न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
२८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० एकमेनेकार्थदर्शिनं दर्शनप्रतिसन्धातारमन्तरेण न स्यात् । नियतविषये हि बुद्धि- भेदमात्रे न सम्भवति, देहान्तरवदिति । एतेन दुःखहेतौ प्रयत्नो व्याख्यातः । सुखदुःखस्मृत्या चायं तत्साधनमाददानः सुखमुपलभते, दुःखमुपलभते, सुखदुःखे वेदयते । पूर्वोक्त एव हेतुः । बुभुत्समानः खल्वयं विमृशति-किंस्विदिति, विमृशंश्च जानीते—इदमिति, तदिदं ज्ञानं बुभुत्साविमर्शाभ्यामभिन्नकर्तृकं गृह्यमाणमात्मलिङ्गम् । पूर्वोक्त एव हेतुरिति । तत्र देहान्तरवदिति विभज्यते । यथाऽनात्मवादिनो देहान्तरेषु नियत- विषया बुद्धिभेदा न प्रतिसन्धीयन्ते, तथैकदेहविषया अपि न प्रतिसन्धीयेरन्; अविशेषात् । सोऽयमेकसत्त्वस्य समाचारः स्वयं दृष्टस्य स्मरणम्, नान्यदृष्टस्य, नाहष्टस्येति; एवं खलु नानासत्त्वानां समाचारः-अन्यदृष्टमन्यो न स्मरतीति; तदेतदुभयमशक्यमनात्मवादिना व्यवस्थापयितुम् । इत्येवमुपपन्नम्—'अस्त्यात्मा' इति ॥ १० ॥ (ख) शरीरलक्षणम् तस्य भोगाधिष्ठानम्— चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम् ॥ ११ ॥ देहान्तर की तरह हो नहीं सकती । इसी तरह दुःखोत्पादविषयक प्रयत्न का व्याख्यान भी समझना चाहिये । सुख-दुःख-स्मृति से यह प्रमाता उनके साधनों को ग्रहण करता हुआ सुख-दुःख प्राप्त करता है, सुख-दुःख की अनुभूति करता है। इसमें अनुपदोक्त कारण ही समझना चाहिये । जानने की इच्छा करता हुआ विचार करता है कि यह क्या है, विचार करता हुआ जान जाता है कि यह यह है, जब तक इस बुभुत्सा और विमर्श का एक ही कर्ता न होगा तब तक यह ज्ञान नहीं होगा, अतः मानना पड़ेगा कि इन दोनों का एक ही कर्ता 'आत्मा' है। 'देहान्तरवत्' पद की व्याख्या करते हैं । जैसे अनात्मवादी के मत में नियतविषयक बुद्धिभेद का देहान्तर में प्रतिसन्धान नहीं होता, उसी तरह उभयत्र समान स्थिति होने से एकदेह-अनेकदेहविषयक बुद्धिभेद भी प्रतिसन्धि में असमर्थ ही होंगे । जब यह एक प्राणी का स्वभाव है कि वह स्वयम् अनुभूत का ही स्मरण कर सकता है, न कि दूसरे द्वारा अनुभूत या अननुभूत विषय का; तो नाना प्राणियों का भी यही स्वभाव समझना चाहिये कि उनमें दूसरों द्वारा देखे गये का स्मरण दूसरा नहीं कर सकता । ये दोनों ही बातें अनात्मवादी सिद्ध नहीं कर सकते । अतः यह सिद्ध हो गया कि आत्मा है ॥१०॥ उस आत्मा के भोग का आश्रय— चेष्टाश्रय, इन्द्रियाश्रय तथा अर्थाश्रय शरीर है ॥ ११ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
१२. सू० ] प्रमेयप्रकरणम् २९ कथं चेष्टाश्रयः ? ईप्सितं जिहासितं वाऽर्थमधिकृत्येप्साजिहासाप्रयुक्तस्य तदुपाय्यानुष्ठानलक्षणा समीहा चेष्टा, सा यत्र वर्तते तच्छरीरम् । कथमिन्द्रियाश्रयः ? यस्यानुग्रहेणानुगृहीतानि उपघाते चोपहतानि स्व- विषयेषु साध्वसाधुषु वर्तन्ते, स एषामाश्रयः, तच्छरीरम् । कथमर्थाश्रयः ? यस्मिन्नायतने इन्द्रियार्थसन्निकर्षादुत्पन्नयोः सुखदुःखयोः प्रतिसंवेदनं प्रवर्तते, स एषामाश्रयः, तच्छरीरमिति ॥ ११ ॥ ( ग ) इन्द्रियलक्षणम् भोगसाधनानि पुनः — घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्राणीन्द्रियाणि भूतेभ्यः ॥ १२ ॥ जिघ्रत्यनेनेति घ्राणम्, गन्धं गृह्णातीति । रसयत्यनेनेति रसनम्, रसं गृह्णातीति । चष्टेऽनेनेति चक्षुः, रूपं पश्यतीति । स्पृशत्यनेनेति स्पर्शनं त्वक्स्था- नमिन्द्रियं त्वक् तदुपचारः स्थानादिति । शृणोत्यनेनेति श्रोत्रम्, शब्दं गृह्णातीति । एवं समाख्यानिर्वचनसामर्थ्याद् बोध्यम्—स्वविषयग्रहणलक्षणानीन्द्रियाणीति । शरीर चेष्टाश्रय कैसे है ? ईप्सित या जिहासित विषय के लिए उसकी ईप्सा या जिहासा में प्रवृत्त पुरुष का उसके अधिगम के लिये किया गया स्पन्दन ही 'चेष्टा' कह- लाता है, वह जहाँ रहे, वह शरीर है । वह इन्द्रियाश्रय कैसे है ? इन्द्रियाँ जिसके स्वस्थ रहने पर स्वस्थ तथा अस्वस्थ रहने पर अस्वस्थ रहती हुई भले-बुरे कर्मों में प्रवृत्त होती हैं, वह इनका आश्रय है, वही शरीर है । वह अर्थाश्रय कैसे कहलाता है ? जिस अधिष्ठान के रहते इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से उत्पन्न सुख दुःख का प्रतिसंवेदन प्रवृत्त होता है, वह इनका आश्रय (अवच्छेदक) है, वही शरीर है ॥ ११ ॥ अब भोगसाधनों ( इन्द्रियों ) का व्याख्यान किया जा रहा है— १. घ्राण, २. रसन, ३. चक्षु, ४. त्वक्, ५. श्रोत्र—ये भूतप्रकृतिक ( भौतिक ) इन्द्रियाँ हैं ॥ १२ ॥ जिससे सूंघा जाये—वह घ्राणेन्द्रिय है, यह गन्ध का ग्रहण करती है । जिससे स्वाद चखा जाये—वह रसनेन्द्रिय है, यह रस का ग्रहण करती है । जिससे देखा जाये—वह चक्षुरिन्द्रिय है, यह रूप को देखती है । जिससे स्पर्श किया जाये, जिसका स्थान त्वक् है, वह त्वगिन्द्रिय कहलाती है । इस इन्द्रिय का त्वक् स्थान होने से उपचार द्वारा उस स्थान के नाम पर ही इस इन्द्रिय के नाम का व्यवहार किया जाता है। जिससे सुना जाये—वह श्रोत्रे न्द्रिय है, यह शब्द सुनती है । इस प्रकार स्व स्व संज्ञाओं के यौगिक निर्वचन के कारण यह समझना चाहिये कि अपने-अपने विषय का ग्रहण ही इन्द्रियों का इतर-व्यावर्तक लक्षण है । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
३० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. आ० १ आ० भूतेभ्य इति। नानाप्रकृतीनामेषां सतां विषयनियमः, नैकप्रकृतीनाम्। सति च विषयनियमे स्वविषयग्रहणलक्षणत्वं भवतीति ॥ १२ ॥ भूतलक्षणम् कानि पुनरिन्द्रियकारणानि ? पृथिव्यापस्तेजो वायुराकाशमिति भूतानि ॥ १३ ॥ संज्ञाशब्दैः पृथगुपदेशः—विभक्तानां भूतानां सुवचं कार्यं भवि- ष्यतीति ॥ १३ ॥ (घ) अर्थ ( विषय ) लक्षणम् इमे तु खलु— गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः पृथिव्यादिगुणास्तदर्थाः ॥ १४ ॥ पृथिव्यादीनां यथाविनियोगं गुणा इन्द्रियाणां यथाक्रममर्था विषया इति१ ॥ १४ ॥ (ङ) बुद्धिलक्षणम् अचेतनस्य करणस्य बुद्धेर्ज्ञानं वृत्ति चेतनस्याकर्तुरूपलब्धिरिति युक्ति- ‘भूतेभ्यः’ पद में बहुवचन इसलिये है—इन इन्द्रियों को नानाप्रकृतिक मानने पर ही इनमें विषय-नियम बनेगा, एकप्रकृतिक मानने पर नहीं । तथा विषय-नियम होने से ही इनमें स्वविषय-ग्रहण लक्षण घटेगा ॥ १२ ॥ इन इन्द्रियों की प्रकृतियाँ (कारण) क्या हैं ? १. पृथिवी, २. जल, ३. तेज, ४. वायु तथा ५. आकाश—ये ‘भूत’ (इन्द्रियकारण) कहलाते हैं ॥ १३ ॥ विशेष संज्ञाओं से भूतों का पृथक् उपदेश इसलिये किया गया है कि इस प्रकार भेदों से ज्ञात इन भूतों की प्रमिति भली भाँति हो सकेगी ॥ १३ ॥ १. गन्ध, २. रस, ३. रूप, ४. स्पर्श, तथा ५. शब्द—ये पृथिवी आदि भूतों के गुण हैं, उनके विषय (अर्थ) हैं ॥ १४ ॥ पृथिवी आदि पाँचों भूतों का यथासम्बन्ध गुण तथा इन्द्रियों का यथाक्रम विषय समझना चाहिये ॥ १४ ॥ त्रैगुण्य का विकार होने से बुद्धि स्वयम् अचेतन होती हुई भी पुरुषगत चैतन्य की छाया पड़ने के कारण चेतन की तरह आभासित होती है, उस चैतन्याभास से वह स्वयं १. एतद्भाष्यव्याख्याने वार्त्तिकतात्पर्यकारयोरुहापोहैर्विद्यते, तदभिमतव्याख्यानं तु तत्र तत्रैव द्रष्टव्यम् ।
१५ सू० ] प्रमेयप्रकरणम् ३१ विरुद्धमर्थं प्रत्याचक्षाणक इवेदमाह— बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानमित्यनर्थान्तरम् ॥ १५ ॥ नाचेतनस्य करणस्य बुद्धेर्ज्ञानं भवितुमर्हति । तद्धि चेतनं स्यात्, एकश्चायं चेतनो देहेन्द्रियसङ्घातव्यतिरिक्त इति ? प्रमेयलक्षणार्थस्य वाक्य- स्यान्यार्थप्रकाशन'मुपपत्तिसामर्थ्यादिति ॥ १५ ॥ (च) मनोल्क्षणम् स्मृत्यनुमानागमसंशयप्रतिभास्वप्नज्ञानोहाः सुखादिप्रत्यक्षमच्छादयश्च मनसो लिङ्गानि । तेषु सत्स्वयमपि— १ प्रकाशित होती है तथा अचेतन, अकर्ता पुरुष की उपलब्धि प्रकाशित करती है'—ऐसा साङ्ख्यकार का मत है, यहाँ अचेतन बुद्धि का व्यापार ज्ञान तथा वह भी अकर्ता चेतन को उपलब्ध कराना—यह युक्तिविरुद्ध बात है । इसी का खण्डन करते हुए सूत्रकार कहते हैं— बुद्धि, उपलब्धि, ज्ञान—ये अनर्थान्तर (पर्याय) हैं। (इन पर्यायों से जो पदार्थ कहा जाये वह 'बुद्धि' है) ॥१५॥ पुरुषगत चैतन्य के अपरिणामी होने से उसकी छाया बुद्धि में नहीं पड़ सकती, अतः बुद्धि में ही चैतन्य मानना पड़ेगा। यदि ऐसा है तो ज्ञान के प्रति बुद्धि और पुरुष- चेतनद्वय का व्यापार अपेक्षित है, केवल बुद्धि से ज्ञान नहीं होगा; जब कि देहेन्द्रिय- संघात से अतिरिक्त एक ही चेतन माना गया है ? उपपत्तिसामर्थ्य से इस प्रमेयलक्षणार्थक वाक्य (सूत्र) का दूसरे (साङ्ख्यकार) के मत-खण्डन में भी तात्पर्य है। [ पर्याय शब्द कह देने मात्र से लक्षणाभिधान नहीं हुआ—ऐसा कुछ लोग कह सकते हैं, उनको यही उत्तर देना चाहिये कि लोक में दो तरह से पदाभिधान होता है, कुछ पद प्रतिव्यक्ति संकेतित किये जाते हैं, जैसे—पिता अपने पुत्रों का अलग-अलग नामकरण करता है; या अनेक व्यक्ति को सामान्यतः एक नाम दे दिया जाता है, जैसे— गौ आदि । दूसरे प्रकार में अभिधेय के लिए केवल पर्याय से कह देना भी अभिधेय-ज्ञान के लिए पर्याप्त होता है, लक्षणकरण का यह भी प्रयोजन है। प्रकृत में उपलब्धि तथा ज्ञान का अर्थ सर्वप्रसिद्ध है, इसलिये उन्हें बुद्धि का पर्याय कह देने से बुद्धि स्वरूप ज्ञात हो जाता है। इस युक्ति से बुद्धि का लक्षण भी बता दिया गया है ] ॥ १५ ॥ स्मृति, अनुमान, आगम, संशय, प्रतिभा, स्वप्न, ज्ञान, ऊह, सुख-आदि का प्रत्यक्ष, तथा इच्छा-आदि ये मन के लक्षण हैं; इनके साथ-साथ यह भी है कि— १. सांख्यमतनिराकरणरूपम् ।
सूत्र में 'बुद्धि' शब्द से मन अभिप्रेत है 'जिससे जाना जाये' वह बुद्धि (अर्थात्
३२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १ . अ० १ . आ० युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम् ॥ १६ ॥ अनिन्द्रियनिमित्ताः स्मृत्यादयः करणान्तरनिमित्ता भवितुमर्हन्तीति । युगपच्च खलु घ्राणादीनां गन्धादीनां च सन्निकर्षेषु सत्सु युगपज्ज्ञानानि नोत्पद्यन्ते, तेनानुमीयते—अस्ति तत्तदिन्द्रियसंयोगि सहकारि निमित्तान्तरम- व्यापि, यस्यासन्निधेर्नोत्पद्यते ज्ञानम्, सन्निधेश्चोत्पद्यत इति । मनःसंयोगानपे- क्षस्य हीन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य ज्ञानहेतुत्वे युगपदुत्पद्येरन् ज्ञानानीति ॥ १६ ॥ (छ) प्रवृत्तिलक्षणम् क्रमप्राप्ता तु— प्रवृत्तिर्वाग्बुद्धिशरीरारम्भः ॥ १७ ॥ उद्योग मनोऽत्र बुद्धिरित्यभिप्रेतम्, बुध्यतेऽनेनेति बुद्धिः । सोऽयमारम्भः—शरीरेण वाचा मनसा च पुण्यः पापश्च दशविधः । तदेतत्कृतभाष्यं द्वितीयसूत्र इति ॥१७॥ (ज) दोषलक्षणम् प्रवर्त्तनालक्षणा दोषाः ॥ १८ ॥ प्रवर्त्तना—प्रवृत्तिहेतुत्वम्, ज्ञातारं हि रागादयः प्रवर्त्तयन्ति पुण्ये पापे वा । मन को अतिरिक्त प्रमेय मानने से ही युगपद् ज्ञान बन पायेगा ॥ १६ ॥ बाह्येन्द्रियां स्मृत्यादिक की निमित्त नहीं बन सकतीं, अतः कोई न कोई अन्य कारण उनका निमित्त मानना पड़ेगा; दूसरे, घ्राणादि तथा गन्धादि का युगपत् सन्निकर्ष होने पर सभी ज्ञान एक साथ उत्पन्न नहीं होंगे, अतः यह अनुमान होता है कि अवश्य कोई अन्य तदिन्द्रिय-संयोगी, सहकारी, अव्यापी निमित्त है जिसकी सन्निधि (सामीप्य) के बिना ज्ञान उत्पन्न नहीं हो पाता, तथा सन्निधि होने पर उत्पन्न हो जाता है । यह अनुमान ही मन की सत्ता में हेतु है । दूसरी बात यह भी है कि यदि बाह्येन्द्रियों के साथ मनःसन्निकर्ष की अपेक्षा न रखेंगे तो अनेक ज्ञान एक साथ उत्पन्न होने लग जायेंगे ॥ १६ ॥ क्रमप्राप्त (प्रवृत्ति का लक्षण कर रहे हैं)— वाणी, बुद्धि (मन), शरीर से किये जाने वाले कार्य प्रवृत्ति कहलाते हैं ॥ १७ ॥ सूत्र में 'बुद्धि' शब्द से मन अभिप्रेत है 'जिससे जाना जाये' वह बुद्धि (अर्थात् मन) है । शरीर वाणी मन से, पुण्य तथा पाप रूप में कार्य दश प्रकार का होता है । इसका विशद वर्णन पीछे द्वितीय सूत्र (दुःखजन्मप्रवृत्ति.........) में कर चुके हैं ॥ १७ ॥ प्रवर्त्तना ही दोष हैं ॥ १८ ॥ प्रवर्त्तना = प्रवृत्ति के कारण (हेतु) दोष हैं । रागादि दोष ज्ञाता को पुण्य या पाप में प्रवृत्त करते हैं । जहाँ मिथ्याज्ञान होगा वहीं रागादि दोष होंगे । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
१९. सू०] प्रमेयप्रकरणम् ३३ यत्र मिथ्याज्ञानं तत्र रागद्वेषाविति । प्रत्यात्मवेदनीया हीमे दोषाः कस्माल्लक्षणतो निर्दिश्यन्त इति ? कर्मलक्षणाः खलु रक्तद्विष्टमूढाः । रक्तो हि तत्कर्म कुरुते येन कर्मणा सुखं दुःखं वा लभते; तथा द्विष्टः, तथा मूढ इति । ‘दोषा रागद्वेषमोहाः’–इत्युच्यमाने बहु नोक्तं भवतीति ॥ १८ ॥ ( झ ) प्रेत्यभावलक्षणम् पुनरुत्पत्तिः प्रेत्यभावः ॥ १९ ॥ उत्पन्नस्य क्वचित्सत्त्वनिकाये मृत्वा या पुनरुत्पत्तिः स प्रेत्यभावः । उत्पन्नस्य = सम्बद्धस्य । सम्बन्धस्तु देहेन्द्रियमनोबुद्धिवेदनाभिः । पुनरुत्पत्तिः = पुनर्देहा- दिभिः सम्बन्धः । पुनरित्यभ्यासाभिधानम्, यत्र क्वचित्प्राणभृन्निकाये वर्तमानः पूर्वोपात्तान्देहादीन् जहाति तत्प्रैति, यत् तत्रान्यत्र वा देहादीनन्यानुपादत्ते तद्भवति । प्रेत्यभावः = मृत्वा पुनर्जन्म । सोऽयं जन्ममरणप्रबन्धाभ्यासोऽनादिरपवर्गान्तः प्रेत्यभावो वेदितव्य इति ॥ १९ ॥ साधारणजनों द्वारा हमेशा ही इन दोषों का अनुभव करते रहने से ये लक्षण बिना बताये भी जाने जा सकते हैं, पुनः इनका पृथक् लक्षण करने की क्या आवश्यकता ? उन कर्मों के कारण ही पुरुष रागी, द्वेषी तथा मूढ होते हैं; रागी पुरुष वही कर्म करता है, जिससे उसे सुख या दुःख मिलता है, इसी तरह द्वेषी तथा मोही पुरुष के विषय में समझना चाहिए; तात्पर्य यह निकला कि द्वेष प्रवृत्ति के कारण (जनक) हैं, यह ‘जनकत्व’ दिखाने के लिये ऐसा लक्षण किया गया है । ‘राग द्वेष मोह दोष हैं’—ऐसा कहने पर इनकी गणना-मात्र होती, इनका लक्षण नहीं होता, अतः ‘प्रवर्तनालक्षणा दोषाः’—ऐसा ही सूत्र पढ़ा गया ॥ १८ ॥ पुनः उत्पन्न होना (मर कर जन्म लेना) प्रेत्यभाव है ॥ १९ ॥ उत्पन्न हुए प्राणी का मरकर पुनः जन्म लेना प्रेत्यभाव कहलाता है । उत्पन्न का अर्थ है ‘सम्बद्ध’ । किस से सम्बन्ध ? देह, इन्द्रिय, मन बुद्धि, वेदना से । इस तरह पुन- रुत्पत्ति से मतलब है आत्मा का देहादि से सम्बन्ध ( क्योंकि आत्मा के नित्य होने से उसमें उत्पाद या मरण नहीं होता, अतः ‘सम्बन्ध’ कहा गया है) । ‘पुनः’ शब्द से अभ्यास ( बार बार होना ) में तात्पर्य है । जहाँ कहीं प्राणसंयुक्त शरीर में रहते हुए पूर्वोपात्त देहादि को छोड़ना—‘प्रैति’ (मर जाता है) कहलाता है, तथा वहाँ से अन्यत्र दूसरे देहा- दिक का ग्रहण कर (सम्बन्ध जोड़) लेता हुआ—‘भवति’ ( जन्म लेता है ) । इन दोनों शब्दों के संयोग से व्युत्पन्न ‘प्रेत्यभाव’ का अर्थ है—‘मर कर फिर जन्म लेना’ । इस जन्म-मरण की परम्परा का पुनः पुनः होना अनादि है, अपवर्ग जब होगा तभी इसका अन्त होगा—यह इस प्रेत्यभाव के विषय में समझ लेना चाहिये ॥ १९ ॥ न्या० द० : ३
३४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० ( ञ ) फललक्षणम् प्रवृत्तिदोषजनितोऽर्थः फलम् ॥ २० ॥ सुखदुःखसंवेदनं फलम्। सुखविपाकं कर्म दुःखविपाकं च, तत्पुनर्देहेन्द्रिय- विषयबुद्धिषु सतीषु भवतीति सह देहादिभिः फलमभिप्रेतम्। तथा हि प्रवृत्ति- दोषजनितोऽर्थः फलमेतत्सर्वं भवति। तदेतत्फलमुपात्तमुपात्तं हेयम्, त्यक्तं त्यक्तमुपादेयमिति नास्य हानोपादान- योर्निष्ठा पर्यवसानं वास्ति। स खल्वयं फलस्य हानोपादानस्रोतसोह्यते लोक इति ॥ २० ॥ ( ट ) दुःखलक्षणम् अथैतदेव— बाधनालक्षणं दुःखम् ॥ २१ ॥ बाधना = पीडा, ताप इति। तयाऽनुविद्धमनुषक्तमविनिर्भागेन वर्त्तमानं दुःखयोगाद् दुःखमिति। सोऽयं सर्वं दुःखैनानुविद्धमिति पश्यन् दुःखं जिहासु- प्रवृत्ति तथा दोष से जनित सुख-दुःखरूप अर्थ 'फल' कहलाता है ॥ २० ॥ सुख-दुःख को स्वसम्बन्धितया अनुभव करना ही फल है। देह, इन्द्रिय, विषय, बुद्धि की समष्टि में सुखविपाक तथा दुःखविपाक—यों दो प्रकार का कर्म होता है. इसलिये यहां देहादिकों के साथ उपर्युक्त लक्षण वाला फल अभिप्रेत है। निष्कृष्टार्थ यह है कि सुख-दुःखसंवेदन तथा शरीरादि के साथ सम्बन्ध—ये दोनों प्रवृत्ति-दोष जनित हैं, अतः दोनों ही 'फल' कहलाते हैं। यह उक्त प्रकार का फल पुनः पुनः प्राप्त कर छोड़ दिया जा सकता है, तथा इसे बार बार छोड़कर पुनः प्राप्त करने की इच्छा हो जाती है, इसीलिए इसके हान (त्याग) या उपादान (ग्रहण) की कोई सीमा नहीं है, कोई अन्त नहीं है। यह समस्त संसार इसी हानोपादान-प्रवाह में पड़कर सुख-दुःख भोगता रहता है ॥ २० ॥ यह शरीरादि फलान्त प्रमेय ही— बाधना (पीड़ा) 'दुःख' कहलाता है ॥ २१ ॥ 'बाधना' कहते हैं पीड़ा अर्थात् ताप को। उसी से अनुस्यूत, उसके बिना न रहने वाला, उसी में ओतप्रोत दुःखपरिणाम के कारण को दुःख कहते हैं। यह सब दुःख से अनुस्यूत है, दुःख के विना नहीं रह पाता, अतः यह सब कुछ 'दुःख' है। इस प्रकार प्रमाता 'यह समग्र दृश्यमान जगत् दुःख है'—ऐसा विचार करता हुआ
जन्मनि दुःखदर्शी निर्विद्यते, निर्विण्णो विरज्यते, विरक्तो विमुच्यते ॥ २१ ॥ (ठ) अपवर्गलक्षणम् यत्र तु निष्ठा यत्र तु पर्यवसानम्, सोऽयम्— तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः ॥ २२ ॥ तेन = दुःखेन जन्मना, अत्यन्तं विमुक्तिः = अपवर्गः । कथम् ? उपात्तस्य जन्मनो हानम्, अन्यस्य चानुपादानम् । एतामवस्थामपर्यन्तामपवर्गं वेदयन्ते- ऽपवर्गविदः । तदभयम्, अजरम्, अमृत्युपदं ब्रह्म, क्षेमप्राप्तिरिति । नित्यं सुखमात्मनो महत्त्ववन्मोक्षे व्यज्यते, तेनाभिव्यक्तेनात्यन्तं विमुक्तः सुखी भवतीति केचिन्मन्यन्ते; तेषां प्रमाणाभावपादनुपपत्तिः । न प्रत्यक्षं नानुमानं नागमो वा विद्यते—'नित्यं सुखमात्मनो महत्त्ववन्मोक्षेऽभिव्यज्यते' इति । नित्यस्याभिव्यक्तिः-संवेदनम्, तस्य हेतुवचनम् । नित्यस्याभिव्यक्तिः = संवेदनम्, ज्ञानमिति, तस्य हेतुर्वाच्यः, यतस्तदुत्पद्यत इति । जन्म लेने में दुःख मानता है, दुःख मानकर ग्लानि करता है, ग्लानि मानकर सभी विषयों में वैराग्य धारण करता है, विरक्त होकर 'मोक्ष' पा जाता है ॥ २१ ॥ जहाँ इस दुःख की अवधि है, जहाँ अन्त है, वह— उस (जन्मरूप) दुःख से सदा के लिये छुटकारा पा जाना 'अपवर्ग' (मोक्ष) कहलाता है ॥ २२ ॥ उस जन्मरूप दुःख से अत्यन्त (पुनरावृत्तिरहित) विमुक्ति (छुटकारा) ही अपवर्ग (मोक्ष) कहलाता है। कैसे ? क्योंकि तब प्राप्त जन्म का त्याग हो जाता है तथा अन्य (आगामी) जन्म का उपादान नहीं हो पाता । इस मोक्षरूप अविनाशी अवस्था को मुक्तितत्त्वज्ञ विद्वान् 'अपवर्ग' कहते हैं। इस प्रकार के इस कैवल्य पद में कहीं किसी से भी भय नहीं है, जरा (जीर्णता, वार्धक्य) नहीं है, यह अमृत्युपद भावरूप अवस्थाविशेष है, ब्रह्म है, नित्य सुख का आधार है । महत्त्व की तरह मोक्ष में 'आत्मा में नित्य सुख अभिव्यक्त होता है, उसके अभि- व्यक्त होने से विमुक्त अत्यन्त सुखी होता है'—ऐसा कुछ लोग मानते हैं; प्रमाण न होने से उनके इस मन्तव्य को अयुक्त ही समझें; क्योंकि ऐसा कोई प्रत्यक्ष, अनुमान या आगम प्रमाण नहीं है जिससे यह सिद्ध किया जा सके कि महत्त्व (व्यापकता) की तरह आत्मा को मोक्षावस्था में आत्मगत नित्य सुख अभिव्यक्त होता है । नित्य की अभिव्यक्ति—अर्थात् संवेदन, उस में कोई हेतु बतलाना चाहिये । यतः नित्य की अभिव्यक्ति = संवेदन अर्थात् ज्ञान है, अतः उसमें कोई हेतु दिखाना चाहिये जिससे वह (ज्ञान) उत्पन्न होता हो ।
३६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० सुखवन्नित्यमिति चेत् ? संसारस्थस्य मुक्तेनाविशेषः । यथा मुक्तः सुखेन तत्संवेदनेन च सन्नित्येनोपपन्नः, तथा संसारस्थोऽपि प्रसज्यत इति; उभयस्य नित्यत्वात् । अभ्यनुज्ञाने च धर्माधर्मफलेन साहचर्यं यौगपद्यं गृह्येत । यदिदमुत्पत्ति- स्थानेषु धर्माधर्मफलं सुखं दुःखं वा संवेद्यते पर्यायेण, तस्य च नित्यं संवेदनस्य च सहभावो यौगपद्यं गृह्येत, न सुखाभावो नानभिव्यक्तिरस्ति; उभयस्य नित्यत्वात् । अनित्यत्वे हेतुवचनम् । अथ मोक्षे नित्यस्य सुखस्य संवेदनमनित्यम् ? यत उत्पद्यते स हेतुर्वाच्यः । आत्ममनःसंयोगस्य निमित्तान्तरसहितस्य हेतुत्वम् । आत्ममनःसंयोगो हेतु- रिति चेत् ? एवमपि तस्य सहकारि निमित्तान्तरं वचनीयमिति । धर्मस्य कारणवचनम् । यदि धर्मो निमित्तान्तरम् ? तस्य हेतुर्वाच्यो यत उत्पद्यत इति । योगसमाधिजन्यकार्यावसायविरोधात् प्रक्षये संवेदननिवृत्तिः१ । यदि योग- समाधिजो धर्मो हेतुः ? तस्य कार्यावसायविरोधात्प्रक्षये संवेदनमत्यन्तं निवर्तेत । सुख की तरह वह नित्य है-ऐसा कहोगे तो संसारी और मुक्त पुरुष में भेद क्या रह जायेगा ? जैसे मुक्त पुरुष नित्य सुख तथा उसके संवेदन से उपपन्न है उसी प्रकार संसारी में भी नित्य सुख मानना पड़ेगा; क्योंकि दोनों ही सुख तथा संवेदन नित्य हैं । दोनों को नित्य मानने पर, धर्म तथा अधर्म से उत्पन्न सुख-दुःख के उपलब्धिकाल में नित्य सुख तथा उसके नित्य ज्ञान का यौगपद्य (एककालसम्बद्धत्व) ग्रहण करना पड़ेगा । सुख को नित्य तथा उसकी अभिव्यक्ति को अनित्य मानने में कोई हेतु दिखाना पड़ेगा कि 'मोक्ष में नित्य सुख की अभिव्यक्ति अनित्य हैं'। ऐसी अभिव्यक्ति जिससे पैदा होती है, वह कारण बताना चाहिये । वैसी अभिव्यक्ति में अकेला आत्ममनःसंयोग तो निमित्त बन नहीं सकता, अतः उसका कोई निमित्तान्तर मानना पड़ेगा । वह निमित्तान्तर कौन है ? यह बताना चाहिए । 'धर्म ही तदपेक्षित निमित्तान्तर है'-ऐसा मानेंगे तो 'धर्म निमित्तान्तर हैं' इस में भी कोई हेतु बताना पड़ेगा, जिससे वह उत्पन्न होता हो । यदि योगसमाधिज धर्म (धर्ममेघाख्य समाधि) को उसका हेतु मानेंगे तो उस धर्म में कार्य का विरोधी रहने से सर्वक्षय हो जाता है, सर्वक्षय होने से उस सुखाभिव्यक्ति की भी अत्यन्त निवृत्ति हो जायेगी । 'संवेदनानुवृत्तिः'-इति पाठः ।
२२. सू० ] प्रमेयप्रकरणम् ३७ असंवेदने चाविद्यमानेनाविशेषः । यदि धर्मक्षयात् संवेदनोपरमो नित्यं सुखं न संवेद्यत इति ? किं विद्यमानं न संवेद्यते, अथाविद्यमानम् ? —इति नानुमानं विशिष्टेऽस्तीति । अप्रक्षयश्च धर्मस्य निरनुमानमुत्पत्तिधर्मकत्वात् । योगसमाधिजो धर्मो न क्षीयत इति नास्त्यनुमानम् । उत्पत्तिधर्मकमनित्यमिति विपर्ययस्य त्वनुमानम् । यस्य तु संवेदनोपरमो नास्ति तेन संवेदनहेतुर्नित्य इत्यनुमेयम् । नित्ये च मुक्तसंसारस्थयोरविशेष इत्युक्तम् । यथा मुक्तस्य नित्यं सुखं तत्संवेदनहेतुश्च, संवेदनस्य तूपरमो नास्ति; कारणस्य नित्यत्वात्, तथा संसार- स्थस्यापीति । एवं च सति धर्माधर्मफलेन सुखदुःखसंवेदनेन साहचर्यं गृह्येतेति । शरीरादिसम्बन्धः प्रतिबन्धहेतुरिति चेत् ? न; शरीरादीनामुपभोगार्थत्वात्, विपर्ययस्य चाननुमानात् । स्यान्मतम्—संसारावस्थस्य शरीरादिसम्बन्धो नित्यसुखसंवेदनहेतोः प्रतिबन्धकः, तेनाविशेषो नास्तीति ? एतच्चायुक्तम्; शरीरादय उपभोगार्थाः, ते भोगप्रतिबन्धं करिष्यन्तीत्यनुपपन्नम्; न चास्त्यनुमानम्—'अशरीरस्यात्मनो भोगः कश्चिदस्ति' इति । 'सुख है, परन्तु धर्मक्षय से उसका संवेदन नहीं हो पाता'—ऐसा मानेंगे तो इसमें तथा 'सुख नहीं है'—इसमें कोई अन्तर नहीं । 'उत्पत्तिधर्मा होने से वह धर्म क्षीण नहीं होता' ऐसा अनुमान भी नहीं कर सकते; अपितु 'उत्पत्तिधर्मा अनित्य होता है' ऐसा विपरीत अनुमान ही होता है । हाँ, ऐसा कोई पुरुष हो जिसे संवेदनोपरम कभी न हो पाये वह यदि अनुमान करे कि 'संवेदन हेतु नित्य है' तो बात बन सकती है, परन्तु ऐसा पुरुष मिलेगा कहाँ ! अथ च—संवेदनहेतु के नित्य मानने पर मुक्त और संसारी पुरुष में अन्तर नहीं रहेगा—वह हम पहले ही कह आये । जैसे मुक्त पुरुष के सुख तथा सुखसंवेदन कारण के नित्य होने से नित्य हैं; क्योंकि वहाँ सुखसंवेदनोपरम नहीं होता, ऐसी स्थिति में संसारी में सुख तथा सुखसंवेदन भी मानना पड़ेगा । ऐसा मानने पर धर्म तथा अधर्म से उत्पन्न सुख-दुःख के उपलब्धि-काल में नित्य सुख तथा उसके नित्य संवेदन का यौग- पद्य भी मानना पड़ेगा । यदि कहें—'उस संवेदन में शरीरादिसम्बन्ध प्रतिबन्धहेतु है' ? शरीरादि तो उस सुख के उपभोग के लिये होते हैं, वे प्रतिबन्धक क्यों बनेंगे ! 'शरीर उपभोगहेतु नहीं है'— ऐसा अनुमान करना भी सम्भव नहीं है, क्योंकि वह शास्त्रविरुद्ध होगा । कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि संसारावस्थापन्न मुक्त पुरुष का शरीरादिसम्बन्ध नित्य सुखसंवेदन हेतु का प्रतिबन्धक है, इसलिये संसारी और मुक्तपुरुष के सुखसंवेदन
३५ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० इष्टाधिगमार्था प्रवृत्तिरिति चेत् ? न; अनिष्टोपरमार्थत्वात् । इदमनुमानम्- इष्टाधिगमार्थो मोक्षोपदेशः, प्रवृत्तिश्च मुमुक्षूणाम्, नोभयमनर्थकमिति ? एतच्चा- युक्तम्; 'अनिष्टोपरमार्थो मोक्षोपदेशः, प्रवृत्तिश्च मुमुक्षूणाम्' इति । नेष्टमनिष्टे- नाननुविद्धं सम्भवतीति इष्टमप्यनिष्टं सम्पद्यते । अनिष्टहानाय घटमान इष्टमपि जहाति, विवेकहानस्याशक्यत्वादिति । दृष्टातिक्रमश्च देहादिषु तुल्यः । यथा दृष्टमनित्यं सुखं परित्यज्य नित्यं सुखं कामयते, एवं देहेन्द्रियबुद्धीरनित्या दृष्टा अतिक्रम्य मुक्तस्य नित्या देहेन्द्रियबुद्धयः में समानता नहीं है; परन्तु उनका मत भी समीचीन है, क्योंकि शरीरादि को पहले उपभोग का साधन मानना, फिर उन्हें उसका प्रतिबन्धक मानना—ये दो बातें एक साथ कैसे बनेंगी ! 'अशरीरी आत्मा को कोई भोग होता है'—ऐसा कोई अनुमान भी नहीं है। [ 'मोक्ष में नित्य सुख अभिव्यक्त होता है—इसमें कोई प्रमाण नहीं है' ऐसा भाष्यकार पहले कह चुके हैं, वहां वेदान्ती कहता है—] पुरुष की प्रवृत्तियाँ इष्ट सुखप्राप्ति के लिए ही देखी जाती हैं'—ऐसा अनुमान प्रमाण मान लें ? यह भी नहीं मान सकते; क्योंकि उसकी सभी प्रवृत्तियाँ केवल इष्टप्राप्ति के लिए ही नहीं, बल्कि उनमें कुछ अनिष्ट की निवृत्ति के लिये भी हुआ करती हैं। यदि यह अनुमान करें—'इष्टप्राप्ति के लिए मोक्षोपदेश किया जाता है, मुमुक्षुओं की उस उपदेश में प्रवृत्ति भी देखी जाती है', अतः दोनों ही निरर्थक नहीं हैं ? तो यह ठीक नहीं; क्योंकि 'अनिष्टनिवृत्ति के लिए मोक्षोपदेश किया जाता है, मुमुक्षुओं की उस उपदेश में प्रवृत्ति भी देखी जाती है' यह अनुमान भी किया जा सकता है। इस संसार में ऐसा कोई भी इष्ट नहीं है जो अनिष्ट से अनुस्यूत न हो, अतः इष्ट भी किसी समय अनिष्ट बन सकता है। उस अनिष्ट की निवृत्ति के लिए प्रवर्तमान पुरुष अपने इष्ट को भी छोड़ बैठेगा; क्योंकि इष्टानिष्ट के परस्पर संश्लिष्ट होने से अनिष्टांश का त्याग तथा इष्टांश का रक्षण सर्वथा दुःशक है। [ 'इस संसार में क्षणिक सुख को छोड़कर बुद्धिपूर्वककारी स्थायी सुख ग्रहण करता है, उनमें स्थायितम सुख ही मोक्ष है'—ऐसा मानेंगे तो यह नय देहादि में भी समान पड़ेगा; क्योंकि उनके विषय में भी कहा जा सकता है—'क्षणिक नश्वर देहादि को छोड़- कर उनसे स्थायितर किसी अन्य को चाहने की बुद्धिपूर्वककारी की इच्छा होती है इसलिए स्थायितम देहेन्द्रियादिरूप ही मोक्ष है' इस आशय से भाष्यकार परिहास करते हैं—] दृष्ट का अतिक्रमण कर उससे अच्छे अदृष्ट सुख की कल्पना को मोक्ष मानने पर देहादि में भी यह बात समान पड़ेगी। जैसे पुरुष दृष्ट सुख को छोड़कर नित्य सुख को चाहता है; इसी तरह देहेन्द्रिय बुद्धि को अनित्य समझकर उन्हें छोड़ते हुए इनसे अच्छी देहेन्द्रिय-बुद्धियों CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
२२. सू० ] प्रमेयप्रकरणम् ३९ कल्पयितव्याः ! साधीयश्चैवं मुक्तस्य चैकात्म्यं कल्पितं भवतीति । उपपत्तिविरुद्धमिति चेत् ? समानम् । देहादिनां नित्यत्वं प्रमाणविरुद्धं कल्प- यितुमशक्यमिति ? समानम् । सुखस्यापि नित्यत्वं प्रमाणविरुद्धं कल्पयितुमशक्य- मिति । आत्यन्तिके च संसारदुःखाभावे सुखवचनादागमेऽपि सत्यविरोधः । यद्यपि कश्चिदागमः स्यात्—‘मुक्तस्यात्यन्तिकं सुखम्' इति, सुखशब्द आत्यन्तिके दुःखाभावे प्रयुक्त इत्येवमुपपद्यते । दृष्टो हि दुःखाभावे२ सुखशब्दप्रयोगो बहुलं लोक इति । नित्यसुखरागस्याप्रहाणे मोक्षाधिगमाभावः, रागस्य बन्धनसमाज्ञानात् । यद्ययं मोक्षो नित्यं सुखमभिव्यञ्जयत इति ? नित्यसुखरागेण मोक्षाय घटमानो न मोक्षमधिगच्छेत् नाधिगन्तुमर्हतीति । बन्धनसमाज्ञातो हि रागः । न च बन्धने सत्यपि कश्चिन्मुक्त इत्युपपद्यत इति । की ही 'मोक्ष' रूप में कल्पना की जा सकती है । इससे वेदान्तियों की 'मुक्त की एकात्म- कल्पना' भी सुगम हो सकेगी ! जैसे नित्य देह की कल्पना में 'उपपत्तिविरुद्ध' कहोगे तो तुम्हारे पक्षमें भी यह 'उप- पत्तिविरोध' समान है ! जैसे प्रमाणविरुद्ध 'देहादि की नित्यता' कल्पना अशक्य है, वैसे ही प्रमाणविरुद्ध 'सुख की नित्यता' कल्पना भी अशक्य होगी ! 'मुक्त में आत्यन्तिक सुख होता है'—ऐसे आगम में आत्यन्तिक सुख का प्रयोग 'सांसारिक दुःखाभाव' में होने से कोई विरोध नहीं है । यद्यपि 'मुक्त को आत्यन्तिक सुख मिलता है'—ऐसा आगम उपलब्ध है, परन्तु इस आगम में 'सुख' शब्द का प्रयोग आत्यन्तिक दुःखाभाव के लिए किया गया है । प्रायः लोक में भी दुःखाभाव के लिये 'सुख' का प्रयोग होता है । (जैसे—सिर से बोझ उतरने पर किसी अतिरिक्त सुख की उत्पत्ति न होने पर भी भारवाहक कहता है—'ओह ! अब आराम मिला !') नित्य सुख में मुमुक्ष की प्रवृत्ति यदि राग से होती हो तो रागनिवृत्ति न होने से तत्सम्पाद्य मोक्ष की भी अनुपपत्ति ही रहेगी ? इसलिये कहते हैं—नित्यसुख-राग के क्षीण न होने पर मोक्षप्राप्ति भी न होगी; क्योंकि राग तो बन्धन का हेतु है । मुमुक्षु यदि 'मोक्ष नित्य सुख अभिव्यक्त करता है'—ऐसा राग करके मोक्ष के लिये प्रयत्न करता है, तो वह मोक्ष नहीं पा सकेगा; क्योंकि राग भी तो एक प्रकार का बन्धन है और बन्धन के रहते कोई 'मुक्त' नहीं कहला सकता ! २. 'दुःखादेरभावे-इति पाठ० । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
४० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० प्रहीणे' नित्यसुखरागस्याप्रतिकूलत्वम् । अथास्य नित्यसुखरागः प्रहीयते, तस्मिन् प्रहीणे नास्य नित्यसुखरागः प्रतिकूलो भवति ? यद्येवम्, मुक्तस्य नित्यं सुखं भवति; अथापि न भवति; नास्योभयोः पक्षयोर्मोक्षाधिगमो विकल्पत . इति ॥ २२ ॥ न्यायपूर्वाङ्गलक्षणप्रकरणम् [ २३-२४ ] संशयलक्षणम् स्थानवत एव तर्हि संशयस्य लक्षणं वाच्यमिति तदुच्यते- समानानेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः२ ॥ २३ ॥ समानधर्मोपपत्तेर्विशेषापेक्षो विमर्शः संशय इति । स्थाणु-पुरुषयोः समानं धर्ममारोहपरिणाहौ पश्यन् पूर्वदृष्टं च तयोर्विशेषं बुभुत्समानः किंस्विदित्यन्यतरं नावधारयति, तदनवधारणं ज्ञानं संशयः । 'समानमनयोर्धर्ममुपलभे, विशेषमन्य- प्रहीण मानने पर भी नित्यसुखराग मोक्ष के विरुद्ध नहीं पड़ेगा । जब इस मुमुक्षु का नित्यसुखराग क्षीण हो जाता है, तब इसका यह नित्यसुखराग प्रतिकूल नहीं होगा, तब तो उसे मोक्ष का अधिगम हो जाना चाहिये ? यदि ऐसी बात है तो मुक्त को नित्य सुख होता हो, या न होता हो-दोनों ही पक्षों में मोक्षप्राप्ति असन्दिग्ध ही है ॥ २२ ॥ क्रमप्राप्त अवसर आने पर 'संशय' का लक्षण कथनीय है, अतः अब उसे कह रहे हैं- समान धर्मोपलब्धि (उपपत्ति) से, अनेक धर्मोपलब्धि से, विप्रतिपत्ति से, उपलब्धि की अव्यवस्था तथा अनुपलब्धि की अव्यवस्था से विशेष अपेक्षा रखनेवाला विमर्श 'संशय' कहलाता है ॥ २३ ॥ १. समान धर्मोपपत्ति से विशेषापेक्ष विमर्श 'संशय' कहलाता है । जैसे-स्थाणु और पुरुष में तुल्य धर्म आरोह-परिणाह ( उतार-चढ़ाव ) को देखता हुआ प्रमाता पहले देखे हुए उनके विशेष ( विभेदक धर्म ) को जानना चाहता हुआ 'वस्तुतः क्या है ?'-यह एकतर निश्चय नहीं कर पाता, उक्त अनिश्चयरूप ज्ञान ही 'संशय' कहलाता है । 'इन दोनों के तुल्य धर्मों को ही पा रहा हूँ, विशेष धर्मों को नहीं'-यह बुद्धि 'अपेक्षा' कह- लाती है, जो कि संशय की प्रवर्त्तिका है । संक्षेप में यों कह सकते हैं कि 'विशेषापेक्ष विमर्श' ही 'संशय' होता है । १. 'प्रहीणनित्य'०-इति पाठ० । २. संवदनीयम्-'सामान्यप्रत्यक्षात् विशेषाप्रत्यक्षाद् विशेषस्मृतेश्च संशयः' इति काणादाः । 'साधर्म्यदर्शनाद्विशेषोपलिप्सोर्विमर्शः संशयः' इति बौद्धाः । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
तरस्य नोपलभे' इत्येषा बुद्धिः 'अपेक्षा' = संशयस्य प्रवर्त्तिका वर्तते, तेन विशेषा- पेक्षो विमर्शः संशयः । अनेकधर्मोपपत्तेरिति । समानजातीयमसमानजातीयं चानेकम्, तस्यानेकस्य धर्मोपपत्तेः, विशेषस्योभयथा दृष्टत्वात् । समानजातीयेभ्योऽसमानजातीयेभ्य- श्चार्था विशिष्यन्ते, गन्धवत्त्वात् पृथिवी अबादिभ्यो विशिष्यते गुणकर्मभ्यश्च । अस्ति च शब्दे विभागजन्यत्वं विशेषः। तस्मिंस्ते 'द्रव्यं गुणः कर्म वा' इति सन्देहः, विशेषस्योभयथा दृष्टत्वात् । 'किं द्रव्यस्य सतो गुणकर्मभ्यो विशेषः, आहोस्वित् गुणस्य सतो द्रव्यकर्मभ्यः?, अथ कर्मणः सतो द्रव्यगुणेभ्यः ? इति विशेषापेक्षा - 'अन्यतमस्य व्यवस्थापकं धर्मं नोपलभे' इति बुद्धिरिति । विप्रतिपत्तेरिति । व्याहतमेकार्थदर्शनम् = विप्रतिपत्तिः, व्याघातः = विरोधः, असहभाव इति । 'अस्त्यात्मा' इत्येकं दर्शनम्, 'नास्त्यात्मा' इत्यपरम्; न च सद्भावासद्भावौ सहैकत्र सम्भवतः, न चान्यतरसाधको हेतुरुपलभ्यते, तत्र तत्त्वानवधारणं संशय इति । २. अनेक धर्मोपलब्धि (उपपत्ति) से भी विशेषापेक्ष विमर्श 'संशय' कहलाता है । अर्थात् समानजातीय तथा असमानजातीय विशेषक (विभेदक) धर्म सामान्य धर्म के साथ रहते हैं—इस अध्यवसाय की उपलब्धि से विशेषापेक्ष विमर्श 'संशय' कहलाता है । समानजातीय और असमानजातीय धर्मों से अर्थ विभिन्न हुए देखे जाते हैं । जैसे—पृथ्वी गन्धवती होने से समानजातीय जलादि द्रव्यों से भिन्न है, इसी प्रकार असमानजातीय गुण, कर्म से भी । शब्द में भी विभागजन्य विशेष (विभेदक धर्म) है। इस (शब्द) में— 'यह द्रव्य है, या गुण है, या कर्म है'—ऐसा सन्देह हो सकता है; क्योंकि उसका विभेदक धर्म तीनों में समानरूप से देखा जाता है। यहाँ 'क्या यह द्रव्य होता हुआ गुण, कर्म से भिन्न है' ? या 'गुण होता हुआ द्रव्य, कर्म से भिन्न है'? अथवा 'कर्म होता हुआ द्रव्य, गुण से भिन्न है' ?—ऐसी विशेषापेक्षा—'किसी एक निश्चित विभेदक धर्म को नहीं पा रहा हूँ'—यह बुद्धि होती है। ३. विप्रतिपत्ति से विशेषापेक्ष विमर्श भी संशय कहलाता है । विरुद्ध एकार्थदर्शन को 'विप्रतिपत्ति' कहते हैं। व्याघात = विरोध, एक साथ न रहना । जैसा कि 'आत्मा है' यह एक वाक्य है, 'आत्मा नहीं है'—यह दूसरा वाक्य, एक में सत्ता (होना) तथा असत्ता (न होना) दोनों एकत्र रह नहीं सकते, इनमें से किसी एक का साधक हेतु भी नहीं दिखाया गया, अतः ऐसे अवसर पर तत्त्व (यथातथ = समीचीन) का ज्ञान का न होना ही 'संशय' है । १. क्वचिन्नास्ति ।
४२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० उपलब्धिव्यवस्थातः खल्वपि । सच्चोदकमुपलभ्यते तडागादिषु, मरीचिषु चाविद्यमानमुदकमिति; अतः क्वचिदुपलभ्यमाने तत्त्वव्यवस्थापकस्य प्रमाण- स्यानुपलब्धेः—‘किं सदुपलभ्यते, अथासत्’ इति संशयो भवति । अनुपलब्ध्यव्यवस्थातः । सच्च नोपलभ्यते मूलकीलकोदकादि, असच्चा- नुत्पन्नं निरुद्धं वा; ततः क्वचिदनुपलभ्यमाने संशयः—‘किं सन्नोपलभ्यते, उता- सत्’ इति संशयो भवति । विशेषापेक्षा पूर्ववत् । पूर्वः समानोऽनेकश्च धर्मो ज्ञेयस्थः, उपलब्ध्द्यनुपलब्धी पुनर्जातृस्थे—एतावता विशेषेण पुनर्वचनम् । समानधर्माधिगमात् समानधर्मोपपत्तेर्विशेषस्मृत्यपेक्षो विमर्श इति॥ २३ ॥ प्रयोजनलक्षणम् स्थानवतां लक्षणमिति समानम् । ४. उपलब्धि की अव्यवस्था से भी विशेषापेक्ष विमर्श 'संशय' कहलाता है । जैसे— तालाब आदि में जल है, और मिल जाता है, तथा मृगमरीचिका में जल नहीं है, परन्तु भान होता है । इसलिये कहीं उपलब्धि होने पर तत्त्वनिर्णायक प्रमाण की उपलब्धि न होने से 'क्या सत् ही मिलता है या असत् भी मिल जाता है'—ऐसा विमर्श भी 'संशय' होता है । ५. अनुपलब्धि की अव्यवस्था से भी विशेषापेक्ष विमर्श 'संशय' कहलाता है । सत् भी कभी कभी नहीं मिलता, जैसे—मन्त्रादि से कीलित या वस्त्रादि से आच्छादित जल । असत् तो मिलेगा ही क्या ! असत् द्विविध स्थिति में होता है—१. अनुत्पन्न या २. किसी उपाय से छिपा हुआ । तब कहीं अनुपलब्धि होने पर संशय होता है कि क्या सत् उप- लब्ध नहीं होता है, या असत् उपलब्ध नहीं होता ? यहाँ 'विशेषापेक्षा' का व्याख्यान पहले लक्षण की तरह ही समझ लेना चाहिये । 'संशय' के इन पाँच हेतुओं में से प्रथम और द्वितीय ('समान....' और 'अनेक....') ज्ञेय में घटेंगे तथा तथा चतुर्थ और पंचम ('उपलब्धि....' 'अनुपलब्धि....') ज्ञाता में । इसी भेद को बताने के लिये ये पुनः कहे गये हैं । "समानधर्म के अधिगम से, समानधर्म की उपपत्ति से विशेष स्मृत्यपेक्षावान् विमर्श 'संशय' कहलाता है"—यह संशय का निष्कृष्ट लक्षण है ॥ २३ ॥ क्रमशः अवसर आने पर ही 'प्रयोजन' का लक्षण-कथन अभीष्ट था, अब उसका अवसर आ गया है । १. अत्र वार्त्तिककारः—'समानधर्मोपपत्तेः, अनेकधर्मोपपत्ते', विप्रतिपत्तेश्च त्रिविध एव संशयः' इत्याह । विस्तरस्तु तत एवावगन्तव्यः । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
२५. सू० ] न्यायपूर्वाङ्गलक्षणप्रकरणम् ४३ यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत्प्रयोजनम् ॥ २४ ॥ यमर्थमाप्तव्यं हातव्यं वा व्यवसाय तदाप्तिहानोपायमनुतिष्ठति, प्रयोजनं तद्वेदितव्यम्; प्रवृत्तिहेतुत्वात् । 'इममर्थमाप्स्यामि हास्यामि वा' इति व्यवसायो- ऽर्थस्याधिकारः, एवं व्यवसीयमानोऽर्थोऽधिक्रियत इति ॥ २४ ॥ दृष्टान्तलक्षणम् लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिन्नर्थे बुद्धिसाम्यं स दृष्टान्तः ॥ २५ ॥ १लोकसामान्यमनतीता लौकिकाः, नैसर्गिकं वैनयिकं बुद्धयतिशयमप्राप्ताः । तद्विपरीताः परीक्षकाः, तर्केण प्रमाणैरर्थं परीक्षितुमर्हन्तीति । यथा यमर्थं लौकिका बुध्यन्ते तथा परीक्षका अपि, सोऽर्थो दृष्टान्तः । दृष्टान्तविरोधेन हि प्रतिपक्षाः प्रतिषेद्धव्या भवन्तीति, दृष्टान्तसमाधिना च स्वपक्षाः स्थापनीया भवन्तीति, अवयवेषु चोदाहरणाय कल्पत इति ॥ २५ ॥ प्रमाता जिस अर्थ (वस्तु) को अनुकूल या प्रतिकूल निश्चय कर प्रवृत्त हो, उसे 'प्रयोजन' कहते हैं ॥ २४ ॥ प्रमाता जिस अर्थ को उपादेय या हेय निश्चित करके उसकी प्राप्ति या त्याग का प्रयत्न करता है, उसे 'प्रयोजन' समझना चाहिये, क्योंकि वह (प्रयोजन) प्रमाता की प्रवृत्ति का हेतु होता है । 'इस अर्थ को ग्रहण करूँगा, या छोड़ूँगा', यह निश्चित (इच्छा) ही अर्थ का अधिकार (प्रयोजन) है । इस निश्चय का विषय अर्थ अधिकार का विषय है ॥ २४ ॥ जिस अर्थ में लौकिक और परीक्षकों का बुद्धि का साम्य (अविरोध) हो वह 'दृष्टान्त' कहलाता है ॥ २५ ॥ 'लौकिक' उसे कहते हैं जिसकी बुद्धि लोकविपरीत में न जाती हो, अर्थात् ऐसे शिष्य, जिन्होंने स्वाभाविक शास्त्रमर्यादित अर्थ को समझने में बुद्धि का वैशद्य न प्राप्त किये हो । उसके विपरीत 'परीक्षक' उसे कहते हैं जिसकी बुद्धि शास्त्रपरिशीलन से प्रकृष्ट हो चुकी हो, जो कि तर्क तथा प्रमाणों से अर्थ की परीक्षा कर सकता हो । जिस अर्थ को लौकिक तथा परीक्षक पुरुष एक-सा समझते हों, वह अर्थ 'दृष्टान्त' कहलाता है । दृष्टान्तविरोध से प्रतिपक्षी को बाद में रोका जाता है तथा दृष्टान्तसमाधान से अपना पक्ष परिपुष्ट किया जाता है, और पञ्चावयवों में उदाहरण की कल्पना दृष्टान्त से ही होती है—इन सब कारणों से दृष्टान्त को 'न्यायपूर्वाङ्ग' में समाविष्ट किया है ॥ २५ ॥ १. 'लोकसाम्यम्'—इति पाठ० । लोकसामान्यम् = मौर्य्यम् । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
४४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० न्यायाश्रयसिद्धान्तलक्षणप्रकरणम् [ २६-३१ ] अथ सिद्धान्तः । इदमित्थम्भूतञ्चेत्यभ्यनुज्ञायमानमर्थजातं सिद्धम्, सिद्धस्य संस्थितिः = सिद्धान्तः । संस्थितिः इत्थम्भावव्यवस्था, धर्मनियमः । स खल्वयम्— तन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थितिः सिद्धान्तः १ ॥ २६ ॥ तन्त्रार्थसंस्थितिः तन्त्रसंस्थितिः, तन्त्रम् = इतरेतराभिसम्बद्धस्यार्थसमूह- स्योपदेशः, शास्त्रम् । अधिकरणानुषक्तार्थसंस्थितिरधिकरणसंस्थितिः, अभ्युपगम- संस्थितिरनवधारितार्थपरिग्रहः, तद्विशेषपरीक्षणाय्याभ्युपगमसिद्धान्तः ॥ २६ ॥ तन्त्रभेदात्तु खलु— स चतुर्विधः सर्वतन्त्रप्रतितन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थित्यर्थन्तरभावात् ॥ २७ ॥ तत्रेताश्चतस्रः संस्थितयोऽर्थान्तरभूताः ॥ २७ ॥ अब 'सिद्धान्त' का व्याख्यान करते हैं । 'यह ऐसा'—इस प्रकार स्वीक्रियमाण अर्थसमूह 'सिद्ध' कहा जाता है, सिद्ध की संस्थिति 'सिद्धान्त' कहलाती है । 'संस्थिति' से तात्पर्य है 'ऐसा ही होना चाहिये'–इस तरह की व्यवस्था, अर्थात् इस प्रकार का निश्चय । प्रामाणिकतया स्वीक्रियमाण अर्थ की 'इदमित्थम्' इस व्यवस्था को 'सिद्धान्त' कहते हैं । अर्थात् धर्मनियम भी वही है । वही यह— शास्त्र, अधिकरण, अभ्युपगमभेद से विशेष परीक्षणार्थ स्वीकृत विषय (ज्ञानविशेष) की इत्थम्भावव्यवस्था 'सिद्धान्त' कहलाती है ॥ २६ ॥ परस्पर सम्बद्ध अर्थसमूह का उपदेशक शास्त्र 'तन्त्र' कहलाता है । तन्त्रार्थ की इत्थम्भावव्यवस्था 'तन्त्रसंस्थिति' कही जाती है, उसमें अधिकरणभेद से सम्बद्ध अर्थ 'अधिकरणसंस्थिति' कहलाता है । अनिश्चित अर्थ ( शास्त्र में साक्षात् अनुक्त, जैसे— इस शास्त्र में मन का इन्द्रियत्व ) का परिग्रह 'अभ्युपगमसंस्थिति' कहलाता है । संक्षेप में—मन आदि के विशेष अंश की परीक्षा के लिये अभ्युपगमसिद्धान्त माना जाता है ॥ २६ ॥ तन्त्रभेद से— वह सिद्धान्त चार प्रकार का होता है—१. सर्वतन्त्रसंस्थिति, २. प्रतितन्त्रसंस्थिति, ३. अधिकरणसंस्थिति तथा ४. अभ्युपगमसंस्थिति ॥ २७ ॥ भेद करने पर संस्थिति ( सिद्धान्त ) के ये चार भेद ही बन सकते हैं ॥ २७ ॥ १. तन्त्र्यन्ते पदार्था अनेनेति तन्त्रं प्रमाणम्, तदधिकरणमाश्रयो ज्ञापकत्या येषां पदार्थानामभ्युपगमो ज्ञानविशेषस्तस्य संस्थितिः 'इवमित्थमेव' इति व्यवस्थेति सूत्राक्षरार्थः । तथा च तच्छास्त्रसिद्धोऽर्थः, तन्निश्चयो वा तच्छास्त्रसिद्धान्त इति भावः । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
३०. सू० ] सिद्धान्तलक्षणप्रकरणम् ४५ तासाम्— सर्वतन्त्राविरुद्धस्तन्त्रेऽधिकृतोऽर्थः सर्वतन्त्रसिद्धान्तः ॥ २८ ॥ यथा घ्राणादीनीन्द्रियाणि, गन्धादय इन्द्रियार्थाः, पृथिव्यादीनि भूतानि, प्रमाणैरर्थस्य ग्रहणमिति ॥ २८ ॥ ४। समानतन्त्रसिद्धः परतन्त्रासिद्धः प्रतितन्त्रसिद्धान्तः ॥ २९ ॥ यथा—नासतः आत्मलाभः, न सतः आत्महानम्, निरतिशयाश्चेतनाः, देहेन्द्रियमनःसु विषयेषु तत्तत्कारणेषु च विशेषः—इति साङ्ख्यानाम्। पुरुषकर्मादिनिमित्तो भूतसर्गः, कर्महेतवो दोषाः, प्रवृत्तिश्च, स्वगुणविशिष्टा- श्चेतनाः, असदुत्पद्यते उत्पन्नं निरुध्यते—इति योगानाम्¹ ॥ २९ ॥ यत्सिद्धावन्यप्रकरणसिद्धिः सोऽधिकरणसिद्धान्तः ॥ ३० ॥ उन सिद्धान्तों में— अन्य तन्त्रों से सम्मत तथा स्वतन्त्र प्रतिपादित अर्थ 'सर्वतन्त्रसिद्धान्त' कहलाता है ॥२८॥ जैसे—'घ्राणादिक इन्द्रिय हैं', 'गन्धादि इन्द्रियों के विषय हैं', 'पृथिवी आदि महाभूत हैं', 'प्रमाण से अर्थ का ग्रहण होता है'—ये सिद्धान्त सभी तन्त्रों में समानतया गृहीत हैं, अतः इन्हें 'सर्वतन्त्रसिद्धान्त' कहा जाता है ॥ २८ ॥ समान (स्वमतानुयायी) तन्त्र में स्वीकृत तथा विरोधी अन्य तन्त्र में अस्वीकृत अर्थ 'प्रतितन्त्रसिद्धान्त' कहलाता है ॥ २९ ॥ 'असत् की उपलब्धि नहीं हो सकती, सत् का क्षय नहीं हो सकता' 'चेतन अपरि- णामी है, किसी धर्म से युक्त नहीं होता'; 'देह, इन्द्रिय, मन आदि स्थूल विषय तथा तत्कारण महत्, अहङ्कार, पञ्च तन्मात्रा, पञ्च महाभूत आदि सूक्ष्म विषयों में विशेष अतिशय रहता है' इत्यादि सांख्यतन्त्र के सिद्धान्त हैं । 'भूतसृष्टि पुरुषकर्मनिमित्तक है', प्रवृत्ति तथा दोष कर्महेतु हैं', 'चेतन स्वगुणविशिष्ट है', 'असत् उत्पन्न होता है' 'उत्पन्न विनष्ट होता है'—ये नैयायिकों के सिद्धान्त हैं। ये उभयविध सिद्धान्त सांख्य तथा नैयायिकों के लिये परस्पर 'प्रतितन्त्रसिद्धान्त' हुए ॥ २९ ॥ जिसके सिद्ध होने पर अन्य प्रकरण (साथ लगे अर्थ) की स्वतः सिद्धि हो जाये, वह 'अधिकरणसिद्धान्त' कहलाता है ॥ ३० ॥ १. वैशेषिकाणाम्—इति केचित् । तत्त्वतस्तु योगशब्देनात्र नैयायिका एवाभिप्रेताः । एतस्मिन्नेवार्थेऽस्य प्रयोगो बहुत्रोपलभ्यते प्राचीनग्रन्थेषु ।
४६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० यस्यार्थस्य सिद्धावन्येऽर्था अनुषज्यन्ते, न तैर्विना सोऽर्थः सिद्ध्यति, तेऽर्था यदधिष्ठानाः, सोऽधिकरणसिद्धान्तः । यथा—'देहेन्द्रियव्यतिरिक्तो ज्ञाता, दर्शन- स्पर्शनाभ्यामेकार्थग्रहणात्' इति । अत्रानुषङ्गिणोऽर्थाः—'इन्द्रियनानात्वम्', नियतविषयाणीन्द्रियाणि', 'स्वविषयग्रहणलिङ्गानि ज्ञातुर्ज्ञानसाधनानि', 'गन्धा- दिगुणव्यतिरिक्तं द्रव्यं गुणाधिकरणम्' 'अनियतविषयाश्चेतना' इति पूर्वार्थ- सिद्धावेतेऽर्थाः सिद्ध्यन्ति, न तैर्विना सोऽर्थः सम्भवतोति' ।। ३० ।। अपरीक्षिताभ्युपगमात् तद्विशेषपरीक्षणमभ्युपगमसिद्धान्तः ।। ३१ ।। यत्र किञ्चिदर्थजातमपरीक्षितमभ्युपगम्यते—अस्ति द्रव्यं शब्दः; स तु नित्यः, अथानित्य इति ? द्रव्यस्य सतो नित्यताऽनित्यता वा तद्विशेषः परीक्ष्यते, सोऽभ्यु- पग़मसिद्धान्तः, स्वबुद्धयतिशयचिख्यापयिषया परबुद्धयवज्ञानाच्च प्रवर्तत इति ।। ३१ ।। जिस अर्थ की सिद्धि से अन्य अर्थ अनुषक्त ( = सिद्ध, साथ लगे हुए) हों, उनके बिना वह अर्थ सिद्ध न होता हो, वे अर्थ जहाँ उपवर्णित हों, वह 'अधिकरणसिद्धान्त' कहलाता है। जैसे—'दर्शन तथा स्पर्श द्वारा एक ही अर्थ का ग्रहण होने से देहेन्द्रिय से अतिरिक्त अन्य कोई ज्ञाता है'—इस अनुमान में अनुषक्त (साथ लगे) अर्थ हैं—इन्द्रियों का नानात्व, इन्द्रियों का नियतविषयत्व, इन्द्रियों का स्वविषयग्रहणहेतु तथा ज्ञाता के लिये इन्द्रियों का ज्ञानसाधनत्व आदि और 'द्रव्य गन्धादि गुणों से अतिरिक्त है और गुणों का अधिष्ठान है', 'चेतन धर्म अनियतविषयक है'.आदि । पूर्व साक्षाद् अधिकृत अर्थ की सिद्धि होने पर ही ये अर्थ सिद्ध हो सकते हैं, इनकी सिद्धि के बिना वह अर्थ भी सिद्ध न हो पायेगा। यह परस्पर एक दूसरे को प्रमाणित करना ही 'अधिकरणसिद्धान्त' कहलाता है ।। ३० ।। जो अर्थ सूत्रों में परीक्षित न हो परन्तु शास्त्र में मिलता हो उसका विशेष परीक्षण 'अभ्युपगमसिद्धान्त' कहलाता है ।। ३१ ।। कोई ऐसा अर्थसमूह जो अपरीक्षित (सूत्र में न कहा गया या जिसकी सम्यक् परीक्षा न की गयी) हो, शास्त्र में मिल जाये उसकी विशेष परीक्षा ही 'अभ्युपगमसिद्धान्त' कह- लाती है। जैसे—'शब्द द्रव्य है, वह नित्य है या अनित्य', यहाँ शब्द की द्रव्यत्वपरीक्षा तथा द्रव्य होने पर उसकी नित्यता या अनित्यता की यह विशिष्ट सूक्ष्म परीक्षा ही 'अभ्युपगमसिद्धान्त' है। अभ्युपगमसिद्धान्त का उपयोग अपनी बुद्धि की उत्कृष्टता दिखलाने तथा प्रतिपक्षी की बुद्धि को अपकृष्टता के लिये किया जाता है ।। ३१ ।। १. अत्रार्थापत्तिमुखेनाधिकरणसिद्धान्तखण्डनाय बद्धपरिकराणां बौद्धनैयायिकानां मतं तत्खण्डनं च वार्त्तिकेऽवधेयं सुधीभिः। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
३२. सू० ] न्यायप्रकरणम् ४७ न्यायप्रकरणम् [ ३२-३९ ] अथावयवाः । प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः ॥ ३२ ॥ दशावयवानेके नैयायिका वाक्ये सञ्चक्षते-जिज्ञासा, संशयः, शक्यप्राप्तिः, प्रयोजनम्, संशयव्युदास इति, ते कस्मान्नोच्यन्त इति ? तत्राप्रतीयमानेऽर्थे प्रत्ययार्थस्य प्रर्वतिका जिज्ञासा । अप्रतीयमानमर्थं कस्मा- ज्जिज्ञासते ? 'तं तत्त्वतो ज्ञातं हास्यामि वा, उपादास्ये वा, उपेक्षिष्ये वा' इति। ता एता हानोपादानोपेक्षाबुद्धयस्तत्त्वज्ञानस्यार्थः, तदर्थमयं जिज्ञासते । सा खल्वियम- साधनमर्थस्येति । जिज्ञासाधिष्ठानं संशयश्च व्याहतधर्मोपसङ्घातात् तत्त्वज्ञाने प्रत्यासन्नः, व्याहतयोर्हि धर्मयोरन्यतरत्तत्त्वं भवितुमर्हतीति । स पृथगुपदिष्टोऽ- प्यासाधनमर्थस्येति । प्रमातुः प्रमाणानि प्रमेयाधिगमार्थानि, सा शक्यप्राप्तिर्न साधकस्य वाक्यस्य भागेन युज्यते प्रतिज्ञादिवदिति । प्रयोजनं तत्त्वावधारण- मर्थसाधकस्य वाक्यस्य फलम्, नैकदेश इति । संशयव्युदासः प्रतिपक्षोपवर्णनम्, अब अवयवों का वर्णन करते हैं- प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन-न्याय वाक्य के ये ( पाँच ) अवयव हैं ॥ ३२ ॥ कुछ नैयायिक न्याय वाक्य के दश अवयव मानते हैं, जिनमें पाँच तो ऊपर गिना ही दिये गये हैं, इनके अतिरिक्त पाँच ये हैं-१. जिज्ञासा, २. संशय, ३. शक्यप्राप्ति, ४. प्रयोजन तथा ५. संशयनाश; सूत्र में ये अतिरिक्त पाँच भी क्यों नहीं कहे गये ? 'जिज्ञासा' अप्रतीयमान अर्थ में प्रत्यय होने के लिये प्रवर्त्तिका होती है, अप्रतीयमान अर्थ की इसलिए जिज्ञासा होती है कि उसे तत्त्वतः जान कर छोड़ दूँगा, या ग्रहण कर लूँगा या उपेक्षा कर दूँगा। ये हान, उपादान, उपेक्षा बुद्धियाँ तत्त्वज्ञान से होती हैं, तत्त्वज्ञान के लिए 'जिज्ञासा' काम आती है। यह किसी अर्थ की साधिका नहीं हैं, अतः पञ्चावयवों में इसका परिगणन निरर्थक है। क्योंकि जिज्ञासाधिष्ठान 'संशय' में दो विरुद्ध धर्मों का उपसंघात होता है, अतः यह तत्त्वज्ञान के लिये प्रत्यासन्न है, विरुद्ध धर्म में से अन्यतर होना चाहिए केवल इतना समझता है, इसीलिए इसका प्रमेयों में पाठ करके भी पञ्चावयवों में इसे नहीं पढा, क्योंकि यह भी अर्थसाधक कोटि में नहीं आता। प्रमाता के प्रमाण प्रमेयप्राप्त्यर्थक हैं'- यह 'शक्यप्राप्ति' साधक वाक्य में प्रतिज्ञा की तरह अवयवरूप से प्रयुक्त नहीं होती। तत्त्वावधारण को 'प्रयोजन' कहते हैं, यह अर्थ- साधक वाक्य का फल हो सकता है, अवयव नहीं। इसी तरह 'संशयव्युदास' भी तत्त्वा- भ्यनुज्ञा के लिये उपयुक्त है, क्योंकि प्रतिपक्षोपवर्णन का निषेधक है, जो तत्त्वज्ञान में सहायक हो सकता है, अर्थसाधक वाक्य का एकदेश नहीं बन सकता । [नैयायिक भद्रबाहु 'संशय', 'संशयव्युदास' के स्थान पर 'आशङ्काप्रतिषेध' का परिगणन करते हैं, उनका