भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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४८. सू० ] तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् ३४१ पचयश्च, योगशास्त्राच्चाध्यात्मविधिः प्रतिपत्तव्यः । स पुनस्तपः, प्राणायामः, प्रत्याहारः, ध्यानम्, धारणेति । इन्द्रियविषयेषु प्रसंख्यानाभ्यासो रागद्वेषप्रहा- णार्थः । उपायस्तु योगाचारविधानमिति ॥ ४६ ॥ ज्ञानग्रहणाभ्यासस्तद्विद्यैश्च सह संवादः ॥ ४७ ॥ तदर्थमिति प्रकृतम् । ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञानम् = आत्मविद्याशास्त्रम्, तस्य ग्रहण- मध्ययनधारणे । अभ्यासः = सततक्रियाध्ययनश्रवणचिन्तनानि । तद्विद्यैश्च सह संवाद इति प्रज्ञापरिपाकार्थम् । परिपाकस्तु संशयच्छेदनम्, अविज्ञातार्थबोधः, अध्यवसिताभ्यनुज्ञानमिति । समाय वादः = संवादः ॥ ४७ ॥ 'तद्विद्यैश्च सह संवादः' इत्यविभक्तार्थं वचनं विभज्यते-- तं शिष्यगुरुसब्रह्मचारिविशिष्टश्रेयोऽर्थिभिरनसूयिभिरभ्युपेयात् ॥ ४८ ॥ कहते हैं, जैसे—शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वरप्रणिधान । उक्त उपायों द्वारा अधर्मनाश तथा धर्मोपचय से आत्मसंस्कार समझना चाहिये । अध्यात्मविधि योगशास्त्र से ग्रहण करनी चाहिये । वह विधि योगशास्त्र में—तप, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान तथा धारणा आदि उपायों से बतायी गयी है । इन्द्रियार्थों के वारे में निवृत्ति ( त्याग ) का अभ्यास रागद्वेष के क्षय के लिये किया जाता है । योग तथा आचारशास्त्र में मुमुक्षु के लिये बतायी गयी विधियाँ ही 'उपाय' है। जैसे—एकाकिता, आहार में संयम तथा एक स्थान पर अधिक काल न रहना आदि ॥ ४६ ॥ [ यदि अपवर्ग उक्त समाधि से ही निष्पन्न होता है तो इस न्यायशास्त्र के अध्ययन का क्या लाभ ?—] इस पर सूत्रकार कहते हैं— विद्याओं का अध्ययन तथा उसका अभ्यास और उसके मर्मज्ञों के साथ संवाद ॥४७॥ उस अपवर्ग के लिए करना चाहिये । 'जिससे जाना जाये'—इस करणव्युत्पत्ति से आत्मविद्याशास्त्र को 'ज्ञान' कहते है, उसे प्राप्त करना ही अध्ययन एवं धारणा है । निरन्तर शास्त्रोक्त क्रिया, शास्त्रों का अध्ययन एवं चिन्तन करना अभ्यास कहलाता है । तथा प्रज्ञावै शद्य के लिए उस विद्या के विद्वानों के सामने जिज्ञासुभाव से श्रद्धा के साथ परिप्रश्न कर संवाद करते रहने से प्रज्ञापरिपाक होता है । यह प्रज्ञावैशद्य तब समझना चाहिये जब जिज्ञासु को संशयनिवृत्ति, अविज्ञात ( विशेषेण अज्ञात ) अर्थ का बोध, तथा प्रमाण से सामान्यतः ज्ञात का तर्कयुक्त अभ्युपगम हो जाये । समस्थिति के लिये किये गये वाद को 'संवाद' कहते हैं । अर्थात् तत्त्ववुभुत्सा के लिये विहित कथाप्रवर्तन संवाद कहलाता है ॥ ४७ ॥ पूर्वसूत्रोक्त 'उन उन विद्वानों के साथ होनेवाला संवाद'—इस वाक्यावयव को और स्पष्ट करते हैं— संवाद को शिष्य, गुरु, सहाध्यायी तथा किसी तत्त्वज्ञानी के साथ जो कि उस जिज्ञासु का कल्याण चाहते हों तथा उससे ईर्ष्या न करते हों, प्राप्त करे ॥ ४८ ॥