भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 371, कुल 410 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 371

१५. सू० ] संशयसमप्रकरणम् ३५३ प्रत्यवतिष्ठते—सति प्रयत्नानन्तरीयकत्वे अस्त्येवास्य नित्येन सामान्येन साधर्म्य- मैन्द्रियकत्वम्, अस्ति च घटेनानित्येन । अतो नित्यानित्यसाधर्म्यादनिवृत्तः संशय इति ॥ १४ ॥ अस्योत्तरम्— साधर्म्यात् संशये न संशयो वैधर्म्यादुभयथा वा संशयेऽत्यन्तसंशयप्रसङ्गो नित्यत्वानभ्युपगमाच्च सामान्यस्याप्रतिषेधः ॥ १५ ॥ विशेषाद् वैधर्म्यादवधार्यमाणेऽर्थे ‘पुरुष:’ इति, न स्थाणुपुरुषसाधर्म्यात् संशयोऽवकाशं लभते । एवं वैधर्म्याद्विशेषात् प्रयत्नानन्तरीयकत्वादवधार्यमाणे शब्दस्यानित्यत्वे नित्यानित्यसाधर्म्यात् संशयोऽवकाशं न लभते । यदि वै लभेत, ततः स्थाणुपुरुषसाधर्म्यानुच्छेदादत्यन्तं संशयः स्यात् । गृह्यमाणे च विशेषे नित्यं साधर्म्यं संशयहेतुरिति नाभ्युपगम्यते । न हि गृह्यमाणे पुरुषस्य विशेषे स्थाणुपुरुसाधर्म्यं संशयहेतुर्भवति ॥ १५ ॥ देने पर उसमें संशय करके उसका प्रतिषेध किया जा सकता है कि इसके प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने पर भी, जैसे गोत्वादि जाति इन्द्रियगोचर होने पर भी नित्य है, तथा घटादि इन्द्रियगोचर होने पर भी अनित्य है, अतः नित्य सामान्य तथा अनित्य घट में ऐन्द्रियकत्व साधर्म्य है। यों नित्यानित्यसाधर्म्य से इसमें संशय बना ही रह गया ? ॥ १४ ॥ इसका समाधान यह है— साधर्म्य से संशय होने पर उसे वैधर्म्य से मिटाया जा सकता हैं, दोनों ही तरह से संशय मानने पर कभी संशय मिटेगा ही नहीं; अपि च, नित्यत्व के अनभ्युपगम के पश्चात् साधर्म्य से उक्त प्रतिषेध युक्त नहीं ॥ १५ ॥ विभेदक वैधर्म्य ( असमानता ) से निश्चित किये अर्थ में पुनः ‘पुरुष’ इस ज्ञान में स्थाणु-पुरुष के सादृश्यमात्र से संशय का अवसर नहीं होता। इसी तरह वैधर्म्य से जैसे प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने के कारण शब्द में अनित्यत्व निश्चित हो जाने पर नित्यानित्य- सादृश्यमात्र से संशय को अवसर नहीं मिल पाता । यदि तब भी संशय होता रहेगा तो स्थाणुपुरुष का साधारण सादृश्य कभी नष्ट होगा ही नहीं, यों संशय भी सदा बना रहेगा—यह एक अनिष्ट अनवस्था पैदा हो जायेगी । भेद के गृहीत हो जाने पर भी नित्यसादृश्य संशयहेतु बना रहे—यह नहीं माना जा सकता; क्योंकि लोक में यह नहीं देखा जाता कि पुरुष का विशेष ( भेदक ) से विशेष धर्म का ज्ञान हो जाने पर भी स्थाणु-पुरुषसाधर्म्य संशयहेतु रूप में उपस्थित रहे ॥ १५ ॥ अब ‘प्रकरणसम’ का लक्षण करते हैं— न्या० द० ४५