न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० एकमेनेकार्थदर्शिनं दर्शनप्रतिसन्धातारमन्तरेण न स्यात् । नियतविषये हि बुद्धि- भेदमात्रे न सम्भवति, देहान्तरवदिति । एतेन दुःखहेतौ प्रयत्नो व्याख्यातः । सुखदुःखस्मृत्या चायं तत्साधनमाददानः सुखमुपलभते, दुःखमुपलभते, सुखदुःखे वेदयते । पूर्वोक्त एव हेतुः । बुभुत्समानः खल्वयं विमृशति-किंस्विदिति, विमृशंश्च जानीते—इदमिति, तदिदं ज्ञानं बुभुत्साविमर्शाभ्यामभिन्नकर्तृकं गृह्यमाणमात्मलिङ्गम् । पूर्वोक्त एव हेतुरिति । तत्र देहान्तरवदिति विभज्यते । यथाऽनात्मवादिनो देहान्तरेषु नियत- विषया बुद्धिभेदा न प्रतिसन्धीयन्ते, तथैकदेहविषया अपि न प्रतिसन्धीयेरन्; अविशेषात् । सोऽयमेकसत्त्वस्य समाचारः स्वयं दृष्टस्य स्मरणम्, नान्यदृष्टस्य, नाहष्टस्येति; एवं खलु नानासत्त्वानां समाचारः-अन्यदृष्टमन्यो न स्मरतीति; तदेतदुभयमशक्यमनात्मवादिना व्यवस्थापयितुम् । इत्येवमुपपन्नम्—'अस्त्यात्मा' इति ॥ १० ॥ (ख) शरीरलक्षणम् तस्य भोगाधिष्ठानम्— चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम् ॥ ११ ॥ देहान्तर की तरह हो नहीं सकती । इसी तरह दुःखोत्पादविषयक प्रयत्न का व्याख्यान भी समझना चाहिये । सुख-दुःख-स्मृति से यह प्रमाता उनके साधनों को ग्रहण करता हुआ सुख-दुःख प्राप्त करता है, सुख-दुःख की अनुभूति करता है। इसमें अनुपदोक्त कारण ही समझना चाहिये । जानने की इच्छा करता हुआ विचार करता है कि यह क्या है, विचार करता हुआ जान जाता है कि यह यह है, जब तक इस बुभुत्सा और विमर्श का एक ही कर्ता न होगा तब तक यह ज्ञान नहीं होगा, अतः मानना पड़ेगा कि इन दोनों का एक ही कर्ता 'आत्मा' है। 'देहान्तरवत्' पद की व्याख्या करते हैं । जैसे अनात्मवादी के मत में नियतविषयक बुद्धिभेद का देहान्तर में प्रतिसन्धान नहीं होता, उसी तरह उभयत्र समान स्थिति होने से एकदेह-अनेकदेहविषयक बुद्धिभेद भी प्रतिसन्धि में असमर्थ ही होंगे । जब यह एक प्राणी का स्वभाव है कि वह स्वयम् अनुभूत का ही स्मरण कर सकता है, न कि दूसरे द्वारा अनुभूत या अननुभूत विषय का; तो नाना प्राणियों का भी यही स्वभाव समझना चाहिये कि उनमें दूसरों द्वारा देखे गये का स्मरण दूसरा नहीं कर सकता । ये दोनों ही बातें अनात्मवादी सिद्ध नहीं कर सकते । अतः यह सिद्ध हो गया कि आत्मा है ॥१०॥ उस आत्मा के भोग का आश्रय— चेष्टाश्रय, इन्द्रियाश्रय तथा अर्थाश्रय शरीर है ॥ ११ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri