भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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२२. सू० ] प्रमेयप्रकरणम् ३९ कल्पयितव्याः ! साधीयश्चैवं मुक्तस्य चैकात्म्यं कल्पितं भवतीति । उपपत्तिविरुद्धमिति चेत् ? समानम् । देहादिनां नित्यत्वं प्रमाणविरुद्धं कल्प- यितुमशक्यमिति ? समानम् । सुखस्यापि नित्यत्वं प्रमाणविरुद्धं कल्पयितुमशक्य- मिति । आत्यन्तिके च संसारदुःखाभावे सुखवचनादागमेऽपि सत्यविरोधः । यद्यपि कश्चिदागमः स्यात्—‘मुक्तस्यात्यन्तिकं सुखम्' इति, सुखशब्द आत्यन्तिके दुःखाभावे प्रयुक्त इत्येवमुपपद्यते । दृष्टो हि दुःखाभावे२ सुखशब्दप्रयोगो बहुलं लोक इति । नित्यसुखरागस्याप्रहाणे मोक्षाधिगमाभावः, रागस्य बन्धनसमाज्ञानात् । यद्ययं मोक्षो नित्यं सुखमभिव्यञ्जयत इति ? नित्यसुखरागेण मोक्षाय घटमानो न मोक्षमधिगच्छेत् नाधिगन्तुमर्हतीति । बन्धनसमाज्ञातो हि रागः । न च बन्धने सत्यपि कश्चिन्मुक्त इत्युपपद्यत इति । की ही 'मोक्ष' रूप में कल्पना की जा सकती है । इससे वेदान्तियों की 'मुक्त की एकात्म- कल्पना' भी सुगम हो सकेगी ! जैसे नित्य देह की कल्पना में 'उपपत्तिविरुद्ध' कहोगे तो तुम्हारे पक्षमें भी यह 'उप- पत्तिविरोध' समान है ! जैसे प्रमाणविरुद्ध 'देहादि की नित्यता' कल्पना अशक्य है, वैसे ही प्रमाणविरुद्ध 'सुख की नित्यता' कल्पना भी अशक्य होगी ! 'मुक्त में आत्यन्तिक सुख होता है'—ऐसे आगम में आत्यन्तिक सुख का प्रयोग 'सांसारिक दुःखाभाव' में होने से कोई विरोध नहीं है । यद्यपि 'मुक्त को आत्यन्तिक सुख मिलता है'—ऐसा आगम उपलब्ध है, परन्तु इस आगम में 'सुख' शब्द का प्रयोग आत्यन्तिक दुःखाभाव के लिए किया गया है । प्रायः लोक में भी दुःखाभाव के लिये 'सुख' का प्रयोग होता है । (जैसे—सिर से बोझ उतरने पर किसी अतिरिक्त सुख की उत्पत्ति न होने पर भी भारवाहक कहता है—'ओह ! अब आराम मिला !') नित्य सुख में मुमुक्ष की प्रवृत्ति यदि राग से होती हो तो रागनिवृत्ति न होने से तत्सम्पाद्य मोक्ष की भी अनुपपत्ति ही रहेगी ? इसलिये कहते हैं—नित्यसुख-राग के क्षीण न होने पर मोक्षप्राप्ति भी न होगी; क्योंकि राग तो बन्धन का हेतु है । मुमुक्षु यदि 'मोक्ष नित्य सुख अभिव्यक्त करता है'—ऐसा राग करके मोक्ष के लिये प्रयत्न करता है, तो वह मोक्ष नहीं पा सकेगा; क्योंकि राग भी तो एक प्रकार का बन्धन है और बन्धन के रहते कोई 'मुक्त' नहीं कहला सकता ! २. 'दुःखादेरभावे-इति पाठ० । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri