भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 410 में से

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३२८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० संसर्पता प्रतिघातिना द्रव्येण न व्यूह्यते यथा काष्ठेनोदकम् । कस्मात् ? निरवयवत्वात् । सर्पच्च प्रतिघाति न विष्टभ्नाति—नास्य क्रियाहेतुं गुणं प्रति- बध्नाति, कस्मात् ? अस्पर्शत्वात्, विपर्यये हि विष्टम्भो दृष्ट इति स भवान् सावयवे स्पर्शवति द्रव्ये दृष्टं धर्मं विपरीते नाशङ्कितुमर्हति । अण्ववयवस्याणुतरत्वप्रसङ्गादणुकार्यप्रतिषेधः । सावयवत्वे चाणोरण्ववयवोऽणुतर इति प्रसज्यते । कस्मात् ? कार्यकारण- द्रव्ययोः परिमाणभेददर्शनात् । तस्मादण्ववयवस्याणुतरत्वम्, यस्तु सावयवोऽणु- कार्यं तदिति । तस्मादणुकार्यमिदं प्रतिषिध्यते इति । कारणविभागाच्च कार्यस्यानित्यत्वम्; नाकाशव्यतिभेदात् । लोष्टस्यावयव- विभागादनित्यत्वम्; नाकाशसमावेशादिति ॥ २२ ॥ मूर्तिमतां च संस्थानोपपत्तेरवयवसद्भावः ? ॥ २३ ॥ परिच्छिन्नानां हि स्पर्शवतां संस्थानम्—त्रिकोणं चतुरस्रं समं परिमण्डल- मित्यपपद्यते, यत्तत् संस्थानं सोऽवयवसंन्निवेशः । परिमण्डलाश्चाणवः, तस्मात् सावयवा इति ? ॥ २३ ॥ आकाश, निरवयव होने से, क्रियावान् द्रव्य द्वारा मिश्रित होकर वह रूपान्तर में परावृत्त नहीं किया जा सकता और क्रियावान् द्रव्य अभिमुख उपस्थित द्रव्य की तरह आकाश द्वारा प्रतिबद्ध नहीं होता, अर्थात् इस द्रव्य के क्रियाहेतुगुण को आकाश स्पर्शवान् न होने से प्रतिबद्ध नहीं कर पाता। क्योंकि निरवयव स्पर्शवान् से विष्टम्भ देखा गया है, इसलिये आप निरवयव तथा अस्पर्शवान् आकाश में भी उस विष्टम्भ की कल्पना करें—यह उचित नहीं ! अणु का भी अवयव मानने पर वह अवयव उससे भी छोटा होगा तथा उस अवयव का भी अन्य अवयव कल्पित किया जा सकता है—इस आनन्त्य-कल्पना से अनवस्था- दोष आने लगेगा—अतः हम अणु के कार्य ( अवयव ) नहीं मानते। तात्पर्य यह है कि अणु को सावयव मानने पर अणु का अवयव उससे भी लघ्वाकार होगा; क्योंकि कार्य- द्रव्य से कारणद्रव्य में परिमाणभेद हुआ ही करता है। अतः अण्ववयव में अणुतरत्व आयेगा, वह अण्ववयव ही अणुकार्य है। उपर्युक्त हेतु ( अनवस्था-दोष ) से हम इस अणु में कार्यत्व का प्रतिषेध करते हैं। यह जो आप लोक में कार्य की अनित्यता देखते हैं वह कारण के विभाग से होती है, न कि आकाश का समावेश होने से । लोष्ट का नाश उसके अवयवों के विनाश से होता है, न कि आकाश के समावेश से ॥ २२ ॥ मूर्तिमान् द्रव्यों में आकारोपपत्ति देखी जाने से अणु के अवयव की सत्ता सिद्ध है ? ॥२३॥ लोक में परिच्छिन्न ( मूर्तिमान् ) स्पर्शवान् द्रव्यों का त्रिकोण, चौकोर, गोल, चपटा—आदि परमाणु का आकार देखा जाता है। वह आकार अवयवों का मिश्रण है। अणु में ऐसा चौकोर आदि भेद उसकी सावयवता से देखा जाता है। अतः वे भी सावयव हैं ? ॥ २३ ॥

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