भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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१२. सू० ] प्रमेयप्रकरणम् २९ कथं चेष्टाश्रयः ? ईप्सितं जिहासितं वाऽर्थमधिकृत्येप्साजिहासाप्रयुक्तस्य तदुपाय्यानुष्ठानलक्षणा समीहा चेष्टा, सा यत्र वर्तते तच्छरीरम् । कथमिन्द्रियाश्रयः ? यस्यानुग्रहेणानुगृहीतानि उपघाते चोपहतानि स्व- विषयेषु साध्वसाधुषु वर्तन्ते, स एषामाश्रयः, तच्छरीरम् । कथमर्थाश्रयः ? यस्मिन्नायतने इन्द्रियार्थसन्निकर्षादुत्पन्नयोः सुखदुःखयोः प्रतिसंवेदनं प्रवर्तते, स एषामाश्रयः, तच्छरीरमिति ॥ ११ ॥ ( ग ) इन्द्रियलक्षणम् भोगसाधनानि पुनः — घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्राणीन्द्रियाणि भूतेभ्यः ॥ १२ ॥ जिघ्रत्यनेनेति घ्राणम्, गन्धं गृह्णातीति । रसयत्यनेनेति रसनम्, रसं गृह्णातीति । चष्टेऽनेनेति चक्षुः, रूपं पश्यतीति । स्पृशत्यनेनेति स्पर्शनं त्वक्स्था- नमिन्द्रियं त्वक् तदुपचारः स्थानादिति । शृणोत्यनेनेति श्रोत्रम्, शब्दं गृह्णातीति । एवं समाख्यानिर्वचनसामर्थ्याद् बोध्यम्—स्वविषयग्रहणलक्षणानीन्द्रियाणीति । शरीर चेष्टाश्रय कैसे है ? ईप्सित या जिहासित विषय के लिए उसकी ईप्सा या जिहासा में प्रवृत्त पुरुष का उसके अधिगम के लिये किया गया स्पन्दन ही 'चेष्टा' कह- लाता है, वह जहाँ रहे, वह शरीर है । वह इन्द्रियाश्रय कैसे है ? इन्द्रियाँ जिसके स्वस्थ रहने पर स्वस्थ तथा अस्वस्थ रहने पर अस्वस्थ रहती हुई भले-बुरे कर्मों में प्रवृत्त होती हैं, वह इनका आश्रय है, वही शरीर है । वह अर्थाश्रय कैसे कहलाता है ? जिस अधिष्ठान के रहते इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से उत्पन्न सुख दुःख का प्रतिसंवेदन प्रवृत्त होता है, वह इनका आश्रय (अवच्छेदक) है, वही शरीर है ॥ ११ ॥ अब भोगसाधनों ( इन्द्रियों ) का व्याख्यान किया जा रहा है— १. घ्राण, २. रसन, ३. चक्षु, ४. त्वक्, ५. श्रोत्र—ये भूतप्रकृतिक ( भौतिक ) इन्द्रियाँ हैं ॥ १२ ॥ जिससे सूंघा जाये—वह घ्राणेन्द्रिय है, यह गन्ध का ग्रहण करती है । जिससे स्वाद चखा जाये—वह रसनेन्द्रिय है, यह रस का ग्रहण करती है । जिससे देखा जाये—वह चक्षुरिन्द्रिय है, यह रूप को देखती है । जिससे स्पर्श किया जाये, जिसका स्थान त्वक् है, वह त्वगिन्द्रिय कहलाती है । इस इन्द्रिय का त्वक् स्थान होने से उपचार द्वारा उस स्थान के नाम पर ही इस इन्द्रिय के नाम का व्यवहार किया जाता है। जिससे सुना जाये—वह श्रोत्रे न्द्रिय है, यह शब्द सुनती है । इस प्रकार स्व स्व संज्ञाओं के यौगिक निर्वचन के कारण यह समझना चाहिये कि अपने-अपने विषय का ग्रहण ही इन्द्रियों का इतर-व्यावर्तक लक्षण है । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri