न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजन्मनि दुःखदर्शी निर्विद्यते, निर्विण्णो विरज्यते, विरक्तो विमुच्यते ॥ २१ ॥ (ठ) अपवर्गलक्षणम् यत्र तु निष्ठा यत्र तु पर्यवसानम्, सोऽयम्— तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः ॥ २२ ॥ तेन = दुःखेन जन्मना, अत्यन्तं विमुक्तिः = अपवर्गः । कथम् ? उपात्तस्य जन्मनो हानम्, अन्यस्य चानुपादानम् । एतामवस्थामपर्यन्तामपवर्गं वेदयन्ते- ऽपवर्गविदः । तदभयम्, अजरम्, अमृत्युपदं ब्रह्म, क्षेमप्राप्तिरिति । नित्यं सुखमात्मनो महत्त्ववन्मोक्षे व्यज्यते, तेनाभिव्यक्तेनात्यन्तं विमुक्तः सुखी भवतीति केचिन्मन्यन्ते; तेषां प्रमाणाभावपादनुपपत्तिः । न प्रत्यक्षं नानुमानं नागमो वा विद्यते—'नित्यं सुखमात्मनो महत्त्ववन्मोक्षेऽभिव्यज्यते' इति । नित्यस्याभिव्यक्तिः-संवेदनम्, तस्य हेतुवचनम् । नित्यस्याभिव्यक्तिः = संवेदनम्, ज्ञानमिति, तस्य हेतुर्वाच्यः, यतस्तदुत्पद्यत इति । जन्म लेने में दुःख मानता है, दुःख मानकर ग्लानि करता है, ग्लानि मानकर सभी विषयों में वैराग्य धारण करता है, विरक्त होकर 'मोक्ष' पा जाता है ॥ २१ ॥ जहाँ इस दुःख की अवधि है, जहाँ अन्त है, वह— उस (जन्मरूप) दुःख से सदा के लिये छुटकारा पा जाना 'अपवर्ग' (मोक्ष) कहलाता है ॥ २२ ॥ उस जन्मरूप दुःख से अत्यन्त (पुनरावृत्तिरहित) विमुक्ति (छुटकारा) ही अपवर्ग (मोक्ष) कहलाता है। कैसे ? क्योंकि तब प्राप्त जन्म का त्याग हो जाता है तथा अन्य (आगामी) जन्म का उपादान नहीं हो पाता । इस मोक्षरूप अविनाशी अवस्था को मुक्तितत्त्वज्ञ विद्वान् 'अपवर्ग' कहते हैं। इस प्रकार के इस कैवल्य पद में कहीं किसी से भी भय नहीं है, जरा (जीर्णता, वार्धक्य) नहीं है, यह अमृत्युपद भावरूप अवस्थाविशेष है, ब्रह्म है, नित्य सुख का आधार है । महत्त्व की तरह मोक्ष में 'आत्मा में नित्य सुख अभिव्यक्त होता है, उसके अभि- व्यक्त होने से विमुक्त अत्यन्त सुखी होता है'—ऐसा कुछ लोग मानते हैं; प्रमाण न होने से उनके इस मन्तव्य को अयुक्त ही समझें; क्योंकि ऐसा कोई प्रत्यक्ष, अनुमान या आगम प्रमाण नहीं है जिससे यह सिद्ध किया जा सके कि महत्त्व (व्यापकता) की तरह आत्मा को मोक्षावस्था में आत्मगत नित्य सुख अभिव्यक्त होता है । नित्य की अभिव्यक्ति—अर्थात् संवेदन, उस में कोई हेतु बतलाना चाहिये । यतः नित्य की अभिव्यक्ति = संवेदन अर्थात् ज्ञान है, अतः उसमें कोई हेतु दिखाना चाहिये जिससे वह (ज्ञान) उत्पन्न होता हो ।