भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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४० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० प्रहीणे' नित्यसुखरागस्याप्रतिकूलत्वम् । अथास्य नित्यसुखरागः प्रहीयते, तस्मिन् प्रहीणे नास्य नित्यसुखरागः प्रतिकूलो भवति ? यद्येवम्, मुक्तस्य नित्यं सुखं भवति; अथापि न भवति; नास्योभयोः पक्षयोर्मोक्षाधिगमो विकल्पत . इति ॥ २२ ॥ न्यायपूर्वाङ्गलक्षणप्रकरणम् [ २३-२४ ] संशयलक्षणम् स्थानवत एव तर्हि संशयस्य लक्षणं वाच्यमिति तदुच्यते- समानानेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः२ ॥ २३ ॥ समानधर्मोपपत्तेर्विशेषापेक्षो विमर्शः संशय इति । स्थाणु-पुरुषयोः समानं धर्ममारोहपरिणाहौ पश्यन् पूर्वदृष्टं च तयोर्विशेषं बुभुत्समानः किंस्विदित्यन्यतरं नावधारयति, तदनवधारणं ज्ञानं संशयः । 'समानमनयोर्धर्ममुपलभे, विशेषमन्य- प्रहीण मानने पर भी नित्यसुखराग मोक्ष के विरुद्ध नहीं पड़ेगा । जब इस मुमुक्षु का नित्यसुखराग क्षीण हो जाता है, तब इसका यह नित्यसुखराग प्रतिकूल नहीं होगा, तब तो उसे मोक्ष का अधिगम हो जाना चाहिये ? यदि ऐसी बात है तो मुक्त को नित्य सुख होता हो, या न होता हो-दोनों ही पक्षों में मोक्षप्राप्ति असन्दिग्ध ही है ॥ २२ ॥ क्रमप्राप्त अवसर आने पर 'संशय' का लक्षण कथनीय है, अतः अब उसे कह रहे हैं- समान धर्मोपलब्धि (उपपत्ति) से, अनेक धर्मोपलब्धि से, विप्रतिपत्ति से, उपलब्धि की अव्यवस्था तथा अनुपलब्धि की अव्यवस्था से विशेष अपेक्षा रखनेवाला विमर्श 'संशय' कहलाता है ॥ २३ ॥ १. समान धर्मोपपत्ति से विशेषापेक्ष विमर्श 'संशय' कहलाता है । जैसे-स्थाणु और पुरुष में तुल्य धर्म आरोह-परिणाह ( उतार-चढ़ाव ) को देखता हुआ प्रमाता पहले देखे हुए उनके विशेष ( विभेदक धर्म ) को जानना चाहता हुआ 'वस्तुतः क्या है ?'-यह एकतर निश्चय नहीं कर पाता, उक्त अनिश्चयरूप ज्ञान ही 'संशय' कहलाता है । 'इन दोनों के तुल्य धर्मों को ही पा रहा हूँ, विशेष धर्मों को नहीं'-यह बुद्धि 'अपेक्षा' कह- लाती है, जो कि संशय की प्रवर्त्तिका है । संक्षेप में यों कह सकते हैं कि 'विशेषापेक्ष विमर्श' ही 'संशय' होता है । १. 'प्रहीणनित्य'०-इति पाठ० । २. संवदनीयम्-'सामान्यप्रत्यक्षात् विशेषाप्रत्यक्षाद् विशेषस्मृतेश्च संशयः' इति काणादाः । 'साधर्म्यदर्शनाद्विशेषोपलिप्सोर्विमर्शः संशयः' इति बौद्धाः । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri