ता सिद्ध होतो है, परमाणुत्रय के संयोग से आरब्ध अवयवसमूह में मध्यस्थ परमाणु द्वारा पूर्व-पर का व्यवधान होता है, संयोग स्वाश्रय को व्याप्त नहीं करता, अतः संयोगवान् होने से उस अणु के भी अव- यव हैं—यही सिद्ध होता हैं' ? इसका उत्तर यह है—आप अणु को स्पर्शवान् मानते हैं, मध्यस्थ अणु द्वारा स्पर्शवान् दो अणुओं में जो व्यवधान सिद्ध हो रहा है, वह उनके स्पर्शत्व होने से सिद्ध हो रहा है, न कि उसके सावयव होने से । अभी हमने कहा था कि संयोग स्वाश्रय को व्याप्त नहीं करता; परन्तु इसमें दो स्पर्शवान् अणुओं द्वारा व्यवधान से विभाग ज्ञात हो रहा है, अतः यह अणु सावयव है ? १. अत्र वार्त्तिककृता वचनविरोधोऽप्युपात्तः, स तु तत्रैव ध्येयः ।
३३० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० भागवानवायमिति ? उक्तं चात्र विभागेऽल्पतरप्रसङ्गस्य यतो नाल्पीयस्तत्राव- स्थानात् तदवयवस्य चाणुतरत्वप्रसङ्गादणुकार्यप्रतिषेध इति । मूर्तिमत्तां च संस्थानोपपत्तेः संयोगोपपत्तेश्च परमाणूनां सावयवत्वम् ? इति हेत्वोः— अनवस्थाकारित्वादनवस्थानुपपत्तेश्चाप्रतिषेधः ॥ २५ ॥ यावन्मूर्तिमद्यावच्च संयुज्यते तत् सर्वं सावयवम्—इत्यनवस्थाकारिणाविमौ हेतू, सा चानवस्था नोपपद्यते । सत्यामनवस्थायां सत्यौ हेतू स्याताम्, तस्माद- प्रतिषेधोऽयं निरवयवत्वस्येति । विभागस्य च विभज्यमानहानिर्नोपपद्यते, तस्मात् प्रलयान्तता नोपपद्यते इति । अनवस्थायां च प्रत्यधिकरणं द्रव्यावयवानामा- नन्त्यात् परिमाणभेदानां गुरुत्वस्य चाग्रहणं समानपरिमाणत्वं चावयवावय- विनोः परमाण्ववयवविभागादूर्ध्वमिति ॥ २५ ॥ बाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् [ २६-३७ ] यदिदं भवान् बुद्धीराश्रित्य बुद्धिविषयाः सन्तीति मन्यते, मिथ्याबुद्धय एताः । इसका उत्तर भी हम दे चुके हैं कि अवयवक्रम वहां जा कर रुक जाता है जहाँ उससे आगे कोई लघुतर अवयव विभक्त न हो सके; क्योंकि अणु का अवयव मानने से पूर्वोक्त अनवस्था होने लगेगी (।२.४.२४) । अतः हम अणु का अवयव नहीं मानते । मूर्तिमान् द्रव्यों की आकारोपपत्ति तथा संयोगोपपत्ति से परमाणुओं की सावयवत्व सिद्धि होगी ? अनवस्थाकारो होने से तथा अनवस्थानुपपादन से सिद्धि नहीं होतो ॥ २५ ॥ जो भी मूर्तिमान् तथा संयुक्त है वह सब सावयव है—ये दोनों हेतु पूर्वोक्त अन- वस्था उपपन्न करने वाले हैं । वह अनवस्था लोक में नहीं देखी जाती । हाँ, यदि वह अनवस्था लोक में देखी गयी होती तो वे दोनों हेतु परमाणु को सावयव सिद्ध कर सकते थे ! 'जिसको आप अन्तिम अवयव मानते हैं वह भी तो एक तरह से विभाग ही है ?' यह कथन भी उचित नहीं; क्योंकि जिसके विभाग होने मात्र से विभज्यमान का कोई नाश न होता हो वह विभाग होता रहे ! इसीलिये हमारे मत में आपके मत को व्याप्त करने वाला प्रलयदोष भी न आ पायेगा । यदि उक्त अनवस्था को स्वीकार किया जाय तो प्रतिद्रव्य में द्रव्यावयवों के आनन्त्य से परिमाणभेद तथा गुरुत्व का भी ग्रहण न होगा । यों परमाणु का भी अवयव मानने पर, मेरु तथा सर्षप ( अवयव्यवयव ) का समान परिमाण होने लगेगा—यह भयंकर अनवस्था आप का मत मानने पर होने लगेगी ! ॥ २५ ॥ प्रमेयत्व याथात्म्यव्याप्य है या नहीं ?—यह संशय होने पर विज्ञानवादी बौद्ध कहते हैं कि आप बुद्धियों का सहारा लेकर सबको बुद्धि-विषय मानते है, आपका यह मत
२८. सू० ] वाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् ३३१
२८. सू० ] वाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् ३३१ यदि हि तत्त्वबुद्धयः स्युः, बुद्ध्या विवेचने क्रियमाणे याथात्म्यं बुद्धिविषयाणा- मुपलभ्येत— बुद्ध्या विवेचनात्तु भावानां याथात्म्यानुपलब्धिस्तन्तवपकर्षेण पटसद्भावानुपलब्धिवत् तदनुपलब्धिः ? ॥ २६ ॥ यथाऽयं तन्तुरयं तन्तुरिति प्रत्येकं तन्तुषु विविच्यमानेषु नार्थान्तरं किञ्चि- दुपलभ्यते यत्पटबुद्धेर्विषयः स्यात्, याथात्म्यानुपलब्धेरसति विषये पटबुद्धिर्भ- वन्ती मिथ्याबुद्धिर्भवति । एवं सर्वत्रेति ? ॥ २६ ॥ व्याहतत्वादहेतुः ॥ २७ ॥ यदि बुद्ध्या विवेचनं भावानाम् न सर्वभावानां याथात्म्यानुपलब्धिः । अथ सर्वभावानां याथात्म्यानुपलब्धिः, न बुद्ध्या विवेचनं भावानाम् । बुद्ध्या विवेचनं याथात्म्यानुपलब्धिश्चेति व्याहन्यते । तदुक्तम्—'अवयवावयविप्रसङ्गश्चैवमा- प्रलयात्' (४.२.१५) इति १ ॥ २७ ॥ तदाश्रयत्वादपृथग्ग्रहणम् ॥ २८ ॥ मिथ्या हैं; क्योंकि यदि ये यथार्थ-बुद्धि होते तो बुद्धि से विवेचन किये जाने पर इन बुद्धिविषयों का याथात्म्य गृहीत होता । बुद्धि द्वारा विवेचन करने से भावों का याथात्म्य ( स्वभाव ) उपलब्ध नहीं होता, तन्तुओं के अपकर्षण से पटसत्ता के अनुपलम्भ की तरह उसकी अनुपलब्धि हो ? ॥२६॥ जैसे पट के प्रत्येक तन्तु का यह तन्तु, यह तन्तु—यों विवेचन किये जाने पर तन्तुओं के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता जो पटबुद्धि का विषय बन सके । यों स्वभाव ( पटत्व ) की अनुपलब्धि से विषय ( पट ) के न होने पर भी वहाँ पटबुद्धि होती हुई मिथ्याबुद्धि ही कहलायेगी ! इसी तरह सर्वत्र समझें ? ॥ २६ ॥ वचनविरोध होने से यह बुद्धिविवेचन हेतु अयुक्त है ॥ २७ ॥ यदि बुद्धि से विवेचन किया जाये तो भावों की याथात्म्यानुपलब्धि क्यों नहीं होगी ! यदि सभी भावों की याथात्म्यानुपलब्धि न हो पायी तो वह बुद्धि से विवेचन नहीं हुआ । भावों का बुद्धि से विवेचन हो और उनकी याथात्म्यानुपलब्धि न हो पाये—यह तो परस्पर विरुद्ध बात है । वस्तुस्वभाव के विना उसका विवेचन नहीं हो सकता, तथा जिस विविच्यमान की स्वभावानुपलब्धि को हेतुरूप से उपस्थित कर रहे हो वह बुद्धि से विवेचन नहीं माना जाता । इसीलिये हम पीछे (४. २. १५ में) कह आये हैं कि 'प्रलय- पर्यन्त अवयवावयविप्रसङ्ग होता चलेगा' ॥ २७ ॥ उस ( पटकार्य ) के आश्रित होने से वह पृथक् गृहीत नहीं होता ॥ २८ ॥ १. अत्र वार्त्तिककारः 'प्रमाणं पर्य्यनुयोज्यः' इत्यादिना दूषणान्तरमप्याह ।
३३२ . वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० कार्यद्रव्यं कारणद्रव्याश्रितं तत्कारणेभ्यः पृथङ् नोपलभ्यते, विपर्यये पृथ- ग्ग्रहणात्, यत्राश्रयाश्रितभावो नास्ति तत्र पृथग्ग्रहणमिति । बुद्ध्या विवेचनात्तु भावानां पृथग्ग्रहणम्, अतीन्द्रियेष्वणुषु यदिन्द्रियेण गृह्यते तदेतया बुद्ध्या विविच्यमानमन्यदिति ॥ २८ ॥ प्रमाणतश्चार्थप्रतिपत्तेः ॥ २९ ॥ बुद्ध्या विवेचनाद्भावानां याथात्म्योपलब्धिः । यदस्ति यथा च यत्रास्ति यथा च तत्सर्वं प्रमाणत उपलब्ध्या सिध्यति, या च प्रमाणत उपलब्धिस्तद् बुद्ध्या विवेचनं भावानाम्, तेन सर्वशास्त्राणि सर्वकर्माणि सर्वे च शरीरिणां व्यवहारा व्याप्ताः । परीक्षमाणो हि बुद्ध्याऽध्यवस्यति—इदमस्ति, इदं नास्तीति । तत्र न सर्वभावानुपपत्तिः ॥ २९ ॥ प्रमाणानुपपत्त्युपपत्तिभ्याम् ॥ ३० ॥ एवं च सति सर्वं नास्तीति नोपपद्यते, कस्मात् ? प्रमाणानुपपत्त्युपपत्ति- भ्याम् । यदि सर्वं नास्तीति प्रमाणमुपपद्यते, सर्वं नास्तीत्येतद्व्याहन्यते ! अथ प्रमाणं नोपपद्यते, सर्वं नास्तीत्यस्य कथं सिद्धिः ! अथ प्रमाणमन्तरेण सिद्धिः, सर्वमस्तीत्यस्य कथं न सिद्धिः ! ॥ ३० ॥ कार्यद्रव्य कारणद्रव्याश्रित है, अतः वह उन कारणों से पृथक् गृहीत नहीं होता । जहाँ यह आश्रयाश्रित भाव न हो वहाँ पृथग् ग्रहण होता ही है ! बुद्धि द्वारा विवेचन- मात्र से स्थूल भावों का इन्द्रियों द्वारा पृथक् ज्ञान गृहीत होता है, जैसे अतीन्द्रिय पर- माणुओं का पृथक् ग्रहण बुद्धि द्वारा होता ही है, अतः बुद्धि से विवेचित हुआ अवयवी परमाणु से पृथक् है ॥ २८ ॥ अर्थप्रतिपत्ति के प्रमाणाधीन होने से ॥ २९ ॥ बुद्धिविवेचन से भावों की याथात्म्योपलब्धि होती है । जो घटादि द्रव्य है तथा स्वावयवसमवेतत्व जैसा है, या जो शशविषाणादि कार्यकारणभाव से जैसा नहीं है— यह सब प्रमाण द्वारा उपलब्धि से सिद्ध होता है । प्रमाण द्वारा उपलब्धि ही 'भावों का बुद्धि से विवेचन' है । इस बुद्धिविवेचन के अन्तर्गत ही सब शास्त्र, सब कर्म तथा प्राणियों के सब व्यवहार आ जाते हैं । विवेचन करता हुआ जिज्ञासु—'यह है, यह नहीं है' ऐसा अध्यवसाय ( यथार्थ निर्णय ) करता है, अतः 'सर्वभावानुपपत्ति' सिद्धान्त युक्त नहीं ॥ २९ ॥ प्रमाणों की उपपत्ति, अनुपपत्ति से भी ॥ ३० ॥ इतना व्याख्यान होने के बाद, 'सब कुछ नहीं है' यह सिद्धान्त उपपन्न नहीं होता; क्योंकि प्रमाणों की उपपत्ति तथा अनुपपत्ति उसका आधार है । जैसे—यदि 'सब कुछ नहीं है' इसमें कोई प्रमाण देते हैं तो उस प्रमाण के होने से तुम्हारी 'सब कुछ नहीं है' यह प्रतिज्ञा कैसे बनेगी ! यदि प्रमाण न देते हो तो 'सब कुछ नहीं है' इसे कैसे सिद्ध करोगे ! यदि प्रमाण के बिना ही सिद्धि मानें तो 'सब कुछ है' यह क्यों न सिद्ध मान लिया जाये ! ॥ ३० ॥
३३. सू० ] वाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् ३३३
३३. सू० ] वाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् ३३३ स्वप्नविषयाभिमानवदयं प्रमाणप्रमेयाभिमानः ? ॥ ३१ ॥ मायागन्धर्वनगरमृगतृष्णिकावद्वा ? ॥ ३२ ॥ यथा स्वप्ने न विषयाः सन्त्यथ चाभिमानो भवति, एवं न प्रमाणानि प्रमे- यानि च सन्त्यथ च प्रमाणप्रमेयाभिमानो भवति ? ॥ ३१-३२ ॥ हेत्वभावादसिद्धिः ॥ ३३ ॥ स्वप्नान्ते विषयाभिमानवत् प्रमाणप्रमेयाभिमानो न पुनर्जागरितान्ते विषयो- पलब्धिवदित्यत्र हेतुर्नास्तीति हेत्वभावादसिद्धिः । स्वप्नान्ते चासन्तो विषया उपलभ्यन्ते इत्यत्रापि हेत्वभावः । प्रतिबोधेऽनुपलम्भादिति चेत् ? प्रतिबोधविषयोपलम्भादप्रतिषेधः । यदि प्रतिबोधेऽनुपलम्भात् स्वप्ने विषया न सन्तीति ? र्तिह य इमे प्रतिबुद्धेन विषया उपलभ्यन्ते उपलम्भात् सन्तीति । विपर्यये हि हेतुसामर्थ्यम् । उपलम्भात्सद्भावे सत्यनुपलम्भादभावः सिद्ध्यति, उभयथा त्वभावे नानुपलम्भस्य सामर्थ्यमस्ति, यथा-प्रदीपस्याभावादरूपस्यादर्शन- मिति, तत्र भावेनाभावः समर्थ्यते इति । [ विज्ञानवादी फिर दूसरे रूप से बात उठाते हैं— ] यह प्रमाण-प्रमेय का अभिमान ( कल्पना ) स्वप्नविषय के अभिमान ( मिथ्या कल्पना ) की तरह है ? ॥ ३१ ॥ या कल्पित गन्धर्वनगर या मृगतृष्णा की तरह ( मिथ्या ) है ? ॥ ३२ ॥ जैसे स्वप्न में विषय वास्तविक नहीं अपितु कल्पित ही होते हैं, उसी तरह ये प्रमाण तथा प्रमेय दोनों ही नहीं हैं, केवल इनकी कल्पना कर ली गयी है ? ॥ ३१-३२ ॥ उक्त अभिमानकल्पना में हेतु न होने से वह असिद्ध है ॥ ३३ ॥ यह प्रमाण-प्रमेयबुद्धि स्वप्नप्रत्ययसदृशी है, जाग्रत्प्रत्ययसदृशी नहीं है—इसमें कोई हेतु नहीं, अतः हेत्वभाव से आपकी बात अयुक्त ही है। स्वप्नावस्था में गृहीत होनेवाले विषय नहीं हैं—इसमें भी कोई हेतु नहीं। यदि यह कहो कि जागने पर वे उपलब्ध नहीं होते अतः वे नहीं हैं ? तो जाग्रद- वस्था में तो वे उपलब्ध रहते ही हैं। तब 'जाग्रदवस्था में विषय नहीं हैं'—यह कैसे कहते हो ! हेतुसामर्थ्य से तभी कोई बात सिद्ध की जा सकती है कि जब वह कहीं अन्यत्र देखी गयी हो। अन्यत्र क्वचित् उपलब्धि से सत्ता सिद्ध होने पर ही अनुपलब्धि से उसका अभाव सिद्ध हो सकता है। जब उभयथा अभाव ही है तो अनुपलब्धिसामर्थ्य से आप क्या सिद्ध करेंगे ! जैसे किसी जगह प्रदीप के अभाव में रूप ( घटादि ) का अदर्शन सिद्ध करना है तो प्रमाता को अन्यत्र कहीं रूपदर्शन हुआ रहना चाहिये, उसी सामर्थ्य से वह कह सकता है कि 'प्रदीप नहीं है, अतः रूपादर्शन हैं' । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
मानस्य निमित्तविकल्पाद्विकल्पोपपत्तिः॥ ३३ ॥
३३४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० स्वप्नान्तविकल्पे च हेतुवचनम्। स्वप्नविषयाभिमानवदिति ब्रुवता स्वप्ना- न्तविकल्पे हेतुर्वाच्यः। कश्चित्स्वप्नो भयोपसंहितः, कश्चित्प्रमादोपसंहितः, कश्चि- दुभयविपरीतः, कदाचित्स्वप्नमेव न पश्यतीति। निमित्तवतस्तु स्वप्नविषयाभि- मानस्य निमित्तविकल्पाद्विकल्पोपपत्तिः॥ ३३ ॥ स्मृतिसङ्कल्पवच्च स्वप्नविषयाभिमानः ॥ ३४ ॥ पूर्वोपलब्धविषयः। यथा स्मृतिश्च सङ्कल्पश्च पूर्वोपलब्धविषयौ न तस्य प्रत्याख्यानाय कल्पेते, तथा स्वप्ने विषयग्रहणं पूर्वोपलब्धविषयं न तस्य प्रत्या- ख्यानाय कल्पते इति। एवं दृष्टाविषयश्च स्वप्नान्तो जागरितान्तेन। यः सुप्तः स्वप्नं पश्यति स एव जाग्रत्स्वप्नदर्शनानि प्रतिसन्धत्ते—इदमद्राक्षमिति। तत्र जाग्रद्बुद्धिवृत्ति- वशात्स्वप्नविषयाभिमानो मिथ्येति व्यवसायः। सति च प्रतिसन्धाने या जाग्रतो बुद्धिवृत्तिस्तद्वशादयं व्यवसायः स्वप्नविषयाभिमानो मिथ्येति। उभयाविशेषे तु साधनानर्थक्यम्। यस्य स्वप्नान्तजागरितान्तयोरविशेषस्तस्य स्वप्नविषयाभिमानवदिति साधनमनर्थकम्; तदाश्रयप्रत्याख्यानात्। स्वप्नविकल्प में भी हेतु देना चाहिये ! पूर्वपक्षी को 'स्वप्नविषयाभिमानवत्' कहते हुए हेतु भी रखना चाहिये। कोई स्वप्न राग से, कोई भय से, कोई प्रमाद से तथा कोई इनके अभाव अर्थात् अदृष्ट से होता है, कोई पुरुष स्वप्न देखता ही नहीं। निमित्तवान् स्वप्नविषयाभिमान के निमित्तविकल्प से निमित्तविकल्प बन जायेगा ॥ ३३ ॥ स्वप्नविषयाभिमान भी स्मृति तथा सङ्कल्प के समान ॥ ३४ ॥ पूर्वोपलब्ध विषय वाला है। जैसे स्मृति और सङ्कल्प पूर्वोपलब्धविषयक ही होते हैं, उनका प्रत्याख्यान नहीं किया जा सकता; उसी तरह स्वप्न में दिखायी देने वाला विषय भी पूर्वोपलब्ध है, उनका प्रत्याख्यान कैसे होगा ! इस तरह स्वप्न-ज्ञान जाग्रज्ज्ञान से दृष्टविषय है। सोया हुआ मनुष्य जो कुछ स्वप्न में देखता है, जगने पर वह उसका प्रतिसन्धान करता है कि 'ऐसा मैंने स्वप्न में देखा था'। यों जाग्रज्ज्ञान होने पर जाग्र- त्पुरुष की ज्ञानवृत्ति के कारण यह निश्चय होता है कि स्वप्न में देखा गया विषय मिथ्या था; क्योंकि वह इस समय उपलब्ध नहीं है। यदि इन दोनों ( स्वाप्न एवं जाग्रत ) ज्ञानों को ही मिथ्या मानें तो साधनानर्थक्य होने लगेगा। यो, स्वाप्न तथा जाग्रत—दोनों ही ज्ञानों को मिथ्या मानता है, उसके लिये बाकी क्या रह जाता है कि उसे वह सिद्ध करने का प्रयास कर रहा है; क्योंकि उसने तो उस मिथ्याज्ञान के आश्रय जाग्रज्ज्ञानाधीन वस्तु का ही प्रत्याख्यान ( अप- लाप ) कर दिया ! अर्थात् जाग्रत् से स्वप्न या स्वप्न से जाग्रज्ज्ञान होता हैं—इसमें विनिगमन करना ही कठिन है।
३५. सू० ] बाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् ३३५
३५. सू० ] बाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् ३३५ अतस्मिंस्तदिति च व्यवसायः प्रधानाश्रयः । अपुरुषे स्थाणौ पुरुष इति व्यवसायः स प्रधानाश्रयः, न खलु पुरुषेऽनुपलब्धे 'पुरुषः' इत्यपुरुषे व्यवसायो भवति । एवं स्वप्नविषयस्य व्यवसायः—हस्तिनमद्राक्षं पर्वतमद्राक्षमिति प्रधानाश्रयो भवितुमर्हति ॥ ३४ ॥ एवं च सति— मिथ्योपलब्धेर्विनाशस्तत्त्वज्ञानात्स्वप्नविषयाभिमानप्रणाशवत्प्रतिबोधे ॥ ३५ ॥ स्थाणौ पुरुषोऽयमिति व्यवसायो मिथ्योपलब्धिः, अतस्मिंस्तदिति ज्ञानम्; स्थाणौ स्थाणुरिति व्यवसायस्तत्त्वज्ञानम्, तत्त्वज्ञानेन च मिथ्योपलब्धिर्निवर्त्यते, नार्थः स्थाणुपुरुषसामान्यलक्षणः । यथा प्रतिबोधे या ज्ञानवृत्तिस्तया स्वप्नविषया भिमानो निवर्त्यते, नार्थो विषयसामान्यलक्षणः; तथा मायागन्धर्वनगरमृग- तृष्णिकाणामपि या बुद्धयोऽतस्मिंस्तदिति व्यवसायाः, तत्राप्यनेनैव कल्पेन मिथ्योपलब्धिविनाशस्तत्त्वज्ञानान्नार्थप्रतिषेध इति । उपादानवच्च मायादिषु मिथ्याज्ञानम् । प्रज्ञापनीयसरूपं च द्रव्यमुपादाय अभाव में सत्ता ( तदभाववान् में तत्त्व ) का व्यवसाय प्रधानाश्रित होता है । पुरुषाभावयुक्त स्थाणु में पुरुषव्यवसाय पुरुषाश्रित है । पुरुष यदि कहीं प्रमाता को अन्यत्र न उपलब्ध हुआ हो तो वह स्थाणु में पुरुषव्यवसाय कभी नहीं कर पायेगा । इसी तरह 'हाथी देखा था, पर्वत देखा था'—यह स्वप्नगत विषय का व्यवसाय भी जाग्रज्ज्ञानरूप प्रधान का आश्रय लेकर ही हो सकता है ॥ ३४ ॥ ऐसा मानने पर— जगने पर स्वप्नज्ञान के नाश की तरह तत्त्वज्ञान से मिथ्याज्ञानोपलब्धि का विनाश हो जाता है ॥ ३५ ॥ स्थाणु में 'यह पुरुष है'—ऐसा व्यवसाय मिथ्योपलब्धि है, यही में तदभाववान् 'तत्ता' ज्ञान कहलाता है । स्थाणु में 'यह स्थाणु है'—ऐसा ज्ञान तत्त्वज्ञान कहलाता है । तत्त्व- ज्ञान से मिथ्योपलब्धि निवृत्त हो जाती है, न कि स्थाणुपुरुष में उपलब्ध होने वाले सामान्य लक्षणों ( स्थाणुत्व, पुरुषत्व ) का-कोई अर्थ नहीं रह जाता, अर्थात् इस तत्त्व- ज्ञान से उन विषयों में कोई परिवर्तन नहीं होता । जैसे जगने पर हुई ज्ञानवृत्ति से स्वप्न- विषयक मिथ्याभिमान नष्ट हो जाता है, न कि जाग्रत्स्वप्न-विषयों में उपलब्ध होने वाले सामान्य लक्षणों का कोई अर्थ नहीं है । इसी तरह मायाकल्पित गन्धर्वनगर, मृगतृष्णा आदि में तदभाववान् में तत्ता के ज्ञान का भी उक्त रीति से ही खण्डन समझ लेना चाहिये । वहाँ भी तत्त्वज्ञान से मिथ्योपलब्धि निवृत्त हो, जाती है विषय में कोई परिवर्त्तन नहीं होता । यों यह मिथ्याज्ञान सत् के आश्रित है । माया या इन्द्रजाल में मिथ्याज्ञान होता है । मायिक जिस विषय का आभास उत्पन्न करना चाहता है तत्सदृश किसी सद् द्रव्य को स्मृति में लेकर ही वह दूसरे में सम्पादित सामग्रियों से मिथ्याध्यवसाय करता
३३६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० साधनवान् परस्य मिथ्याध्यवसायं करोति, सा माया। नीहारप्रभृतीनां नगरसरूप- सन्निवेशे दूरान्नगरबुद्धिरुत्पद्यते; विपर्यये तदभावात् । सूर्यमरीचिषु भौमेनोष्मणा संसृष्टेषु स्पन्दमानेषूदकबुद्धिर्भवति; सामान्यग्रहणात्, अन्तिकस्थस्य विपर्यये तदभावात् । क्वचित्-कदाचित् कस्यचिच्च भावान्नानिमित्तं मिथ्याज्ञानम्। दृष्टं च बुद्धिद्वैतं मायाप्रयोक्तुः, परस्य च दूरान्तिकस्थयोर्गन्धर्वनगरमृगतृष्णिकासु, सुप्तप्रतिबुद्धयोश्च स्वप्नविषये। तदेतत् सर्वस्याभावे निरुपाख्यातायां निरात्मकत्वे नोपपद्यते इति ॥ ३५ ॥ बुद्धेश्चैवं निमित्तसद्भावोपलम्भात् ॥ ३६ ॥ मिथ्याबुद्धेश्चार्थवत्प्रतिषेधः। कस्मात् ? निमित्तोपलम्भात्, सद्भावोपलम्भा- च्च । उपलभ्यते मिथ्याबुद्धिनिमित्तम्, मिथ्याबुद्धिश्च प्रत्यात्ममुत्पन्ना गृह्यते; संवेद्यत्वात्। तस्मान्मिथ्याबुद्धिरप्यस्तीति ॥ ३६ ॥ तत्त्वप्रधानभेदाच्च मिथ्याबुद्धेर्द्वैविध्योपपत्तिः१ ॥ ३७ ॥ है, वही माया है। जैसे दूर से नगरादि की भ्रान्ति भी तभी होती है जब उसका कारण नक्षत्र या मेघादि से नगररूपाकार बन जाये । यहाँ मिथ्या ज्ञान का कारण दूरत्व है, पास में जाने पर वह बाधित होता है। मरुप्रदेश में सूर्यकिरणें भूमि से निर्गत उत्कट उष्ण तेज से संसृष्ट हो चिलचिलाती हैं, तत्र जल का सामान्य धर्म गृहीत होने से उसमें उदक का मिथ्या ज्ञान होता है । वह मिथ्याज्ञान समीप जानेपर नष्ट हो जाता है । कहीं कुछ तो कहीं कुछ भाव मिथ्याज्ञान से पूर्व है ही, न कि मिथ्याज्ञान अनिमित्तक है । लोक में यह बुद्धिद्वैत मायाप्रयोक्ता के कार्य में या दूसरे के कार्य में या गन्धर्वनगर- मृगतृष्णा आदि में देखते ही हैं। इसी तरह यह द्वैत सुप्त तथा प्रतिबुद्ध के स्वप्न तथा जाग्रत ज्ञानों में भी समझना चाहिये । यदि आत्यन्तिक निरात्मक एवं सत् के सर्वथा अभाव में ही इस संसार को व्याप्त करके रहता तो यह बुद्धिद्वैत कैसे होता ! अतः बाह्यार्थ का अपलाप करना अयुक्त है ॥ ३५ ॥ यों, कारण तथा सत्ता की उपलब्धि से मिथ्याज्ञान का अस्तित्व मानना ही उचित है ॥ ३६ ॥ जैसे ( मिथ्याज्ञानों के ) विषय का प्रतिषेध नहीं किया जा सकता, उसी तरह मिथ्याज्ञान का प्रतिषेध भी उचित नहीं; क्योंकि उसका कारण तथा उसकी सत्ता उप- लब्ध होती है। जब मिथ्याबुद्धि के कारण उपलब्ध होते हैं, तथा मिथ्याज्ञान सर्वजनानु- भवसिद्ध है तो शून्यवादी ( माध्यमिक बौद्ध ) को भी मिथ्याज्ञान की सत्ता स्वीकार करनी ही चाहिये ॥ ३६ ॥ तत्त्व ( धर्मस्वरूप ) तथा प्रधान ( आरोप्य ) में भेद होने से मिथ्याबुद्धि के निमित्त में द्वैविध्य बन सकता है ॥ ३७ ॥ १. ‘मिथ्याबुद्धिद्वैविध्योपपत्तिः’—इति पाठ० । ‘मिथ्याबुद्धिनिमित्तस्य द्वैविध्य- मित्यर्थः’—इति तात्पर्याचार्याः ।
३८. सू० ] तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् ३३७
३८. सू० ] तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् ३३७ तत्त्वं स्थाणुरिति, प्रधानं पुरुष इति—तत्त्वप्रधानयोरलोपाद् = भेदात्, स्थाणौ 'पुरुषः' इति मिथ्याबुद्धिरुत्पद्यते; सामान्यग्रहणात् । एवं पताकायां बलाकेति, लोष्टे कपोत इति । तत्र समाने विषये मिथ्याबुद्धीनां समावेशः, सामान्यग्रहणव्यवस्थानात् । यस्य तु निरात्मकं निरुपाख्यम्, सर्वं तस्यासमा- वेशः प्रसज्यते ! गन्धादौ च प्रमेये गन्धादिबुद्धयो मिथ्याभिमतास्तत्त्वप्रधानयोः सामान्य- ग्रहणस्य चाभावात् तत्त्वबुद्धय एव भवन्ति । तस्मादयुक्तमेतत्—'प्रमाणप्रमेय- बुद्धयो मिथ्या' इति ॥ ३७ ॥ तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् [ ३८-४९ ] 'दोषनिमित्तानां तत्त्वज्ञानादहङ्कारनिवृत्तिः' (४. २. १) इत्युक्तम् । अथ कथ तत्त्वज्ञानमुत्पद्यत इति ? समाधिविशेषाभ्यासात् ॥ ३८ ॥ स तु प्रत्याहृतस्येन्द्रियेभ्यो मनसो धारकेण प्रयत्नेन धार्यमाणस्यात्मना संयोगस्तत्त्वबुभुत्साविशिष्टः । सति हि तस्मिन्निन्द्रियार्थेषु बुद्धयो नोत्पद्यन्ते, तदभ्यासवशात् तत्त्वबुद्धिरुत्पद्यते ॥ ३८ ॥ तत्त्व अर्थात् स्थाणु ( धर्मी ), प्रधान अर्थात् पुरुष ( आरोप्य )—इनके भिन्न-भिन्न होने से स्थाणु में 'पुरुष है' यह मिथ्याज्ञान उत्पन्न होता है; उनके सामान्य लक्षण समान होने के कारण । इसी तरह ध्वजा में वक पक्षी तथा ढेले में कबूतर का भी समान लक्षणों से मिथ्याज्ञान हो जाया करता है । अतः यह सिद्ध होता है कि समान विषयों में मिथ्याबुद्धियों का समावेश समान लक्षणों से हो जाता है । परन्तु जो इस संसार को निर्धर्मक और अभाव ही मानता है उसके मत में यह समावेश कैसे और क्या करने के लिये होगा ! गन्धादि प्रमेय में गन्धविज्ञान को भी ये शून्यवादी मिथ्या ही मानते हैं; परन्तु वहाँ उक्त तत्त्व तथा प्रधान का भेद न होने से तथा समानलक्षण गृहीत न होने से हमारे मत में वह गन्धज्ञान तत्त्वज्ञान ही है, अर्थात् धर्मवत् धर्मिस्वरूप का यह यथार्थ ज्ञान ही है। अतः यह कहना अयुक्त ही है कि—प्रमाणप्रमेयबुद्धि मिथ्या है ॥ ३७ ॥ 'दोष-कारणों के तत्त्वज्ञान से अहङ्कार की निवृत्ति होती हैं' यह आप पहले ( ४.२.१ में ) कह चुके हैं, पर यह तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता कैसे है—यह तो बताइये ! समाधिविशेष के अभ्यास से तत्त्वज्ञान उत्पन्न हो जाता है ॥ ३८ ॥ समाधि क्या है ? तत्त्वज्ञान की इच्छा से इन्द्रियों से मन को हटा कर धारक प्रयत्न द्वारा धार्यमाण मन का आत्मा से संयोग ही 'समाधि' है। उस समाधि के होने पर, बुद्धि इन्द्रियों के विषयों की ओर नहीं दौड़ती । ऐसा अभ्यास करते-करते कि इन्द्रियाँ विषयों की तरफ न जाने पावें, एक दिन तत्त्वज्ञान हो ही जाता है ॥ ३८ ॥ न्या० द० : २२