भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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२०. सू० ] उत्तरविरोधिनिग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् ३७७ उत्तरविरोधिनिग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् [ १७-२० ] विज्ञातस्य परिषदा त्रिरभिहितस्याप्यप्रत्युच्चारणमननुभाषणम् ॥ १७ ॥ विज्ञातस्य वाक्यार्थस्य परिषदा, प्रतिवादिना वा त्रिरभिहितस्य यदप्रत्यु- च्चारणं तदननुभाषणं नाम निग्रहस्थानमिति । अप्रत्युच्चारयन् किमाश्रयं परपक्षप्रतिषेधं ब्रूयात् ! ॥ १७ ॥ अविज्ञातं चाज्ञानम् ॥ १८ ॥ विज्ञातार्थस्य परिषदा, प्रतिवादिना त्रिरभिहितस्य यदविज्ञानं तदज्ञानं निग्रहस्थानमिति । अयं खल्वविज्ञाय कस्य प्रतिषेधं ब्रूयादिति ॥ १८ ॥ उत्तरस्याप्रतिपत्तिरप्रतिभा ॥ १९ ॥ परपक्षप्रतिषेध उत्तरम्, तद्यदा न प्रतिपद्यते तदा निगृहीतो भवति ॥ १९ ॥ कार्यव्यासङ्गात् कथाविच्छेदो विक्षेपः ॥ २० ॥ यत्र कर्तव्यं व्यासज्य कथां व्यवच्छिनत्ति—'इदं मे करणीयं विद्यते तस्मिन्न- वसिते पश्चात्कथयामि' इति विक्षेपो नाम निग्रहस्थानम् । एकनिग्रहावसानायां कथायां स्वयमेव कथान्तरं प्रतिपद्यत इति ॥ २० ॥ परिषद् द्वारा जाने हुए अर्थ का तीन बार कहे जाने पर भी उच्चारण न करना 'अननुभाषण' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ १७ ॥ परिषद् द्वारा जाने अर्थ को प्रतिवादी द्वारा तीन बार कहे जाने पर भी ( ज्ञात वाक्यार्थ का ) उच्चारण न करना 'अननुभाषण' निग्रहस्थान कहलाता है । ( वादी ) उच्चारण नहीं करता है तो किसका सहारा लेकर प्रतिवादी का खण्डन करेगा ! ॥१७॥ जिसे न समझ पाये वह 'अज्ञान' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ १८ ॥ प्रतिवादी द्वारा तीन बार उक्त तथा परिषद् द्वारा ज्ञात अर्थ को वादी जब न समझ पावे वह 'अज्ञान' निग्रहस्थान है । यह बिना जाने किसका खण्डन करेगा ! ॥ १८ ॥ उत्तर न देना 'अप्रतिभा' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ १९ ॥ परपक्ष का खण्डन 'उत्तर' कहलाता है, उसे जब नहीं समझता या वह नहीं स्फुरित होता है तो वादी निगृहीत हो जाता है ॥ १९ ॥ कार्य-व्यासक्तिव्याज से कथाविच्छेद करना 'विक्षेप' निग्रहस्थान कहलाता है ॥२०॥ जहाँ अन्य कार्य में व्यासक्त दिखाकर कथा ( वाद ) को रोक दे कि 'आज तो अब मुझे कुछ कार्य है, उसको पूरा कर उत्तर दे सकूँगा' यह 'विक्षेप' निग्रहस्थान कहलाता है । यद्यपि कार्यव्यासङ्ग से कथा रोक देने पर स्पष्टतः यह तो सिद्ध नहीं होता कि वादी को उत्तर नहीं आया, अतः कथा से उठ गया; क्योंकि हो सकता है कि कार्यावसान के बाद वह उचित उत्तर दे सके, परन्तु इस वर्तमान कथा में तो उत्तर न दे पाने से अभी तो उसका निग्रह हो ही गया । जब कार्यावसानान्तर उत्तर देगा तो वह प्रारम्भ दूसरी कथा का ही कहलायेगा ॥ २० ॥