न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० साधनवान् परस्य मिथ्याध्यवसायं करोति, सा माया। नीहारप्रभृतीनां नगरसरूप- सन्निवेशे दूरान्नगरबुद्धिरुत्पद्यते; विपर्यये तदभावात् । सूर्यमरीचिषु भौमेनोष्मणा संसृष्टेषु स्पन्दमानेषूदकबुद्धिर्भवति; सामान्यग्रहणात्, अन्तिकस्थस्य विपर्यये तदभावात् । क्वचित्-कदाचित् कस्यचिच्च भावान्नानिमित्तं मिथ्याज्ञानम्। दृष्टं च बुद्धिद्वैतं मायाप्रयोक्तुः, परस्य च दूरान्तिकस्थयोर्गन्धर्वनगरमृगतृष्णिकासु, सुप्तप्रतिबुद्धयोश्च स्वप्नविषये। तदेतत् सर्वस्याभावे निरुपाख्यातायां निरात्मकत्वे नोपपद्यते इति ॥ ३५ ॥ बुद्धेश्चैवं निमित्तसद्भावोपलम्भात् ॥ ३६ ॥ मिथ्याबुद्धेश्चार्थवत्प्रतिषेधः। कस्मात् ? निमित्तोपलम्भात्, सद्भावोपलम्भा- च्च । उपलभ्यते मिथ्याबुद्धिनिमित्तम्, मिथ्याबुद्धिश्च प्रत्यात्ममुत्पन्ना गृह्यते; संवेद्यत्वात्। तस्मान्मिथ्याबुद्धिरप्यस्तीति ॥ ३६ ॥ तत्त्वप्रधानभेदाच्च मिथ्याबुद्धेर्द्वैविध्योपपत्तिः१ ॥ ३७ ॥ है, वही माया है। जैसे दूर से नगरादि की भ्रान्ति भी तभी होती है जब उसका कारण नक्षत्र या मेघादि से नगररूपाकार बन जाये । यहाँ मिथ्या ज्ञान का कारण दूरत्व है, पास में जाने पर वह बाधित होता है। मरुप्रदेश में सूर्यकिरणें भूमि से निर्गत उत्कट उष्ण तेज से संसृष्ट हो चिलचिलाती हैं, तत्र जल का सामान्य धर्म गृहीत होने से उसमें उदक का मिथ्या ज्ञान होता है । वह मिथ्याज्ञान समीप जानेपर नष्ट हो जाता है । कहीं कुछ तो कहीं कुछ भाव मिथ्याज्ञान से पूर्व है ही, न कि मिथ्याज्ञान अनिमित्तक है । लोक में यह बुद्धिद्वैत मायाप्रयोक्ता के कार्य में या दूसरे के कार्य में या गन्धर्वनगर- मृगतृष्णा आदि में देखते ही हैं। इसी तरह यह द्वैत सुप्त तथा प्रतिबुद्ध के स्वप्न तथा जाग्रत ज्ञानों में भी समझना चाहिये । यदि आत्यन्तिक निरात्मक एवं सत् के सर्वथा अभाव में ही इस संसार को व्याप्त करके रहता तो यह बुद्धिद्वैत कैसे होता ! अतः बाह्यार्थ का अपलाप करना अयुक्त है ॥ ३५ ॥ यों, कारण तथा सत्ता की उपलब्धि से मिथ्याज्ञान का अस्तित्व मानना ही उचित है ॥ ३६ ॥ जैसे ( मिथ्याज्ञानों के ) विषय का प्रतिषेध नहीं किया जा सकता, उसी तरह मिथ्याज्ञान का प्रतिषेध भी उचित नहीं; क्योंकि उसका कारण तथा उसकी सत्ता उप- लब्ध होती है। जब मिथ्याबुद्धि के कारण उपलब्ध होते हैं, तथा मिथ्याज्ञान सर्वजनानु- भवसिद्ध है तो शून्यवादी ( माध्यमिक बौद्ध ) को भी मिथ्याज्ञान की सत्ता स्वीकार करनी ही चाहिये ॥ ३६ ॥ तत्त्व ( धर्मस्वरूप ) तथा प्रधान ( आरोप्य ) में भेद होने से मिथ्याबुद्धि के निमित्त में द्वैविध्य बन सकता है ॥ ३७ ॥ १. ‘मिथ्याबुद्धिद्वैविध्योपपत्तिः’—इति पाठ० । ‘मिथ्याबुद्धिनिमित्तस्य द्वैविध्य- मित्यर्थः’—इति तात्पर्याचार्याः ।