भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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३९. सू० ] न्यायप्रकरणम् ५३ प्रतिसन्धानाद्, अनुह्वेश्च स्वातन्त्र्यानुपपत्तेः । अनुमानं हेतुः, उदाहरणे सादृश्य- प्रतिपत्तेः। तच्चोदाहरणभाष्ये १ (१.१.३६) व्याख्यातम् । प्रत्यक्षविषयमुदाहरणम्, दृष्टेनादृष्टसिद्धेः । उपमानमुपनयः, 'तथा' इत्युपसंहारात्, 'न च तथा' इति वोपमानधर्मप्रतिषेधे विपरीतधर्मोपसंहारसिद्धेः। २सर्वेषामेकार्थप्रतिपत्तौ सामर्थ्य- प्रदर्शनं निगमनमिति । इतरेतराभिसम्बन्धोऽपि-असत्यां प्रतिज्ञायामनाश्रया हेत्वादयो न प्रवर्त्तेरन् । असति हेतौ कस्य साधनभावः प्रदर्श्येत, उदाहरणे साध्ये च कस्योपसंहारः स्यात्, कस्य चापदेशात् प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनं स्यादिति ! असत्युदाहरणे केन साधर्म्यं वैधर्म्यं वा साध्यसाधनमुपादीयेत, कस्य वा साधर्म्यवशादुपसंहारः प्रवर्त्तेत ! उपनयं चान्तरेण साध्येऽनुपसंहृतः साधको धर्मो नार्थं साधयेत् । निगमनाभावे चानभिव्यक्तसम्बन्धानां प्रतिज्ञादीनामेकार्थेन प्रवर्त्तनं 'तथा' इति प्रतिपादनं कस्येति ! अथावयवार्थः—साध्यस्य धर्मस्य धर्मिणा सम्बन्धोपादानं प्रतिज्ञार्थः, हेतुत्व निश्चित होता है, अतः उदाहरण में सादृश्य-प्रतिपादन से हुए अनुमान को ही 'हेतु' कहते हैं । इसका विशद विवेचन हम पीछे उदाहरणसूत्र-व्याख्यान (१.१.३६) के समय कर आये हैं । उदाहरण प्रत्यक्षाधीन होता है; क्योंकि उस दृष्ट उदाहरण से अदृष्ट (परोक्ष) की सिद्धि की जाती है । उपनय को उपमान प्रमाण की जरूरत पड़ती है; क्योंकि इस उपनय में 'वैसा ही' यह उपसंहार होता है, या 'वैसा नहीं' यह उपमान- धर्म प्रतिषिद्ध होने पर विपरीतधर्मा (वैधर्म्ययुक्त) उपसंहार सिद्ध हो सकेगा । 'प्रतिज्ञा से उपनय तक का अर्थ या स्वभाव प्रतिबद्धलिङ्ग हैं'-ऐसा प्रतिपादनसामर्थ्य दिखाना निगमन का अर्थ होने से उसमें सब प्रमाणों का सम्मिश्रण स्पष्ट ही है । इनका परस्पर सम्बन्ध यों समझना चाहिये-पहली बात तो यह है कि वाक्य में में प्रतिज्ञा के न रहने पर आश्रयरहित हेत्वादि की प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी । हेतु के न रहने पर वाक्य में साधनत्व किसका दिखायेंगे ! उदाहरण और साध्य में किसका उप- संहार करेंगे ! किसके कथनानन्तर प्रतिज्ञा का पुनर्वचन करेंगे कि वाक्यपूर्ण हो जाये ! दूसरी बात यह है कि उदाहरण के न कहने पर किसके साथ समानता या असमानता मानकर साध्य की सिद्धि दिखायेंगे और किस साधर्म्य की अपेक्षा से उपसंहार करेंगे ! उपनय के बिना साध्य में अनुपसंहृत साधक धर्म अर्थसिद्धि नहीं कर सकता ! निगमन के बिना प्रतिज्ञादिकों का परस्पर सम्बन्ध अभिव्यक्त न हो पायेगा, तब उनकी एक प्रयोजन से प्रवृत्ति, 'तथा' ऐसा प्रतिपादन किसका होगा ! अब अवयवों का फलनिरूपण करते हैं—साध्य धर्म का धर्मी से सम्बन्ध-बोधन १. उदाहरणसूत्रव्याख्यावसर इत्यर्थः । २. प्रतिज्ञादिनिगमनान्तानाम् ।