भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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५२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० निगमनलक्षणम् हेत्वपदेशात् प्रतिज्ञाया पुनर्वचनं निगमनम् ॥ ३९ ॥ साधर्म्योक्ते वा वैधर्म्योक्ते वा यथोदाहरणमुपसंह्रियते, 'तस्मादुत्पत्ति- धर्मकत्वादनित्यः शब्दः' इति निगमनम् । निगम्यन्ते अनेनेति प्रतिज्ञाहेतूदाहरणो- पनया एकत्रेति निगमनम् । निगम्यन्ते = समर्थ्यन्ते, सम्बध्यन्ते । तत्र साधर्म्योक्ते तावद्धेतौ वाक्यम् —'अनित्यः शब्दः' इति प्रतिज्ञा, 'उत्पत्तिधर्मकत्वात्' इति हेतुः, 'उत्पत्तिधर्मकं स्थात्यादि द्रव्यमनित्यम्' इत्यु- दाहरणम्, 'तथा चोत्पत्तिधर्मकः शब्दः' इत्युपनयः, 'तस्मादुत्पत्तिधर्मकत्वा- दनित्यः शब्दः' इति निगमनम् । वैधर्म्योक्तेऽपि — 'अनित्यः शब्दः', 'उत्पत्तिधर्मकत्वात्', 'अनुत्पत्तिधर्म- कमात्मादि द्रव्यं नित्यं दृष्टम्', 'न च तथानुत्पत्तिधर्मकः शब्दः', 'तस्मादुत्पत्ति- धर्मकत्वादनित्यः शब्दः' इति । अवयवसमुदाये च वाक्ये सम्भूयेतरेतराभिसम्बन्धात् प्रमाणान्यर्थान् साध- यन्तीति । सम्भवस्तावत्-शब्दविषया प्रतिज्ञा, आप्तोपदेशस्य प्रत्यक्षानुमानाभ्यां हेतु-कथन के बाद प्रतिज्ञा को फिर से दुहराना ही 'निगमन' कहलाता है ॥ ३९ ॥ साधर्म्ययुक्त या वैधर्म्ययुक्त हेतुकथनानन्तर जैसे उदाहरण अपना काम कर चुका होता है, उसी प्रकार उत्पत्तिधर्मकत्वहेतु से उपसंहृत 'शब्द अनित्य है'—इस प्रकार प्रतिज्ञा को पुनः दुहराना ही 'निगमन' कहलाता है । निगमन में प्रतिज्ञा-आदि चतुष्टय समर्थित होते हैं । साधर्म्ययुक्त हेतु में वाक्य यों विभक्त होगा—'शब्द अनित्य है' यह प्रतिज्ञा हुई, 'उत्पत्तिधर्मा होने से' यह हेतु हुआ, 'उत्पत्तिधर्मा स्थाली आदि द्रव्य अनित्य होते हैं' यह उदाहरण हुआ, 'वैसा ही यह शब्द है' यह उपनय हुआ, 'इसलिये उत्पत्तिधर्मा होने से शब्द अनित्य है' यह निगमन हुआ । वैधर्म्ययुक्त हेतुवाक्य में—'शब्द अनित्य हैं', 'उत्पत्तिधर्मा होने से', 'अनुत्पत्तिधर्मा आत्मादि द्रव्य नित्य देखा गया हैं', 'यह शब्द वैसा अनुत्पत्तिधर्मक नहीं है', 'इसलिये उत्पत्तिधर्मक होने से शब्द अनित्य है'—इस प्रकार पञ्चावयव का प्रयोग होगा । इस पञ्चावयवयुक्त वाक्य में अनेक प्रमाण सम्मिलित होकर परस्पर सम्बद्ध रहते हुए अर्थसाधन करते हैं । प्रमाणों के इस सम्मिश्रण को इस तरह समझना चाहिये—'शब्द अनित्य है' यह प्रतिज्ञा आप्तोपदेश है, ऋष्यनुक्त आप्तोपदेश स्वतन्त्र नहीं हो सकता, उसमें अवश्य प्रत्यक्ष या अनुमान की आवश्यकता पड़ेगी, अतः प्रतिज्ञा में प्रत्यक्ष तथा अनुमान का सम्मिश्रण हुआ । इसी प्रकार साध्य-साधन की व्याप्ति को उदाहरण में देखकर ही हेतु का CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri