न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 365, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें'४. सू० ] उत्कर्षसमादिजातिषट्कप्रकरणम् ३४७ सा तु धर्मविशेषे नोपपद्यते, गोसाधर्म्याद् गोत्वाज्जातिविशेषाद् गौः सिद्ध्यति, न तु सास्नादिसम्बन्धात्¹। अश्वादिवैधर्म्याद् गोत्वादेव च गौः सिद्ध्यति, न गुणादिभेदात्। तच्चैतत् कृतव्याख्यानमवयवप्रकरणे—'प्रमाणानामभिसम्ब- न्धाच्चैकार्थकारित्वं समानं वाक्ये' इति ( १.१.३९ ) । हेत्वाभासाश्रया खल्विय- मव्यवस्थेति ॥ ३ ॥ उत्कर्षसमादिजातिषट्कप्रकरणम् [ ४-६ ] साध्यदृष्टान्तयोर्धर्मविकल्पादुभयसाध्यत्वाच्चोत्कर्षापकर्षवर्ण्यवर्ण्य- विकल्पसाध्यसमाः ॥ ४ ॥ दृष्टान्तधर्मं साध्ये समासजतः उत्कर्षसमः। यदि क्रियाहेतुगुणयोगाल्लोष्टवत् क्रियावानात्मा, लोष्टवदेव स्पर्शवानपि प्राप्नोति। अथ न स्पर्शवान्, लोष्टवत् क्रियावानपि न प्राप्नोति। विपर्यये वा विशेषो वक्तव्य इति। साध्ये धर्माभावं दृष्टान्तात् प्रसजतोऽपकर्षसमः। लोष्टः खलु क्रियावान् विभुर्दृष्टः, काममात्माऽपि क्रियावान् विभुरस्तु, विपर्यये वा विशेषो वक्तव्य इति। ख्यापनीयो वर्ण्यः, विपर्ययादवर्ण्यः। तावेतौ साध्यदृष्टान्तधर्मौ विपर्यस्यतो किन्तु यह अव्यवस्था धर्मविशेष ( स्वाभाविक व्याप्तिसम्बन्ध ) में नहीं बनेगी। गौ की सिद्धि गोसाधर्म्य द्वारा गोत्वजातिविशेष से होती है, न कि केवल सास्नादि सम्बन्ध से। इसी तरह अश्वादि वैधर्म्य द्वारा गोत्व से ही गौ सिद्ध होती है न कि गुणादिभेद से। इन सब बातों का हम पीछे 'अवयवप्रकरण' ( १. १. ३९ ) में विस्तृत व्याख्यान कर चुके हैं कि 'प्रमाणों के अभिसम्बन्ध से वाक्य में एकार्थकारित्व समान ही हैं'। इस जात्युद्भा- वन से की जानेवाली अव्यवस्था का प्रयोग असत् साधनों ( हेत्वाभासों ) में करना चाहिये, न कि सत्साधनों (हेतुओं) में ॥ ३ ॥ साध्य तथा दृष्टान्त के धर्मविकल्प से दोनों के ही सिद्ध होने से उत्कर्षसम, अप- कर्षसम, वर्ण्यसम, अवर्ण्यसम, विकल्पसम तथा साध्यसम—ये ६ प्रतिषेध बनते हैं ॥४॥ 'दृष्टान्त में अन्य दृष्ट धर्म का साध्य में वर्तमान धर्म के साथ आपादन 'उत्कर्षसम' प्रतिषेध कहलाता है। जैसे—यदि क्रियाहेतुगुणयोग से लोष्ट की तरह आत्मा क्रियावान् है तो वह लोष्ट की तरह स्पर्शवान् भी होना चाहिये, यदि स्पर्शवान् नहीं है तो लोष्ट की तरह क्रियावान् भी नहीं हो सकता। विपर्यय में विशेष हेतु बतलाना होगा। दृष्टान्त में दृष्ट धर्माभाव को साध्य में आपादन करना 'अपकर्षसम' कहलाता है; जैसे—'लोष्ट क्रियावान् तथा अविभु देखा गया है, क्यों न आत्मा को भी ऐसा ही मान लें, विपरीत में विशेष हेतु देना होगा। पक्ष एवं दृष्टान्त में साधर्म्यमात्र से पक्षधर्मत्व का निर्णय करना 'वर्ण्यसम' कहलाता है ! १. 'सास्नादीत्यतद्गुणसंविज्ञानो बहुव्रीहिः, तेन व्यभिचारिणः शृङ्गादयो गृह्यन्ते' इति तात्पर्याचार्याः ।