न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 358, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें३४० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० कर्मवशान्निष्पन्ने शरीरे चेष्टेन्द्रियार्थाश्रये निमित्तभावादवश्यम्भावी बुद्धीना- मुत्पादः, न च प्रबलोऽपि सन् बाह्योऽर्थ आत्मनो बुद्धयुत्पादे समर्थो भवति, तस्येन्द्रियेण संयोगाद् बुद्धयुत्पादे सामर्थ्यं दृष्टमिति ॥ ४४ ॥ तदभावश्चापवर्गे ॥ ४५ ॥ तस्य बुद्धिनिमित्ताश्रयस्य शरीरेन्द्रियस्य धर्माधर्मभावादभावोऽपवर्गे । तत्र यदुक्तम्-‘अपवर्गेऽप्येवं प्रसङ्गः’ इति तदयुक्तम् । तस्मात्सर्वदुःखविमोक्षोऽपवर्गः । यस्मात् सर्वदुःखबीजं सर्वदुःखायतनं चापवर्गे विच्छिद्यते, तस्मात् सर्वेण दुःखेन विमुक्तिरपवर्गः; न निर्बीजं निरायतनं च दुःखमुत्पद्यत इति ॥ ४५ ॥ तदर्थं यमनियमाभ्यामात्मसंस्कारो योगाच्चाध्यात्मविध्युपायैः ॥ ४६ ॥ तस्यापवर्गस्याधिगमाय यमनियमाभ्यामात्मसंस्कारः । यमः१ समानमाश्र- मिणां धर्मसाधनम्, २नियमस्तु विशिष्टम् । आत्मसंस्कारः पुनरधर्महानं धर्मो- आत्मा के प्राक्तन कर्मवश जब यह शरीर निष्पन्न होता है, तब वह चेष्टा, इन्द्रिय, तथा विषयों का आश्रय होता है । इस प्रकार उस बुद्धि का निमित्त होने से इस शरीर में भी वैषयिक बुद्धि का उत्पाद अवश्यम्भावी है, परन्तु मोक्षावस्था में ( इन्द्रिय से दूर होने के कारण ) प्रबल बाह्य विषय भी आत्मा में बुद्धयुत्पाद नहीं कर सकता; क्योंकि इन्द्रियों के संयोग से ही उस वैषयिकबुद्धि की उत्पत्तिशक्ति देखी जाती है ॥ ४४ ॥ तथा उस बुद्धिकारण शरीर का अपवर्गदशा में अभाव है ॥ ४५ ॥ बुद्धिनिमित्त के आश्रय शरीरेन्द्रियोत्पत्ति के कारण धर्माधर्म हैं, पर अपवर्ग में धर्माधर्म क्षीण हो जाते हैं । अतः वहाँ कारण ( धर्माधर्मादि ) के अभाव में तत्कार्य ( शरीरेन्द्रियादि ) का अभाव ही रहेगा । इसलिए आपका यह कहना कि 'अपवर्ग में भी बाह्य विषयों की ओर बुद्धि प्रवृत्त होगी'—अयुक्त ही है । यहाँ सब दुःखों से छुट- कारा पा जाना ही मोक्ष है, यही 'अपवर्ग' है । तात्पर्य यह है कि सब दुःखों के कारण तथा आश्रय का अपवर्ग में विच्छेद हो जाता है, अतः सब दुःखों से विमुक्ति ही 'अपवर्ग' है । इस दशा में निष्कारण तथा निराश्रय दुःख उत्पन्न ही कैसे होंगे ! ॥ ४५ ॥ उसके लिये यम-नियम, योग तथा अध्यात्मशास्त्रोक्त उपायों से आत्मा का संस्कार करना चाहिये ॥ ४६ ॥ उस अपवर्ग की प्राप्ति के लिये यम-नियम से आत्म-संस्कार करना चाहिये । यम कहते हैं—आश्रमियों का समान धर्मसाधन, जैसे—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह आदि धर्म का पालन । नियम—जिज्ञासु पुरुषों के विशिष्ट धर्मसाधन को १. 'अहिंसा सत्यमस्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः'—( योगसूत्रम्, २. ३०. ) २. 'शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः'—( योगसूत्रम्, २. ३२. )