भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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३४६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० वत्साधर्म्यात् क्रियावता भवितव्यम्, न पुनः क्रियावद्वैधर्म्यादक्रियेणेति । विशेष- हेत्वभावाद् वैधर्म्यसमः । वैधर्म्येण चोपसंहारे—'निष्क्रिय आत्मा, विभुत्वात्; क्रियावद् द्रव्यमविभु दृष्टम्—यथा, लोष्टः, न च तथाऽऽत्मा, तस्मान्निष्क्रियः' इति । वैधर्म्येण प्रत्यव- स्थानम्–'निष्क्रियं द्रव्यमाकाशं क्रियाहेतुगुणरहितं दृष्टम्, न तथाऽऽत्मा, तस्मान्न निष्क्रियः' इति । न चास्ति विशेषहेतुः—क्रियावद्वैधर्म्यान्निष्क्रियेण भवितव्यम्, न पुनरक्रियवैधर्म्यात् क्रियावतेति विशेषहेत्वभावाद्वैधर्म्यसमः । अथ साधर्म्यसमः–'क्रियावान् लोष्टः क्रियाहेतुगुणयुक्तो दृष्टः, तथा चाऽऽत्मा, तस्मात् क्रियावान्' इति । न चास्ति विशेषहेतुः–क्रियावद्वैधर्म्यान्निष्क्रियः, न पुनः क्रियावत्साधर्म्यात् क्रियावानिति । विशेषहेत्वभावात् साधर्म्यसमः ॥ २ ॥ अनयोत्तरम्— गोत्वाद गोसिद्धिवत् तत्सिद्धिः ॥ ३ ॥ साधर्म्यमात्रेण वैधर्म्यमात्रेण च साध्यसाधने प्रतिज्ञायमाने स्यादव्यवस्था, हो । विशेष हेतु न होने से यह 'वैधर्म्यसम' प्रतिषेध है । (साधर्म्यसम के प्रतिषेध में आकाश के साथ निष्क्रियत्वरूप साधर्म्य से आत्मा का निष्क्रियत्व सिद्ध किया था, यहाँ इस प्रतिषेध में परिच्छिन्न लोष्ट के साथ अपरिच्छिन्नत्वरूप वैधर्म्य से ही आत्मा का निष्क्रियत्व सिद्ध किया जा रहा है, अतः यह वैधर्म्यसमप्रतिषेध का उदाहरण उचित ही है । ) वैधर्म्य से उपसंहार में दूसरा उदाहरण देते हैं—हेतु का उदाहरण में वैधर्म्य से यों उपसंहार करने पर कि 'आत्मा निष्क्रिय है, विभु होने से, जब कि क्रियावान् द्रव्य अविभु देखा गया है, जैसे लोष्ट; वैसा आत्मा नहीं है, अतः वह निष्क्रिय हैं' ! इस प्रयोग का वैधर्म्य से ही प्रतिषेध करते हैं—'निष्क्रिय द्रव्य आकाश क्रियाहेतुगुणरहित देखा गया है, आत्मा वैसा नहीं है, ( अर्थात् क्रियाहेतुगुणसहित है ) अतः वह निष्क्रिय नहीं है ।' यहाँ कोई विशेष हेतु नहीं दिखाया गया, जिससे हम माने कि क्रियावद्वैधर्म्य से निष्क्रिय ही होना चाहिये, न कि अक्रिय वैधर्म्य से क्रियावान् ! विशेष हेतु न होने से यह 'वैधर्म्यसम' है । इसी में साधर्म्यसम का का उदाहरण देते हैं—'क्रियावान् लोष्ट क्रियाहेतुगुणयुक्त देखा गया है, आत्मा भी वैसा ही है, अतः वह भी क्रियावान् है ।' यहाँ कोई विशेष हेतु नहीं दिखाया गया कि हम समझें—क्रियावद्वैधर्म्य से ही निष्क्रिय सिद्ध हो तथा क्रियावत्सा- धर्म्य से क्रियावान् सिद्ध न हो । विशेष हेतु न होने से यह प्रयोग 'साध्यसम' है ॥ २॥ इन साधर्म्यसम तथा वैधर्म्यसम के असदुत्तरत्व में हेतु ( = खण्डन ) बतलाते हैं— गोत्व से गोसिद्धि की तरह उसकी सिद्धि है ॥ ३ ॥ केवल साधर्म्य या वैधर्म्य से साध्यसिद्धि की प्रतिज्ञा में तो अव्यवस्था हो जायगी ।