न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११. सू०] प्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तसमप्रकरणम् ३५१ अनयोरुत्तरम्— प्रदीपोपादानप्रसङ्गनिवृत्तिवत् तन्निवृत्तिः ॥ १० ॥ इदं तावदयं पृष्टो वक्तुमर्हति–अथ के प्रदीपमुपाददते ? किमर्थं वेति ? दिदृक्षमाणा दृश्यदर्शनार्थमिति। अथ प्रदीपं दिदृक्षमाणाः प्रदीपान्तरं कस्मान्नोपाददते ? अन्तरेणापि प्रदीपान्तरं दृश्यते प्रदीपः, तत्र प्रदीपदर्शनार्थं प्रदीपोपादानं निरर्थकम्। अथ दृष्टान्तः किमर्थमुच्यत इति ? अप्रज्ञातस्य ज्ञापनार्थमिति। अथ दृष्टान्ते कारणापदेशः किमर्थं मृग्यते ? यदि प्रज्ञापनार्थम्, प्रज्ञातो दृष्टान्तः। स खलु 'लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिन्नर्थे बुद्धिसाम्यं स दृष्टान्तः' इति। तत्प्रज्ञापनार्थः कारणापदेशो निरर्थक इति प्रसङ्गसमस्योत्तरम् ॥ १० ॥ अथ प्रतिदृष्टान्तसमस्योत्तरम्— प्रतिदृष्टान्तहेतुत्वे च नाहेतुर्दृष्टान्तः ॥ ११ ॥ प्रतिदृष्टान्तं ब्रुवता न विशेषहेतुरुपदिश्यते–'अनेन प्रकारेण प्रतिदृष्टान्तः साधकः, न दृष्टान्तः' इति। एवम् 'प्रतिदृष्टान्तहेतुत्वे नाहेतुर्दृष्टान्तः' इत्युप- पद्यते। स च कथं हेतुर्न स्याद् ? यद्यप्रतिषिद्धः साधकः स्यादिति ॥ ११ ॥ इन दोनों में से 'प्रसङ्गसम' का समाधान यह है— दीपक के ग्रहण में प्रसङ्गनिवृत्ति की तरह इस प्रसङ्गसम की निवृत्ति है ॥ १० ॥ वादी, प्रतिवादी द्वारा उक्त प्रतिषेध करने पर, उससे यह पूछे–'प्रदीप को कौन तथा क्यों चाहते हैं'? वह कहेगा—'देखना चाहने वाले, दृश्य विषय को देखने के लिये'। तब उससे पूछिये—'वे देखना चाहनेवाले उस प्रदीप को देखने के लिये दूसरा प्रदीप क्यों नहीं चाहते ?' वह कहेगा 'दूसरे प्रदीप के बिना भी यह प्रदीप दीखता है, अतः वहाँ प्रदीप को देखने के लिये दूसरे प्रदीप का ग्रहण निरर्थक है। तब फिर उससे पूछें कि 'दृष्टान्त किस लिये दिया जाता हैं' ? वह कहेगा 'अप्रज्ञात के ज्ञापन के लिये'। 'फिर दृष्टान्त में कारणाभिधान क्यों चाहते हो ? यदि प्रज्ञापन के लिये, तो दृष्टान्त तो जाना हुआ है। दृष्टान्त इसे ही न कहते हो कि जहाँ लौकिक तथा परीक्षक–दोनों का बुद्धिसाम्य हो जाये (१.१.२५)। अब उस दृष्टान्त को बतलाने कें लिये कारणाभिधान निरर्थक ही हैं'। यह उक्त 'प्रसङ्गसम' का समाधान है ॥ १० ॥ अब 'प्रतिदृष्टान्तसम' का समाधान सुनिये— प्रतिदृष्टान्त के समाधानसामर्थ्य में दृष्टान्त असाधन नहीं है ॥ ११ ॥ प्रतिदृष्टान्त उपस्थित करने वाले प्रतिवादी द्वारा किसी विशेष हेतु का अभिधान नहीं किया जाता कि इस प्रकार प्रतिदृष्टान्त साध्य का साधक है, अपितु दृष्टान्त नहीं। यों, प्रतिदृष्टान्त का साधकत्व मानने वाले को दृष्टान्त का भी साधकत्व मानना ही पड़ेगा। वह प्रतिदृष्टान्त दृष्टान्तहेतु क्यों नहीं होगा ? जब कि दृष्टान्त किसी बलवत्तर प्रमाण से बाधित न हो। अतः प्रतिदृष्टान्त के रहते हुए भी दृष्टान्त का साधकत्व अवश्य स्वीकार करना ही पड़ेगा ॥ ११ ॥