भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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१९. सू० ] अहेतुसमप्रकरणम् ३५५ धोपपत्तिश्चेति विप्रतिषिद्धमिति । तत्त्वानवधारणाच्च प्रक्रियासिद्धिः, विपर्यये प्रकरणावसानात् । तत्त्वावधारणे ह्यवसितं प्रकरणं भवतीति ॥ १७ ॥ अहेतुसमप्रकरणम् [ १८-२० ] त्रैकाल्यासिद्धेर्हेतोरहेतुसमः ॥ १८ ॥ हेतुः = साधनम्, तत् साध्यात् पूर्वं पश्चात् सह वा भवेत् ? यदि पूर्वं साधनम्, असति साध्ये कस्य साधनम् ? अथ पश्चात्, असति साधने कस्येदं साध्यम् ? अथ युगपत् साध्यसाधने, द्वयोर्विद्यमानयोः किं कस्य साधनं किं कस्य साध्यमिति हेतुरहेतुना न विशिष्यते ! अहेतुना साधर्म्यात् प्रत्यवस्थानम् — अहेतुसमः ॥ १८ ॥ अस्योत्तरम्— न हेतुतः साध्यसिद्धेस्त्रैकाल्यासिद्धिः ॥ १९ ॥ न त्रैकाल्यासिद्धिः, कस्मात् ? हेतुतः साध्यसिद्धेः । निर्वर्तनोयस्य निर्वृत्तिः, विज्ञेयस्य विज्ञानम्—उभयं कारणतो दृश्यते, सोऽयं महान् प्रत्यक्षविषय उदाहरण- मिति । यत्तु खलूक्तम्—असति साध्ये कस्य साधनमिति ? यत्तु निर्वर्त्यते यच्च विज्ञाप्यते तस्येति ॥ १९ ॥ प्रतिपक्ष कहाँ बना ! वाध होने के कारण प्रतिपक्ष भी वने और प्रकरणसमप्रयुक्त प्रति- षेध भी रह जाये—ये दोनों बातें परस्पर विरुद्ध हैं। प्रमाता जब तक अनुसन्धान से तत्त्व का अवधारण नहीं कर सकता, तभी तक प्रक्रिया रहती है। इस प्रकरणसम में प्रतिषेध नहीं बनता। तत्त्व का निश्चय हो जाने पर प्रक्रिया (प्रकरण) कैसी ! ॥ १७ ॥ 'अहेतुसम' का लक्षण करते हैं— हेतु साध्य के तीनों कालों में सिद्ध न होने के कारण 'अहेतुसम' दोष कहलाता है ॥ १८ ॥ हेतु अर्थात् साधन । वह साध्य से पहले, वाद में, या साथ में—कहाँ रहे ? यदि पहले साधन (ज्ञापक) तथा साध्य (ज्ञाप्य) बाद में. तो साध्य के बिना साधन किसका ! यदि वाद में है तो साधन के न रहते यह साध्य किसका ! यदि साध्य साधन एक साथ हैं तो दोनों के विद्यमान रहते कौन किसका साधन तथा कौन किसका साध्य है—इसका निर्णय कौन करेगा; क्योंकि हेतु अहेतु से विभेद्य नहीं होता। यों, अहेतु के साथ साधर्म्य से प्रतिषेध 'अहेतुसम' है ॥ १८ ॥ इसका समाधान है— हेतु से साध्यसिद्धि हो जाने से त्रैकाल्यसिद्धि नहीं है ॥ १९ ॥ त्रैकाल्यासिद्धि नहीं है; क्योंकि हेतु से साध्य की सिद्धि हो जाती है। कार्य का कारण तथा ज्ञाप्य का ज्ञापन दोनों ही अपने-अपने कारणों से देखे जाते हैं—यह लोकप्रत्यक्ष- सिद्ध बात है । यह जो कहा कि—'साध्य के न होने पर साधन किसका ?' तो हम कहते हैं जो उत्पन्न किया जाता है तथा जो विज्ञापित किया जाता है उसका ! ॥ १९ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

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