भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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३२४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [४. अ० २. आ० स्वविषयानतिक्रमेणेन्द्रियस्य पटुमन्दभावाद्विषयग्रहणस्य तथाभावो नाविषये प्रवृत्तिः ॥ १४ ॥ यथाविषयमिन्द्रियाणां पटुमन्दभावाद्विषयग्रहणानां पटुमन्दभावो भवति । चक्षुः खलु प्रकृष्यमाणं नाविषयं गन्धं गृह्णाति, निकृष्यमाणं च न स्वविषयात् प्रच्यवते । सोऽयं तैमिरिकः कश्चिच्चक्षुर्विषयं केशं न गृह्णाति, कश्चिद् गृह्णाति केशसमूहम्; उभयं ह्यतैमिरिकेण चक्षुषा गृह्यते । परमाणवस्त्वतीन्द्रिया इन्द्रिया- विषयभूता न केनचिदिन्द्रियेण गृह्यन्ते, समुदितास्तु गृह्यन्ते—इत्यविषये प्रवृत्तिरिन्द्रियस्य प्रसज्येत । न जात्वर्थान्तरमणुभ्यो गृह्यते इति । ते खल्विमे परमाणवः सन्निहिता गृह्यमाणा अतीन्द्रियत्वं जहति, वियुक्ताश्चागृह्यमाणा इन्द्रियविषयत्वं न लभन्ते इति । सोऽयं द्रव्यान्तरानुत्पत्तावतिमहान् व्याघातः । इत्युपपद्यते द्रव्यान्तरं यद् ग्रहणस्य विषय इति । सञ्चयमात्रं विषय इति चेद् ? न; सञ्चयस्य संयोगाभावात् तस्य चातीन्द्रि- यस्याग्रहणादयुक्तम् । सञ्चयः खल्वनेकस्य संयोगः, स च गृह्यमाणाश्रयो गृह्यते स्वविषय (रूपरसादि) के अनतिक्रम से इन्द्रियों के तीव्र मन्द भाव से विषयज्ञान में तीव्रता-मन्दता आ जाती है, अपने से अविषयों में उनकी प्रवृत्ति नहीं हुआ करती ॥१४॥ स्व-स्व विषय के अनुसार, इन्द्रियों की पटुता-मन्दता से विषयज्ञान में पटुता-मन्दता आ जाती हैं । चक्षु पर कितना भी दबाव डाला जाये वह अपने अविषय गन्ध का ग्रहण नहीं कर पाती । या उस पर कितना भी नियन्त्रण रखा जाये वह स्वविषय (रूप) से प्रच्युत भी नहीं होती । यहाँ कोई तिमिररोगी चक्षुर्विषय केश को नहीं देख पाता, कोई केशसमूह को देख लेता है; परन्तु स्वस्थनेत्र पुरुष केश तथा केशसमूह—दोनों को देख सकता है। परन्तु परमाणु तो अतीन्द्रिय होने से इन्द्रिय के अविषय हैं वे किसी भी चक्षु से देखे नहीं जा सकते, हाँ वे समुदित हों तो देखे जा सकते हैं। तात्पर्य यह निकला कि इन्द्रिय की प्रवृत्ति अविषय में नहीं होगी। यदि ऐसा कहा जाय कि वहाँ परमाणु से अतिरिक्त गृहीत नहीं होता । इसका अर्थ यह हुआ कि परमाणु जब इकट्ठे होते हैं तो अपने अतीन्द्रियत्व को छोड़ देते हैं, पर जब अलग अलग होते हैं तो इन्द्रिय-विषय नहीं बनते । तो जो परमाणु अतीन्द्रिय है वही इन्द्रियविषय भी बन जाता है, यह बात द्रव्या- न्तरानुत्पत्ति में विरुद्ध पड़ रही है । अतः आपके कथन से ही सिद्ध हो जाता है कि जो इन्द्रिय-विषय है वह द्रव्यान्तर (अवयवी) है । परमाणुओं का सञ्चय ही इन्द्रिय का विषय बन जाता है, वह सञ्चय द्रव्यान्तर नहीं है ? ऐसा भी नहीं कह सकते; क्योंकि सञ्चय संयोगसम्बन्ध से अतिरिक्त नहीं है और वह अतीन्द्रिय है-उसका ग्रहण कैसे होगा ! तात्पर्य यह है कि 'सञ्चय' कहते हैं अनेक के