भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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३३० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० भागवानवायमिति ? उक्तं चात्र विभागेऽल्पतरप्रसङ्गस्य यतो नाल्पीयस्तत्राव- स्थानात् तदवयवस्य चाणुतरत्वप्रसङ्गादणुकार्यप्रतिषेध इति । मूर्तिमत्तां च संस्थानोपपत्तेः संयोगोपपत्तेश्च परमाणूनां सावयवत्वम् ? इति हेत्वोः— अनवस्थाकारित्वादनवस्थानुपपत्तेश्चाप्रतिषेधः ॥ २५ ॥ यावन्मूर्तिमद्यावच्च संयुज्यते तत् सर्वं सावयवम्—इत्यनवस्थाकारिणाविमौ हेतू, सा चानवस्था नोपपद्यते । सत्यामनवस्थायां सत्यौ हेतू स्याताम्, तस्माद- प्रतिषेधोऽयं निरवयवत्वस्येति । विभागस्य च विभज्यमानहानिर्नोपपद्यते, तस्मात् प्रलयान्तता नोपपद्यते इति । अनवस्थायां च प्रत्यधिकरणं द्रव्यावयवानामा- नन्त्यात् परिमाणभेदानां गुरुत्वस्य चाग्रहणं समानपरिमाणत्वं चावयवावय- विनोः परमाण्ववयवविभागादूर्ध्वमिति ॥ २५ ॥ बाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् [ २६-३७ ] यदिदं भवान् बुद्धीराश्रित्य बुद्धिविषयाः सन्तीति मन्यते, मिथ्याबुद्धय एताः । इसका उत्तर भी हम दे चुके हैं कि अवयवक्रम वहां जा कर रुक जाता है जहाँ उससे आगे कोई लघुतर अवयव विभक्त न हो सके; क्योंकि अणु का अवयव मानने से पूर्वोक्त अनवस्था होने लगेगी (।२.४.२४) । अतः हम अणु का अवयव नहीं मानते । मूर्तिमान् द्रव्यों की आकारोपपत्ति तथा संयोगोपपत्ति से परमाणुओं की सावयवत्व सिद्धि होगी ? अनवस्थाकारो होने से तथा अनवस्थानुपपादन से सिद्धि नहीं होतो ॥ २५ ॥ जो भी मूर्तिमान् तथा संयुक्त है वह सब सावयव है—ये दोनों हेतु पूर्वोक्त अन- वस्था उपपन्न करने वाले हैं । वह अनवस्था लोक में नहीं देखी जाती । हाँ, यदि वह अनवस्था लोक में देखी गयी होती तो वे दोनों हेतु परमाणु को सावयव सिद्ध कर सकते थे ! 'जिसको आप अन्तिम अवयव मानते हैं वह भी तो एक तरह से विभाग ही है ?' यह कथन भी उचित नहीं; क्योंकि जिसके विभाग होने मात्र से विभज्यमान का कोई नाश न होता हो वह विभाग होता रहे ! इसीलिये हमारे मत में आपके मत को व्याप्त करने वाला प्रलयदोष भी न आ पायेगा । यदि उक्त अनवस्था को स्वीकार किया जाय तो प्रतिद्रव्य में द्रव्यावयवों के आनन्त्य से परिमाणभेद तथा गुरुत्व का भी ग्रहण न होगा । यों परमाणु का भी अवयव मानने पर, मेरु तथा सर्षप ( अवयव्यवयव ) का समान परिमाण होने लगेगा—यह भयंकर अनवस्था आप का मत मानने पर होने लगेगी ! ॥ २५ ॥ प्रमेयत्व याथात्म्यव्याप्य है या नहीं ?—यह संशय होने पर विज्ञानवादी बौद्ध कहते हैं कि आप बुद्धियों का सहारा लेकर सबको बुद्धि-विषय मानते है, आपका यह मत