न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 8, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ेंसम्पादकीय त्रीन् गकारान्मस्कृत्य गुरुं गां चैव गौतमम् । न्यायदर्शनमाश्रित्य वक्ष्ये किञ्चिद् यथामति ॥ दर्शन की उपयोगिता मनुष्य क्या है ? कौन है ? उसके जीवन का लक्ष्य क्या है ? यह संसार क्या है ? इसकी सृष्टि कैसे होती है ? इसका स्रष्टा कौन है ? मनुष्य को कैसा जीवन बिताना चाहिये ? ईश्वर तथा कर्म क्या है ? इत्यादि अनेक विचार मानव को प्रारम्भ से ही, जब से भी उसमें विचार करने की शक्ति आयी हो, द्वैविध्य में डालते रहे हैं । भारतीय दर्शियों के मत में मानव को इन विषयों का तत्त्वज्ञान हो सकता है । इसी को भारतीय तत्त्वदर्शी 'सम्यग्दृष्टि' या 'दर्शन' कहते हैं । सम्यग्दर्शन (तत्त्वज्ञान) होने पर कर्म मनुष्य को बन्धन में नहीं डालते, परन्तु जिनको यह 'सम्यग्दर्शन' नहीं है वे भवबन्धन में ही फँसे रहते हैं । कहने का तात्पर्य यह है कि 'दर्शन' उक्त सभी प्रश्नों का सन्तोषजनक उत्तर देकर मानव को लक्ष्य तक पहुँचा देता है । भारतीय दर्शनों की विचार-प्रणाली व्यापक है, प्राचीन या आधुनिक, वैदिक या अवैदिक, आस्तिक या नास्तिक—सभी भारतीय तत्त्वदर्शी स्वपक्षस्थापन के समय परपक्ष पर अवश्य विचार करते आये हैं । इसी लिये सर्वदर्शनसंग्रहकार ने जहाँ वैदिक धर्मानुयायी तथा ईश्वरवादी भारतीय दर्शनों का संग्रह किया है वहाँ उन्होंने चार्वाक, जैन तथा बौद्ध दर्शनों का भी अपने ग्रन्थ में संग्रह किया है । यह बात दूसरी है कि स्वयं माधवाचार्य एक वैदिक दार्शनिक थे, अतः उन्होंने उक्त नास्तिक दर्शनों को सर्वप्रथम (पूर्वपक्ष के रूप में ) ही रखा । फिर भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि भारतीय दार्शनिकों की विचार-दृष्टि व्यापक तथा उदार रही है । इसी व्यापक दृष्टि के कारण, प्रत्येक भारतीय दर्शन की शाखा अपने आप में सम्पन्न है । निदर्शन के रूप में, हम इस न्यायदर्शन को ही लें—इस न्यायदर्शन में चार्वाक, जैन, बौद्ध, सांख्य, मीमांसा, वैशेषिक, तथा वेदान्त आदि सभी अन्य दर्शनों पर यथास्थान विचार किया गया है । यों, भारतीय दर्शनों में प्रत्येक दर्शन ज्ञान का एक स्वतन्त्र कोष है । हम यह प्रतिज्ञापूर्वक कहते हैं कि जिस विद्वान् को भारतीय दर्शनों का सम्यक्तया ज्ञान है, वह पाश्चात्त्य दर्शनों की जटिल प्रणाली का भी सुगमतया अवगमन कर सकता है । दर्शनों का विभाग भारतीय दर्शनों का विभाजन करने से पूर्व हम यह मान लेते हैं कि सभी दर्शन 'वेद' तथा 'ईश्वर' को वृत्त मानकर चले हैं । इसी वृत्त के सहारे वे आस्तिक या नास्तिक तथा वैदिक या अवैदिक यों दो स्थूल भागों में विभक्त हो गये । वेद को न माननेवाले दर्शन तीन हैं—१. चार्वाक, २. जैन, तथा ३. बौद्ध । इन तीनों को वेद का प्रामाण्य न CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri