न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० ( ञ ) फललक्षणम् प्रवृत्तिदोषजनितोऽर्थः फलम् ॥ २० ॥ सुखदुःखसंवेदनं फलम्। सुखविपाकं कर्म दुःखविपाकं च, तत्पुनर्देहेन्द्रिय- विषयबुद्धिषु सतीषु भवतीति सह देहादिभिः फलमभिप्रेतम्। तथा हि प्रवृत्ति- दोषजनितोऽर्थः फलमेतत्सर्वं भवति। तदेतत्फलमुपात्तमुपात्तं हेयम्, त्यक्तं त्यक्तमुपादेयमिति नास्य हानोपादान- योर्निष्ठा पर्यवसानं वास्ति। स खल्वयं फलस्य हानोपादानस्रोतसोह्यते लोक इति ॥ २० ॥ ( ट ) दुःखलक्षणम् अथैतदेव— बाधनालक्षणं दुःखम् ॥ २१ ॥ बाधना = पीडा, ताप इति। तयाऽनुविद्धमनुषक्तमविनिर्भागेन वर्त्तमानं दुःखयोगाद् दुःखमिति। सोऽयं सर्वं दुःखैनानुविद्धमिति पश्यन् दुःखं जिहासु- प्रवृत्ति तथा दोष से जनित सुख-दुःखरूप अर्थ 'फल' कहलाता है ॥ २० ॥ सुख-दुःख को स्वसम्बन्धितया अनुभव करना ही फल है। देह, इन्द्रिय, विषय, बुद्धि की समष्टि में सुखविपाक तथा दुःखविपाक—यों दो प्रकार का कर्म होता है. इसलिये यहां देहादिकों के साथ उपर्युक्त लक्षण वाला फल अभिप्रेत है। निष्कृष्टार्थ यह है कि सुख-दुःखसंवेदन तथा शरीरादि के साथ सम्बन्ध—ये दोनों प्रवृत्ति-दोष जनित हैं, अतः दोनों ही 'फल' कहलाते हैं। यह उक्त प्रकार का फल पुनः पुनः प्राप्त कर छोड़ दिया जा सकता है, तथा इसे बार बार छोड़कर पुनः प्राप्त करने की इच्छा हो जाती है, इसीलिए इसके हान (त्याग) या उपादान (ग्रहण) की कोई सीमा नहीं है, कोई अन्त नहीं है। यह समस्त संसार इसी हानोपादान-प्रवाह में पड़कर सुख-दुःख भोगता रहता है ॥ २० ॥ यह शरीरादि फलान्त प्रमेय ही— बाधना (पीड़ा) 'दुःख' कहलाता है ॥ २१ ॥ 'बाधना' कहते हैं पीड़ा अर्थात् ताप को। उसी से अनुस्यूत, उसके बिना न रहने वाला, उसी में ओतप्रोत दुःखपरिणाम के कारण को दुःख कहते हैं। यह सब दुःख से अनुस्यूत है, दुःख के विना नहीं रह पाता, अतः यह सब कुछ 'दुःख' है। इस प्रकार प्रमाता 'यह समग्र दृश्यमान जगत् दुःख है'—ऐसा विचार करता हुआ