अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकहना उचित था उनका उस समय विचार करके; पर जब समय बदल गया, विचार का रूप बदला व्यावहारिक, स्वरूप व्यावहारिक भी उनका बदला होगा इसलिए जो परम्परागत या पुराने संत हो गये, समाजशास्त्र को या मानव जीवन दोनों को जो दृष्टि प्रदान करने वाले ऋषि-मुनि हुए अथवा समाज को जो दिशा-निर्देश देने वाले सिद्ध संत, धर्मधुरंधर-मनीषी मनीषी उनके द्वारा दिए, समय-समय-विशेष विशेष प्रसंग विशेष संदर्भ को व्यक्ति क्या तो रूढ़ि बनाकर या उसको सनातन सिद्धांत मानकर बैठ गया; परिणामतः जाति-वर्ण आश्रमव्यवस्थाएं बनीं, समय का रूप बदला पर जब काल की गति बदली व्यावहारिक स्वरूप को न तो समझ पाये उस पर आधारित जो जो भी समाजव्यवस्थाएं बनीं परिणामतः संकीर्ण बनती चली गईं उनका विलोपन हो! फिर जो नवीन दृष्टा समाजव्यवस्थाओं को रूप देने का प्रयास बना रहा, उसने फिर मानव जीवन अथवा समाजशास्त्र को किसी नये दृष्टिकोण अथवा दिशा अथवा आयाम को जो भी रूढ़ या जड़ या हठ बनाया था, उसका स्वरूप संकीर्ण बनता चला गया निष्कर्षतः यह कि चाहे समाज शास्त्र मनुष्य जीवन अथवा विश्व का जो भी व्यावहारिक रूप का स्वरूप रहा; पर जब तक, व्यक्तिनिष्ठा-जातिनिष्ठाओं को लेकर बना रहेगा तब तक समाजव्यवस्थाएं भले ही बनती रहें, व्यक्ति का व्यक्तित्व या मानव समाज उस रूप और सीमा तक ही अपने समाजव्यवस्था अथवा अपने को देखता या समझ सकता है। अतः यदि समाजव्यवस्था को सुंदर रूप देना है। समाज का यदि सुंदर स्वरूप, कल्याणकारी स्वरूप लाना हो अथवा लाना चाहे समाज! मात्र व्यक्ति-निष्ठा या जातिनिष्ठता अथवा संप्रदायनिष्ठता आधारित रूप, रूढ़ि-वादी स्वरूप समाप्त हो सके, उसके स्थान पर एक मानवीय गरिमा, विश्व कल्याणार्थ मानवीय दृष्टिकोण जब समाजशास्त्री अथवा जो व्यवस्था दे रहा, व्यवस्था समाज को प्रदान करने का प्रयास करने वाले मनुष्य जन जब तक नहीं सोचेंगे समाजव्यवस्था का आधार यह हो, मानव मात्र को एक रूप में देख कर उसके लिए समाजव्यवस्था समाज- शास्त्र निर्माण कर ही न सकेगा वह समाज का उत्थानकारी रूप, समाज का--विश्व-समाज निर्माण का रूप न होकर संकुचित रूप ही समाजव्यवस्था का स्वरूप बना रहेगा; पर इसके पर मानव समाज को मानव जीवन अथवा मानव मन को जब तक इन सब संकीर्णताओं ऊपर उठ कर समष्टि-चेतना स्वरूप में मनुष्य मात्र दृष्टि नहीं देता-देखता, विश्वरूप, रूप, रूप, विराट्, विराट्, विराट्--इन स्वरूपों द्वारा वह, पर से परे तत्व अथवा चेतना रूप समष्टि का रूप न समझे; परिणामतः, जब तक वह न समझेगा तब-तक! वह केवल रूप ही प्रत्यक्ष होकर संकीर्ण बनता चला जायगा अतः, समाज और उसका, उस समाज का जो व्यावहारिक दृष्टिकोण बन सकता उस रूप तक वह नहीं पहुँचेगा, जब तक वह उस परम स्वरूप को, जो सत्य रूपी तत्व समाज का समाजशास्त्रादि या अन्य शास्त्र जिनका भी रूप समझा जाता, व्यावहारिक रूप अथवा जो समाजशास्त्रा मानव मन द्वारा निर्मित समाजव्यवस्था के व्यवस्थापक या ऋषि जन या व्यवस्थापकगण जो सोच कर गए थे। उनका तात्पर्य, उस समय व्यावहारिक स्वरूप का था रूप में सनातन रूप से जो नियम प्रतिपादित, उस समय व्यवस्था के लिए बनाए गए थे , इसलिए उनको सनातन मान कर के ही जो समाज शास्त्री उस पर आधारित व्यवस्था बना रहे हैं वह समय बीत जाने पर संकीर्ण बनती जाती है; परिणाम तो यही होगा समाज अथवा मानव जीवन संकीर्ण बनता जाएगा या समय पर वह रूप इस सीमा पर पहुंच कर समाप्त होगा ही? इसके लिए उपाय क्या हो यह सोचें एक विचार रूप तो यह बना कि समाजशास्त्र का सिद्धांत ही बदल दिया जाए; परिणामतः जो रूप सनातन या मानव जीवन मूल्यों का या सनातन रूप का था उस तत्व न मान कर केवल व्यवस्था को रूप देते चले गए जिसके परिणाम स्वरूप भी नए रूप नए समाजशास्त्री बदलते गये हां, इतना तो हुआ समय समय पर जो अवतारी पुरुष या महापुरुष न हुए, उन महापुरुषों द्वारा अपने समय में मानव जीवन और समाज को दिशा प्रदान करने का प्रयास अवश्य ही उस समय जिस रूप स्वरूप विशेष काल विशेष में उस चेतना का विस्तार रूप चाहा, उतना रूप निखरा जब उस रूप को लेकर जो जो भी व्यवस्थाएं बनीं या व्यवस्थाएं जन रूप समाज द्वारा या तो समाजशास्त्र रूप दिया गया, परिणामतः उस समय कुछ न कुछ समाज का व्यक्तित्व निखरा और आगे दिशा मिली रूप तो परिवर्तनशील रहा और रहेगा भी, समाज या देश जब तक रहेगा संशय बना ही रहेगा सिद्धांत या जो रूप सोचा गया? समाज का स्वरूप कौन संभाले कि जिससे वह सनातन दृष्टि को लिए रहे, समाज व्यवस्था समाज का स्वरूप जन का रूप भी निखरता रहे? उपाय यही हो सकता कि जो भी समाज, या जो व्यक्ति न हो समाज को दिशा प्रदान करे तो वह ज्ञान का प्रकाश दे। 101