भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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३८. सू० ] तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् ३३७ तत्त्वं स्थाणुरिति, प्रधानं पुरुष इति—तत्त्वप्रधानयोरलोपाद् = भेदात्, स्थाणौ 'पुरुषः' इति मिथ्याबुद्धिरुत्पद्यते; सामान्यग्रहणात् । एवं पताकायां बलाकेति, लोष्टे कपोत इति । तत्र समाने विषये मिथ्याबुद्धीनां समावेशः, सामान्यग्रहणव्यवस्थानात् । यस्य तु निरात्मकं निरुपाख्यम्, सर्वं तस्यासमा- वेशः प्रसज्यते ! गन्धादौ च प्रमेये गन्धादिबुद्धयो मिथ्याभिमतास्तत्त्वप्रधानयोः सामान्य- ग्रहणस्य चाभावात् तत्त्वबुद्धय एव भवन्ति । तस्मादयुक्तमेतत्—'प्रमाणप्रमेय- बुद्धयो मिथ्या' इति ॥ ३७ ॥ तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् [ ३८-४९ ] 'दोषनिमित्तानां तत्त्वज्ञानादहङ्कारनिवृत्तिः' (४. २. १) इत्युक्तम् । अथ कथ तत्त्वज्ञानमुत्पद्यत इति ? समाधिविशेषाभ्यासात् ॥ ३८ ॥ स तु प्रत्याहृतस्येन्द्रियेभ्यो मनसो धारकेण प्रयत्नेन धार्यमाणस्यात्मना संयोगस्तत्त्वबुभुत्साविशिष्टः । सति हि तस्मिन्निन्द्रियार्थेषु बुद्धयो नोत्पद्यन्ते, तदभ्यासवशात् तत्त्वबुद्धिरुत्पद्यते ॥ ३८ ॥ तत्त्व अर्थात् स्थाणु ( धर्मी ), प्रधान अर्थात् पुरुष ( आरोप्य )—इनके भिन्न-भिन्न होने से स्थाणु में 'पुरुष है' यह मिथ्याज्ञान उत्पन्न होता है; उनके सामान्य लक्षण समान होने के कारण । इसी तरह ध्वजा में वक पक्षी तथा ढेले में कबूतर का भी समान लक्षणों से मिथ्याज्ञान हो जाया करता है । अतः यह सिद्ध होता है कि समान विषयों में मिथ्याबुद्धियों का समावेश समान लक्षणों से हो जाता है । परन्तु जो इस संसार को निर्धर्मक और अभाव ही मानता है उसके मत में यह समावेश कैसे और क्या करने के लिये होगा ! गन्धादि प्रमेय में गन्धविज्ञान को भी ये शून्यवादी मिथ्या ही मानते हैं; परन्तु वहाँ उक्त तत्त्व तथा प्रधान का भेद न होने से तथा समानलक्षण गृहीत न होने से हमारे मत में वह गन्धज्ञान तत्त्वज्ञान ही है, अर्थात् धर्मवत् धर्मिस्वरूप का यह यथार्थ ज्ञान ही है। अतः यह कहना अयुक्त ही है कि—प्रमाणप्रमेयबुद्धि मिथ्या है ॥ ३७ ॥ 'दोष-कारणों के तत्त्वज्ञान से अहङ्कार की निवृत्ति होती हैं' यह आप पहले ( ४.२.१ में ) कह चुके हैं, पर यह तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता कैसे है—यह तो बताइये ! समाधिविशेष के अभ्यास से तत्त्वज्ञान उत्पन्न हो जाता है ॥ ३८ ॥ समाधि क्या है ? तत्त्वज्ञान की इच्छा से इन्द्रियों से मन को हटा कर धारक प्रयत्न द्वारा धार्यमाण मन का आत्मा से संयोग ही 'समाधि' है। उस समाधि के होने पर, बुद्धि इन्द्रियों के विषयों की ओर नहीं दौड़ती । ऐसा अभ्यास करते-करते कि इन्द्रियाँ विषयों की तरफ न जाने पावें, एक दिन तत्त्वज्ञान हो ही जाता है ॥ ३८ ॥ न्या० द० : २२