भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 372, कुल 410 में से

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३५४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० प्रकरणसमप्रकरणम् [ १६-१७ ] उभयसाधर्म्यात्१ प्रक्रियासिद्धेः प्रकरणसमः ॥ १६ ॥ 'उभयेन नित्येन चानित्येन च साधर्म्यात् पक्षप्रतिपक्षयोः प्रवृत्तिः = प्रक्रिया । 'अनित्यः शब्दः प्रयत्नानन्तरीयकत्वाद् घटवत्' इत्येकः पक्षं प्रवर्त्तयति, द्वितीयश्च नित्यसाधर्म्यात् । एवं च सति 'प्रयत्नानन्तरोयकत्वात्' इति हेतुरनित्यसाधर्म्ये- णोच्यमानो न प्रकरणमतिवर्त्तते । प्रकरणानतिवृत्तेर्निर्णयानतिवर्तनम् । समानं चैतन्नित्यसाधर्म्येणोच्यमाने हेतौ। तदिदं प्रकरणानतिवृत्त्या प्रत्यवस्थानं प्रकरण- समः। समानं चैतद्वैधर्म्येऽपि, उभयवैधर्म्यात् प्रक्रियासिद्धेः प्रकरणसम इति ॥१६॥ अस्योत्तरम्— प्रतिपक्षात् प्रकरणसिद्धेः प्रतिषेधानुपपत्तिः प्रतिपक्षोपपत्तेः ॥ १७ ॥ उभयसाधर्म्यात् प्रक्रियासिद्धिं ब्रुवता प्रतिपक्षात् प्रक्रियासिद्धिरुक्ता भवति, यद्युभयसाधर्म्यम्, तत्र एकतरः प्रतिपक्ष इत्येवं सत्युपपन्नः प्रतिपक्षो भवति । प्रतिपक्षोपपत्तेरनुपपन्नः प्रतिषेधः । यदि प्रतिपक्षोपपत्तिः, प्रतिषेधो नोपपद्यते । अथ प्रतिषेधोपपत्तिः, प्रतिपक्षो नोपपद्यते; यतः प्रतिपक्षोपपत्तिः, प्रतिषे- दोनों के साधर्म्य से प्रक्रियासिद्धि होने पर 'प्रकरणसम' प्रतिषेध होता है ॥१६॥ उभय—नित्य तथा अनित्य के साथ सादृश्य होने से पक्ष तथा प्रतिपक्ष की प्रवृत्ति 'प्रक्रिया' कहलाती है। जैसे—'शब्द अनित्य है, प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने से, घट की तरह' यह एक पक्ष कहता है। तथा दूसरा ( प्रतिपक्षी ) पूर्वोक्त नित्यसाधर्म्य से उसे 'नित्य' कहता है । इस प्रकार 'प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने से' यह हेतु अनित्य- साधर्म्य से कहा जाता हुआ प्रकरण प्रक्रिया को अतिक्रान्त नहीं करता । अतिक्रम न होने से निर्णय अतिक्रमण नहीं कर सकता; क्योंकि यह बात नित्यसाधर्म्य से कहे गये हेतु में भी तुल्य ही पड़ेगी । यों, प्रकरणानतिक्रम से प्रतिषेध करना 'प्रकरणसम' कहलाता है । यह सब प्रक्रिया वैधर्म्य में भी समझ लेनी चाहिये । नित्य तथा अनित्य के वैधर्म्य से प्रक्रियासिद्धि होने पर भी 'प्रकरणसम' प्रतिषेध होता है ॥ १६ ॥ इसका उत्तर है— प्रतिपक्ष से प्रकरणसिद्धि होने पर प्रतिपक्ष की उपपत्ति होने से प्रतिषेध का उपपादन नहीं होता ॥ १७ ॥ उभयसादृश्य से प्रक्रियासिद्धि कहने वाले के द्वारा प्रतिपक्ष ( स्थापनावादी ) से ही प्रक्रियासिद्धि कही जाती है । जब उभयसादृश्य है तो उनमें से किसी में बाध अवश्य होगा, तब एक प्रतिपक्ष होगा ( एक की पराजय होगी ) ही, वही वास्तविक प्रतिपक्ष है । जब प्रतिपक्ष बन गया तो 'प्रकरणसम' दोष कहाँ रहा ! यदि 'प्रकरणसम' है तो १. 'साधर्म्यादित्युपलक्षणम्, उभयवैधर्म्यादित्यपि द्रष्टव्यम्' इति तात्पर्यकृतः ।

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