भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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२४. सू० ] निरवयवप्रकरणम् ३२९ संयोगोपपत्तेश्च ? ॥ २४ ॥ मध्ये सन्नणुः पूर्वापराभ्याम् अणुभ्यां संयुक्तस्तयोर्व्यवधानं कुरुते । व्यव- धानेनानुमीयते—पूर्वभागेन पूर्वेणाणुना संयुज्यते परभागेन परेणाणुना संयुज्यते, यौ तौ पूर्वापरौ भागौ तावस्यावयवौ । एवं सर्वतः संयुज्यमानस्य सर्वतो भागा अवयवा इति ? ॥ २४ ॥ यत्तावत् 'मूर्तिमतां संस्थानोपपत्तेरवयवसद्भावः' इति ? अत्रोक्तम् । किमु- क्तम् ? विभागेऽल्पतरप्रसङ्गस्य यतो नाल्पीयस्तत्र निवृत्तेरण्ववयवस्य चाणु- तरत्वप्रसङ्गादणुकार्यप्रतिषेध इति । यत् पुनरुच्यते—'संयोगोपपत्तेश्चेति स्पर्शवत्त्वाद्व्यवधानमाश्रयस्य चाव्याप्त्या भागभक्तिः' ? उक्तं चात्र स्पर्शवानणुः स्पर्शवत्तोरण्वोः प्रतिघाताद्व्यवधायकः; न सावयवत्वात् । स्पर्शवत्त्वाच्च व्यवधाने सत्यणुसंयोगो नाश्रयं व्याप्नोतीति भागभक्तिर्भवति संयोग के उपपादन से भी अणु के अवयव की सत्ता सिद्ध है ? ॥ २४ ॥ अणु बीच में रहता हुआ, पूर्व तथा पर वाले अणुओं से संयुक्त है, वह उन दोनों को पृथक् किये हुए हैं—यह पार्थक्य ही सिद्ध करता है कि मध्य अणु अपने पूर्व भाग द्वारा पूर्व अणु से संयुक्त है, तथा अपर भाग द्वारा अपर अणु से संयुक्त है ! यहाँ ये अपर भाग वाले अणु से संयुक्त भाग उस मध्यस्थ अणु के अवयव हैं। यों सब ओर से संयुक्त उसके सभी ओर अवयव हैं ? ॥ २४ ॥ यह जो आपने कहा कि 'मूर्तिमान् द्रव्यों की आकारोपपत्ति से अवयव की सत्ता अनुमति होती हैं' ? (४.२४.२३) इसका उत्तर दिया जा चुका है । क्या दिया गया ? यह 'अवयव-क्रम वहाँ ( अणु में ) जाकर रुक जाता है जहां उससे लघु कोई अवयव न बन सके; क्योंकि अणु का अवयव मानने से अनवस्था होने लगेगी, अतः हम अणु का अवयव नहीं मानते ।' यह आपने कहा कि 'संयोगोपपत्ति से अवयव की सत्ता सिद्ध होतो है, परमाणुत्रय के संयोग से आरब्ध अवयवसमूह में मध्यस्थ परमाणु द्वारा पूर्व-पर का व्यवधान होता है, संयोग स्वाश्रय को व्याप्त नहीं करता, अतः संयोगवान् होने से उस अणु के भी अव- यव हैं—यही सिद्ध होता हैं' ? इसका उत्तर यह है—आप अणु को स्पर्शवान् मानते हैं, मध्यस्थ अणु द्वारा स्पर्शवान् दो अणुओं में जो व्यवधान सिद्ध हो रहा है, वह उनके स्पर्शत्व होने से सिद्ध हो रहा है, न कि उसके सावयव होने से । अभी हमने कहा था कि संयोग स्वाश्रय को व्याप्त नहीं करता; परन्तु इसमें दो स्पर्शवान् अणुओं द्वारा व्यवधान से विभाग ज्ञात हो रहा है, अतः यह अणु सावयव है ? १. अत्र वार्त्तिककृता वचनविरोधोऽप्युपात्तः, स तु तत्रैव ध्येयः ।