न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० यदुक्तम्—'सति हि तस्मिन् इन्द्रियार्थेषु बुद्धयो नोत्पद्यन्ते' इत्येतत्— न; अर्थविशेषप्राबल्यात् ? ॥ ३९ ॥ अनिच्छतोऽपि बुद्धयुत्पत्तेर्नैतद् युक्तम् । कस्मात् ? अर्थविशेषप्राबल्याद् अबुभुत्समानस्यापि बुद्धयुत्पत्तिर्दृष्टा, यथा—स्तनयित्नुशब्दप्रभृतिषु । तत्र समाधिविशेषो नोपपद्यते ? ॥ ३९ ॥ क्षुदादिभिः प्रवर्त्तनाच्च ? ॥ ४० ॥ क्षुत्पिपासाभ्यां शीतोष्णाभ्यां व्याधिभिश्चानिच्छतोऽपि बुद्धयः प्रवर्त्तन्ते । तस्मादेकाग्र्यानुपपत्तिरिति ॥ ४० ॥ अस्त्वेतत् समाधिं विहाय व्युत्थानम्, व्युत्थाननिमित्तं समाधिप्रत्यनीकं च, सति त्वेतस्मिन्— पूर्वकृतफलानुबन्धात् तदुत्पत्तिः ॥ ४१ ॥ पूर्वकृतो जन्मान्तरोपचितस्तत्त्वज्ञानहेतुर्धर्मप्रविवेकः¹ फलानुबन्धो योगा- शङ्का— आपका यह कहना कि 'उस समाधि के होने पर बुद्धि इन्द्रियों के विषयों की ओर नहीं दौड़ती' यह अयुक्त है; क्योंकि— वह समाधि अर्थविशेष के प्राबल्य से नहीं हो पायेगी ? ॥ ३९ ॥ समाधिस्थ पुरुष के न चाहने पर भी विषय की प्रबलता से इन्द्रियाँ उधर प्रवृत्त होंगी ही, तब वैसा ज्ञान भी होगा ही । जैसे न जानना चाहते हुए की भी मेघगर्जन- शब्द की तरफ इन्द्रियप्रवृत्ति देखी जाती है, तथा उसका श्रावण ज्ञान भी देखा जाता है, अतः हम तो यही मानना चाहेंगे कि आपका वह समाधिविशेष उत्पन्न नहीं होता ? ॥ ३९ ॥ भूख आदि की प्रवृत्ति से भी यही मानना उचित है ? ॥ ४० ॥ अनिच्छुक पुरुष की भी क्षुत्पिपासा, शीतातप, तथा व्याधि आदि की तरफ बुद्धि दौड़ती रहती है, अतः यही मानें कि वह समाधिविशेष उत्पन्न हो नहीं पाता ? ॥४०॥ उत्तर—हम कब कहते हैं कि समाधि-च्युति नहीं होती, या उसमें अन्तराय नहीं आता; परन्तु पुनः पुनः समाधिच्युति या उसमें अन्तराय आने पर भी पूर्वशरीराभ्यस्त समाधि के धर्माख्य संस्कारविशेष की स्थिरता से इस समाधि की पुनः उत्पत्ति हो जाती है ॥ ४१ ॥ सूत्रस्थ 'पूर्वकृत' पद से तात्पर्य है—पूर्व जन्म में संचित हुआ तत्त्वज्ञान-निमित्तक धर्माख्य प्रकृष्ट संस्कार ( अदृष्ट ) । 'फलानुबन्ध से तात्पर्य है योगाभ्यास का सामर्थ्य । १. 'प्रविविच्यते विशिष्यते इति प्रविवेकः, धर्मश्चासौ प्रविवेकः' इति तात्पर्यकृतः ।