न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४४. सू० ] तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् ३३९ भ्याससामर्थ्यम्, निष्फले ह्यभ्यासे नाभ्यासमाद्रियेरन् । दृष्टं हि लौकिकेषु कर्म- स्वभ्याससामर्थ्यम् ॥ ४१ ॥ प्रत्यनीकपरिहारार्थं च अरण्यगुहापुलिनादिषु योगाभ्यासोपदेशः ॥ ४२ ॥ योगाभ्यासजनितो धर्मो जन्मान्तरेऽप्यनुवर्तते । प्रचयकाष्ठागते तत्त्वज्ञानहेतौ धर्मे प्रकृष्टायां समाधिभावनायां तत्त्वज्ञानमुत्पद्यते इति । दृष्टश्च समाधिनाऽर्थ- विशेषप्राबल्याभिभवः—'नाहमेतदश्रौषं नाहमेतदज्ञासिषम्, अन्यत्र मे मनोऽभूत्' इत्याह लौकिक इति ॥ ४२ ॥ यद्यर्थविशेषप्राबल्यादनिच्छतोऽपि बुद्धयुत्पत्तिरनुज्ञायते, अपवर्गेऽप्येवं प्रसङ्गः ? ॥ ४३ ॥ मुक्तस्यापि बाह्यार्थसामर्थ्याद् बुद्धय उत्पद्येरन्निति ? ॥ ४३ ॥ न; निष्पन्नावश्यम्भावित्वात् ॥ ४४ ॥ इन दोनों हेतुओं से समाधि की उत्पत्ति होगी । 'फलानुबन्ध' इसलिये लगाया है कि निष्फल अभ्यास में प्रेक्षावान् पुरुषों का आदर न होगा । लोक में भी देखा जाता है, जैसे मनुष्य यदि कुछ समय पहले कोई कार्य थोड़ा-बहुत सीखा रहता है तो समय पाकर, साधन मिलने पर अभ्यास से वही उस कार्य में कुशल हो जाता है ॥ ४१ ॥ विघ्नों के परिहार के लिये आचार्यों ने अरण्य, गुफा, तथा ( समुद्र या नदी के ) तट आदि एकान्त स्थानों में बैठ कर योगाभ्यास का उपदेश किया है ॥ ४२ ॥ योगाभ्यासजनित अदृष्ट जन्मान्तर में भी अनुवृत्त होता है । जब यह तत्त्वज्ञानहेतु अदृष्ट प्रचय ( वृद्धि ) की अन्तिम सीमा तक पहुँच जाता है तो समाधि की पूर्णता से उस समय तत्त्वज्ञान हो जाता है । लोक में भी समाधि से अर्थविशेष के प्राबल्य का अभिभव देखा जाता है, जैसे कोई कहे—'अरे भाई ! मैं आपकी बात सुन नहीं सका, अतः समझ नहीं पाया, मेरा ध्यान ( मन ) दूसरी ओर था'—इत्यादि ॥ ४२ ॥ शङ्का— यदि आप हमारी इस बात को स्वीकार करते हैं कि 'अनिच्छुक का भी मन अर्थ- विशेषप्राबल्य से उधर खिंच ही जाता है' तो— अपवर्ग में भी बाह्य विषयों की ओर बुद्धि प्रसक्त होगी ? ॥ ४३ ॥ मुक्त पुरुष की बुद्धि भी विषयविशेष के प्राबल्य से उसकी तरफ प्रवृत्त होगी ? ॥ ४३ ॥ उत्तर— उस बुद्धि के निष्पन्न ( शरीर ) में ही अवश्यम्भावी होने से अपवर्ग-स्थिति में यह सब कुछ नहीं होता ॥ ४४ ॥