न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३५ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० इष्टाधिगमार्था प्रवृत्तिरिति चेत् ? न; अनिष्टोपरमार्थत्वात् । इदमनुमानम्- इष्टाधिगमार्थो मोक्षोपदेशः, प्रवृत्तिश्च मुमुक्षूणाम्, नोभयमनर्थकमिति ? एतच्चा- युक्तम्; 'अनिष्टोपरमार्थो मोक्षोपदेशः, प्रवृत्तिश्च मुमुक्षूणाम्' इति । नेष्टमनिष्टे- नाननुविद्धं सम्भवतीति इष्टमप्यनिष्टं सम्पद्यते । अनिष्टहानाय घटमान इष्टमपि जहाति, विवेकहानस्याशक्यत्वादिति । दृष्टातिक्रमश्च देहादिषु तुल्यः । यथा दृष्टमनित्यं सुखं परित्यज्य नित्यं सुखं कामयते, एवं देहेन्द्रियबुद्धीरनित्या दृष्टा अतिक्रम्य मुक्तस्य नित्या देहेन्द्रियबुद्धयः में समानता नहीं है; परन्तु उनका मत भी समीचीन है, क्योंकि शरीरादि को पहले उपभोग का साधन मानना, फिर उन्हें उसका प्रतिबन्धक मानना—ये दो बातें एक साथ कैसे बनेंगी ! 'अशरीरी आत्मा को कोई भोग होता है'—ऐसा कोई अनुमान भी नहीं है। [ 'मोक्ष में नित्य सुख अभिव्यक्त होता है—इसमें कोई प्रमाण नहीं है' ऐसा भाष्यकार पहले कह चुके हैं, वहां वेदान्ती कहता है—] पुरुष की प्रवृत्तियाँ इष्ट सुखप्राप्ति के लिए ही देखी जाती हैं'—ऐसा अनुमान प्रमाण मान लें ? यह भी नहीं मान सकते; क्योंकि उसकी सभी प्रवृत्तियाँ केवल इष्टप्राप्ति के लिए ही नहीं, बल्कि उनमें कुछ अनिष्ट की निवृत्ति के लिये भी हुआ करती हैं। यदि यह अनुमान करें—'इष्टप्राप्ति के लिए मोक्षोपदेश किया जाता है, मुमुक्षुओं की उस उपदेश में प्रवृत्ति भी देखी जाती है', अतः दोनों ही निरर्थक नहीं हैं ? तो यह ठीक नहीं; क्योंकि 'अनिष्टनिवृत्ति के लिए मोक्षोपदेश किया जाता है, मुमुक्षुओं की उस उपदेश में प्रवृत्ति भी देखी जाती है' यह अनुमान भी किया जा सकता है। इस संसार में ऐसा कोई भी इष्ट नहीं है जो अनिष्ट से अनुस्यूत न हो, अतः इष्ट भी किसी समय अनिष्ट बन सकता है। उस अनिष्ट की निवृत्ति के लिए प्रवर्तमान पुरुष अपने इष्ट को भी छोड़ बैठेगा; क्योंकि इष्टानिष्ट के परस्पर संश्लिष्ट होने से अनिष्टांश का त्याग तथा इष्टांश का रक्षण सर्वथा दुःशक है। [ 'इस संसार में क्षणिक सुख को छोड़कर बुद्धिपूर्वककारी स्थायी सुख ग्रहण करता है, उनमें स्थायितम सुख ही मोक्ष है'—ऐसा मानेंगे तो यह नय देहादि में भी समान पड़ेगा; क्योंकि उनके विषय में भी कहा जा सकता है—'क्षणिक नश्वर देहादि को छोड़- कर उनसे स्थायितर किसी अन्य को चाहने की बुद्धिपूर्वककारी की इच्छा होती है इसलिए स्थायितम देहेन्द्रियादिरूप ही मोक्ष है' इस आशय से भाष्यकार परिहास करते हैं—] दृष्ट का अतिक्रमण कर उससे अच्छे अदृष्ट सुख की कल्पना को मोक्ष मानने पर देहादि में भी यह बात समान पड़ेगी। जैसे पुरुष दृष्ट सुख को छोड़कर नित्य सुख को चाहता है; इसी तरह देहेन्द्रिय बुद्धि को अनित्य समझकर उन्हें छोड़ते हुए इनसे अच्छी देहेन्द्रिय-बुद्धियों CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri