न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३५६ : वात्स्यायनभाष्यसंहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० प्रतिषेधानुपपत्तेश्च प्रतिषेद्धव्याप्रतिषेधः ॥ २० ॥ पूर्वं पश्चाद्युगपद्वा प्रतिषेध इति नोपपद्यते । प्रतिषेधानुपपत्तेः स्थापनाहेतुः सिद्ध इति ॥ २० ॥ अर्थापत्तिसमप्रकरणम् [ २१-२२ ] अर्थापत्तितः प्रतिपक्षसिद्धेरर्थापत्तिसमः ॥ २१ ॥ 'अनित्यः शब्दः प्रयत्नानन्तरीयकत्वाद् घटवत्' इति स्थापिते पक्षे अर्थापत्त्या प्रतिपक्षं साधयतोऽर्थापत्तिसमः । यदि प्रयत्नानन्तरीयकत्वादनित्य- साधर्म्यात् 'अनित्यः शब्दः' इत्यर्थादापद्यते—नित्यसाधर्म्यात् 'नित्यः' इति, अस्ति त्वस्य नित्येन साधर्म्यम्—अस्पर्शत्वमिति ॥ २१ ॥ अस्योत्तरम्— अनुक्तस्यार्थापत्तेः पक्षहानेरुपपत्तिरनुक्तत्वादनैकान्तिकत्वाच्चार्थापत्तेः ॥ २२ ॥ अनुपपाद्य सामर्थ्यमनुक्तमर्थादापद्यते इति ब्रुवतः पक्षहानेरुपपत्तिरनुक्तत्वात्, अनित्यपक्षसिद्धावर्थापन्नं नित्यपक्षस्य हानिरिति । अनैकान्तिकत्वाच्चार्थापत्तेः । और प्रतिषेध की अनुपपत्ति से प्रतिषेद्धव्य का प्रतिषेध नहीं बनता ॥ २० ॥ जैसे आपके कथनानुसार साध्य तथा साधन का साध्यत्व और साधनत्व पूर्व-पश्चात्- सहभाव में नहीं बनता तो 'पहले, बाद में या साथ में प्रतिषेध' वाली बात उपपन्न कैसे करोगे ? प्रतिषेध उपपन्न न होने से स्थापनाहेतु सिद्ध हो गया ॥ २० ॥ 'अर्थापत्तिसम' का लक्षण करते हैं— अर्थापत्ति से प्रतिपक्ष की सिद्धि 'अर्थापत्तिसम' प्रतिषेध कहलाता है ॥ २१ ॥ 'शब्द अनित्य है, प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने से, घट की तरह'—यों पक्ष स्थापित करने पर अर्थापत्ति से प्रतिपक्ष स्थापित करने वाले का 'अर्थापत्तिसम' प्रतिषेध कहलाता है । यदि प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने में अनित्यसादृश्य से शब्द अनित्य है तो यह भी अर्थादापन्न होता है कि नित्यसादृश्य से वह नित्य भी हो सकता है; क्योंकि इसका नित्य के साथ भी अस्पर्शत्वरूप सादृश्य तो है ही ॥ २१ ॥ इसका समाधान यह है— अनुक्त को अर्थादापन्न कहा जाने से तथा अनैकान्तिक होने से अर्थापत्ति से पक्षहानि ही बनती है ॥ २२ ॥ अर्थापत्ति द्वारा सामर्थ्य का उपपादन करते हुए अनुक्त का भी अर्थादापादन मानने वाले को अपने पक्ष की हानि ही उठानी पड़ेगी; क्योंकि उसके पक्ष में भी अनुक्त का आपादन किया जा सकता है । अतः 'उत्पन्न होने से शब्द अनित्य है' इसका अर्थापत्ति से 'अस्पृष्ट होने से वह नित्य है'—ऐसे पक्ष की हानि अर्थादेव सिद्ध हो जाती है ।