भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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३७६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ० हेतूदाहरणाधिकमधिकम् ॥ १३ ॥ एकेन कृतत्वाद् अन्यतरस्यानर्थक्यमिति तदेतन्नियमाभ्युपगमे वेदित- व्यमिति ॥ १३ ॥ पुनरुक्तनिग्रहस्थानप्रकरणम् [ १४-१५ ] शब्दार्थयोः पुनर्वचनं पुनरुक्तमन्यत्रानुवादात् ॥ १४ ॥ अन्यत्रानुवादात् शब्दपुनरुक्तमर्थपुनरुक्तं वा, नित्यः शब्दो नित्यः शब्द इति शब्दपुनरुक्तम्। अर्थपुनरुक्तम्-अनित्यः शब्दो निरोधधर्मको ध्वनिरिति ॥ १४ ॥ अनुवादे त्वपुनरुक्तं शब्दाभ्यासादर्थविशेषोपपत्तेः' ॥ १५ ॥ यथा हेत्वपदेशात् प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनमिति ॥ १५ ॥ अर्थादापन्नस्य स्वशब्देन पुनर्वचनम् ॥ १६ ॥ पुनरुक्तमिति प्रकृतम्। निदर्शनम्-उत्पत्तिधर्मकत्वादनित्यमित्युक्त्वा अर्थादापन्नस्य योऽभिधायकः शब्दस्तेन स्वशब्देन ब्रूयाद्-अनुत्पत्तिधर्मकं नित्यम् इति, तच्च पुनरुक्तं वेदितव्यम्। अर्थसम्प्रत्ययार्थे शब्दप्रयोगे प्रतीतः सोऽर्थोऽर्था- पत्त्येति ॥ १६ ॥ हेतु तथा उदाहरणों की अधिकता से 'अधिक' निग्रहस्थान कहलाता हैं ॥ १३ ॥ एक ही हेतु तथा उदाहरण से काम चल जाने पर भी पुनः हेतु आदि का प्रयोग 'अधिक' निग्रहस्थान कहलाता है। परन्तु परिषद् या प्रतिवादी की जिज्ञासा हो तो अधिक हेतु या उदाहरण दिये जा सकते हैं, तब निग्रहस्थान नहीं होता ॥ १३ ॥ शब्द या अर्थ का पुनर्वचन 'पुनरुक्त' कहलाता है; अनुवाद को छोड़ कर ॥ १४ ॥ अनुवाद को छोड़कर, पुनरुक्त निग्रहस्थान 'शब्द पुनरुक्त' तथा 'अर्थ-पुनरुक्त'- यों दो प्रकार का है। जैसे 'शब्द नित्य है, शब्द नित्य है'-यह 'शब्दपुनरुक्त' हुआ। 'शब्द अनित्य है, ध्वनि निरोधधर्मक है'-यह 'अर्थपुनरुक्त' हुआ ॥ १४ ॥ अनुवाद में दो बार बोलना 'पुनरुक्त' नहीं होता, क्योंकि वहाँ शब्द के दुहराने से अर्थविशेष का बोध होता है ॥ १५ ॥ जैसे हेतुकथन के अनन्तर प्रतिज्ञा का पुनः दुहराना 'निगमन' कहलाता है ॥ १५ ॥ अर्थादापन्न (अर्थ से गृहीत) का स्वशब्द से पुनर्वचन भी ॥ १६ ॥ 'पुनरुक्त' कहलाता है। उदाहरण है जैसे-'उत्पत्तिधर्मक होने से अनित्य हैं'- कहकर अर्थादापन्न वस्तु के बोधक शब्द को पुनः कहना कि 'अनुत्पत्तिधर्मक अनित्य होता है।' यह अर्थादापन्न का पुनर्वचन 'पुनरुक्त' समझना चाहिये। अर्थज्ञान के लिए शब्द-प्रयोग होने पर जिस अर्थ को अवगत कराता है वह अर्थ अर्थापत्ति से भी गृहीत हो सकता है। अतः उसका पुनर्वचन निग्रहस्थान माना गया है ॥ १६ ॥ १. न्यायसूचीनिबन्धेऽसंगृहीतमपीदं सूत्रं वार्तिकस्वारस्येनात्र गृहीतम् ।