न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 353, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें३५. सू० ] बाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् ३३५ अतस्मिंस्तदिति च व्यवसायः प्रधानाश्रयः । अपुरुषे स्थाणौ पुरुष इति व्यवसायः स प्रधानाश्रयः, न खलु पुरुषेऽनुपलब्धे 'पुरुषः' इत्यपुरुषे व्यवसायो भवति । एवं स्वप्नविषयस्य व्यवसायः—हस्तिनमद्राक्षं पर्वतमद्राक्षमिति प्रधानाश्रयो भवितुमर्हति ॥ ३४ ॥ एवं च सति— मिथ्योपलब्धेर्विनाशस्तत्त्वज्ञानात्स्वप्नविषयाभिमानप्रणाशवत्प्रतिबोधे ॥ ३५ ॥ स्थाणौ पुरुषोऽयमिति व्यवसायो मिथ्योपलब्धिः, अतस्मिंस्तदिति ज्ञानम्; स्थाणौ स्थाणुरिति व्यवसायस्तत्त्वज्ञानम्, तत्त्वज्ञानेन च मिथ्योपलब्धिर्निवर्त्यते, नार्थः स्थाणुपुरुषसामान्यलक्षणः । यथा प्रतिबोधे या ज्ञानवृत्तिस्तया स्वप्नविषया भिमानो निवर्त्यते, नार्थो विषयसामान्यलक्षणः; तथा मायागन्धर्वनगरमृग- तृष्णिकाणामपि या बुद्धयोऽतस्मिंस्तदिति व्यवसायाः, तत्राप्यनेनैव कल्पेन मिथ्योपलब्धिविनाशस्तत्त्वज्ञानान्नार्थप्रतिषेध इति । उपादानवच्च मायादिषु मिथ्याज्ञानम् । प्रज्ञापनीयसरूपं च द्रव्यमुपादाय अभाव में सत्ता ( तदभाववान् में तत्त्व ) का व्यवसाय प्रधानाश्रित होता है । पुरुषाभावयुक्त स्थाणु में पुरुषव्यवसाय पुरुषाश्रित है । पुरुष यदि कहीं प्रमाता को अन्यत्र न उपलब्ध हुआ हो तो वह स्थाणु में पुरुषव्यवसाय कभी नहीं कर पायेगा । इसी तरह 'हाथी देखा था, पर्वत देखा था'—यह स्वप्नगत विषय का व्यवसाय भी जाग्रज्ज्ञानरूप प्रधान का आश्रय लेकर ही हो सकता है ॥ ३४ ॥ ऐसा मानने पर— जगने पर स्वप्नज्ञान के नाश की तरह तत्त्वज्ञान से मिथ्याज्ञानोपलब्धि का विनाश हो जाता है ॥ ३५ ॥ स्थाणु में 'यह पुरुष है'—ऐसा व्यवसाय मिथ्योपलब्धि है, यही में तदभाववान् 'तत्ता' ज्ञान कहलाता है । स्थाणु में 'यह स्थाणु है'—ऐसा ज्ञान तत्त्वज्ञान कहलाता है । तत्त्व- ज्ञान से मिथ्योपलब्धि निवृत्त हो जाती है, न कि स्थाणुपुरुष में उपलब्ध होने वाले सामान्य लक्षणों ( स्थाणुत्व, पुरुषत्व ) का-कोई अर्थ नहीं रह जाता, अर्थात् इस तत्त्व- ज्ञान से उन विषयों में कोई परिवर्तन नहीं होता । जैसे जगने पर हुई ज्ञानवृत्ति से स्वप्न- विषयक मिथ्याभिमान नष्ट हो जाता है, न कि जाग्रत्स्वप्न-विषयों में उपलब्ध होने वाले सामान्य लक्षणों का कोई अर्थ नहीं है । इसी तरह मायाकल्पित गन्धर्वनगर, मृगतृष्णा आदि में तदभाववान् में तत्ता के ज्ञान का भी उक्त रीति से ही खण्डन समझ लेना चाहिये । वहाँ भी तत्त्वज्ञान से मिथ्योपलब्धि निवृत्त हो, जाती है विषय में कोई परिवर्त्तन नहीं होता । यों यह मिथ्याज्ञान सत् के आश्रित है । माया या इन्द्रजाल में मिथ्याज्ञान होता है । मायिक जिस विषय का आभास उत्पन्न करना चाहता है तत्सदृश किसी सद् द्रव्य को स्मृति में लेकर ही वह दूसरे में सम्पादित सामग्रियों से मिथ्याध्यवसाय करता