भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 341, कुल 410 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 341

१३. सू० ] अवयविप्रकरणम् ३२३ वयविनो नैकदेशेन वृत्तिरन्यावयवाभावादित्यहेतुः । वृत्तिः कथमिति चेत् ? एकस्यानेकत्राश्रयाश्रितसम्बन्धलक्षणा प्राप्तिः । आश्रयाश्रितभावः कथमिति चेत् ? यस्य यतोऽन्यत्रात्मलाभानुपपत्तिः स आश्रयः । न कारणद्रव्येभ्योऽन्यत्र कार्यद्रव्यमात्मानं लभते, विपर्ययस्तु कारणद्रव्येष्विति । नित्येषु कथमिति चेत् ? अनित्येषु दर्शनात् सिद्धम् । नित्येषु द्रव्येषु कथमाश्रयाश्रयिभाव इति चेत् ? अनित्येषु द्रव्यगुणेषु दर्शनादाश्रयाश्रितभावस्य, नित्येषु सिद्धिरिति । तस्माद- वयव्यभिमानः प्रतिषिद्ध्यते निःश्रेयसकामस्य, नावयवी; यथा-रूपादिषु मिथ्या- सङ्कल्पः, न रूपादय इति ॥ १२ ॥ सर्वाग्रहणमवयव्यसिद्धेः ( २.१.३५ ) इति प्रत्यवस्थितोऽप्येतदाह— केशसमूहे तैमिरिकोपलब्धिवत् तदुपलब्धिः ? ॥ १३ ॥ यथैकैकः केशस्तैमिरिकेण नोपलभ्यते, केशसमूहस्तूपलभ्यते, तथैकैकोऽणुर्नो- पलभ्यते, अणुसञ्चयस्तूपलभ्यते । तदिदमणुसमूहविषयं ग्रहणमिति ? ॥ १३ ॥ होता' यह अहेतु ही है ! अवयवों में यह अवयवी की वृत्ति कैसे है ? एक ( अवयवी ) की अनेक ( अवयवों ) में आश्रयाश्रित सम्बन्ध ( समवायसम्बन्ध ) से प्राप्तिवृत्ति । आश्रयाश्रित सम्बन्ध क्या है ? जिसकी जिससे अन्यत्र सत्ता न मिल पाये वह 'आश्रय' है । कारणद्रव्यों से अन्यत्र कार्यद्रव्य की सत्ता नहीं मिलती, अतः कारण कार्यद्रव्य का आश्रय है । इसके विपरीत, कारणद्रव्य ( मृत्तिकादि ) कार्यद्रव्य के अतिरिक्त कुम्भकार के घर में भी मिल सकता है, अतः वह कार्यद्रव्य का आश्रित नहीं । नित्य पदार्थों में यह व्यवस्था कैसे बैठाओगे ? अनित्य ( द्रव्यगुणों ) में यह आश्रयाश्रितभाव देखा जाने से नित्यों में भी उसका अनुमान कर लेंगे । अतः मुमुक्षु के लिये अवयव्यभिमान निषिद्ध बताया है, अवयवी नहीं; जैसे रूपादि में मिथ्यासङ्कल्प निषिद्ध किया है, न कि रूपादि ॥ १२ ॥ ‘अवयवी को न मानोगे तो समग्र द्रव्य का ग्रहण न होगा'—( २.१.३५ ) इस प्रक- रण में हम इस शून्यवादी की युक्तियाँ निरस्त कर चुके हैं, अब फिर बात आ पड़ी तो घुमा फिरा कर वह वही युक्तियाँ दे रहा है— तिमिररोगग्रस्त रोगी को केशसमूह की उपलब्धि के समान ही यह उप- लब्धि है ? १३ ॥ जैसे तिमिरोग ( आन्ध्य = मोतियाबिन्द ) ग्रस्त को एक-एक केश नहीं दिखायी देता, परन्तु केशसमूह ( केशों का गुच्छा ) को वह देख लेता है, उसी तरह अवयव ( अणु ) न दिखायी दे पाने पर भी अवयवसमूह ( अणुसमूह = द्रव्य ) दिखायी दे जाता है—यह मान लेने से काम चल सकता है तो अवयवी ( द्रव्यान्तर ) मानने से क्या लाभ ? ॥ १३ ॥