न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३५२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १ आ० अनुत्पत्तिसमप्रकरणम् [ १२-१३ ] प्रागुत्पत्तेः कारणाभावादनुत्पत्तिसमः ॥ १२ ॥ 'अनित्यः शब्दः प्रयत्ननान्तरीयकत्वाद् घटवत्' इत्युक्ते, अपर आह— प्रागुत्पत्तेरनुत्पन्ने शब्दे प्रयत्ननान्तरीयकत्वमनित्यत्वकारणं नास्ति, तदभावाद् नित्यत्वं प्राप्तम्, नित्यस्य चोत्पत्तिर्नास्ति । अनुत्पत्त्या प्रत्यवस्थानम् अनु- त्पत्तिसमः ॥ १२ ॥ अस्योत्तरम्— तथाभावादुत्पन्नस्य कारणोपपत्तेर्न कारणप्रतिषेधः ॥ १३ ॥ तथाभावादुत्पन्नस्येति—उत्पन्नः खल्वयम् 'शब्दः' इति भवति, प्रागुत्पत्तेः शब्द एव नास्ति । उत्पन्नस्य शब्दभावाच्छब्दस्य सतः प्रयत्ननान्तरीयकत्वम- नित्यत्वकारणमुपपद्यते, कारणोपपत्तेरयुक्तोऽयं दोषः—'प्रागुत्पत्तेः कारणा- भावात्' इति ॥ १३ ॥ संशयसमप्रकरणम् [ १४-१५ ] सामान्यदृष्टान्तयोरैन्द्रियकत्वे समाने नित्यानित्यसाधर्म्यात् संशयसमः ॥ १४ ॥ 'अनित्यः शब्दः प्रयत्ननान्तरीयकत्वाद् घटवत्' इत्युक्ते, हेतौ संशयेन अब 'अनुत्पत्तिसम' का लक्षण करते हैं— उत्पत्ति से पूर्व कारण के अभाव से 'अनुत्पत्तिसम' प्रतिषेध होता है ॥ १२ ॥ जैसे—'शब्द अनित्य है, प्रयत्न के पश्चात् होने से, घट की तरह'—यह कहने पर प्रतिवादी कहता है—'उत्पत्ति से पूर्व उसमें शब्द अनुत्पन्न है, प्रयत्न के पश्चात् होना अनित्यता का कारण नहीं है, उक्त कारण के अभाव से शब्द में नित्यत्व आ जायेगा, नित्य की उत्पत्ति हुआ नहीं करती'। यों अनुत्पत्ति से प्रतिषेध 'अनुत्पत्तिसम' कह- लाता है ॥ १२ ॥ इसका समाधान है— उत्पन्न के पश्चात् 'शब्द' कहलाने से तथा तभी कारणोपपत्ति से यह कारणाभाव प्रतिषेध नहीं बनेगा ॥ १३ ॥ उत्पन्न होने पर ही यह 'शब्द' कहलाता है; क्योंकि उत्पत्ति से पूर्व वह 'शब्द' था ही नहीं ! उत्पन्न होने से शब्द का प्रयत्न के पश्चात् होना अनित्यत्वकारण बनता है । इस कारणोपपादन से आपका उत्पत्ति से पूर्व कारणाभाव वाला प्रतिषेध अयुक्त है ॥ १३ ॥ 'संशयसम' का लक्षण— सामान्य और दृष्टान्त में ऐन्द्रियकत्व समान होने से नित्यानित्य सादृश्य से 'संशयसम' प्रतिषेध होता है ॥ १४ ॥ 'शब्द अनित्य है, प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने के कारण, घट की तरह' ऐसा प्रयोग