भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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३४२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० एतन्निगदेनैव नीतार्थमिति ॥ ४८ ॥ यदिदं मन्येत—पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहः प्रतिकूलः परस्येति ? प्रतिपक्षहीनमपि वा प्रयोजनार्थमर्थित्वे ॥ ४९ ॥ तमभ्युपेयादिति वर्तते । परतः प्रज्ञामुपादित्समानस्तत्त्वबुभुत्साप्रकाशनेन स्वपक्षमनावस्थापयन् स्वदर्शनं परिशोधयेदिति ॥ ४९ ॥ तत्त्वज्ञानपरिपालनप्रकरणम् [ ५०-५१ ] अन्योन्यप्रत्यनीकानि च प्रावादुकानां दर्शनानि, स्वपक्षरागेण चैके न्याय- मतिवर्तन्ते, तत्र— तत्त्वाध्यवसायसंरक्षणार्थं जल्पवितण्डे, बोजप्ररोहसंरक्षणार्थं कण्टकशाखावरणवत् ॥ ५० ॥ अनुत्पन्नतत्त्वज्ञानानामप्रहीणदोषाणां तदर्थं घटमानानामेतदिति ॥ ५० ॥ यह सूत्र अपने सरल पदों से स्वयं स्पष्ट है, अतः इसका अधिक व्याख्यान अपे- क्षित नहीं ॥ ४८ ॥ यदि संवाद में पक्ष तथा प्रतिपक्ष होने से वह दूसरों ( उक्त शिष्य, गुरु, सब्रह्म- चारी ) के लिये प्रतिकूल ही होगा—ऐसा समझा जाय तो ? तत्त्वज्ञान की इच्छा होने पर तत्त्वनिर्णय के लिये प्रतिकूलपक्षहीन ॥ ४९ ॥ वह संवाद करे । दूसरे से ज्ञान प्राप्त करने के लिये तथा तत्त्वज्ञान की इच्छा प्रकट कर, अपना कोई पक्ष न रखता हुआ अपने ज्ञान का परिष्कार करे ॥ ४९ ॥ [ यदि तत्त्वज्ञान के लिये ऐसा सात्त्विक संवाद ही अपेक्षित है तो जल्प-वितण्डा को हाथ जोड़ लें, संवाद में उनकी क्या जरूरत पड़ेगी ? इस पर कहते हैं—] एक बात और, विभिन्न दार्शनिकों के आत्मविद्या के बारे में अपने-अपने मत हैं जो कि परस्पर विरुद्ध हैं, उनमें अपने को न उलझाते हुए तथा उनमें से अयुक्त को छोड़- कर युक्त के परिग्रह से अपने ज्ञान का परिष्कार करे। हाँ, उक्त प्रकार के वादियों को छोड़ कर अन्य प्रकार के वादी भी हैं जो अपने पक्ष में दुराग्रह रखते हुए न्याय का अतिक्रमण करते रहते हैं, उन पर— जिज्ञासु को तत्त्वज्ञान के संरक्षण के लिये जल्प-वितण्डा का भी प्रयोग करना चाहिये, जैसे अन्यत्र अनपेक्षित कण्टकशाखा का आवरण (कांटों का घेरा) भी क्षेत्ररक्षण के लिये कभी-कभी अत्यावश्यक होता है ॥ ५० ॥ सूत्रकार का यह आदेश उन जिज्ञासुओं के लिये है जिनको तत्त्वज्ञान न हुआ हो, • जिनके दोष प्रहीण न हुए हों, परन्तु जो उनके प्रहाण के लिये प्रयास कर रहे हों ॥५०॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri