अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
पृष्ठ 100, कुल 183 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजा को सम्बोधन कर जन कहने लगे- हे नृप, हमारे महाराज विदेहराज जनक जब तक, अपने पास रहे; कभी हम लोगों न को, दुख स्पर्शमात्र न हो, वरन् आनन्द व सब प्रकार सुख सौभाग्य को प्राप्त कराया करते वा महाराजा को सुधारे गये, कभी किसी प्रकार कष्ट--दुख नहीं था; जबतक जनक जी महाराज राज्य वर्तमान उपस्थित वा जब तक वे रहे तबतक प्रजामात्र सब ही आनन्द मंगल भोगवती वा सब जन घर घर में सुख चैन से रह रहे वा महाराजा के गुण गान कर रहे वा सुख समय भोग समय व्यतीत कर सब प्रकार सुख रहे॥ पश्चात्काल प्रजा कहने लगी वा कहने में ऐसा भाव प्रकट वा प्रकाशमान हो रहा था कि? क्या पिता जनक हमारे न रहे वा हम अनाथरहित हो गये अथवा न, फिर मिले क्या? जब तक पिता रहे, तब तक सर्व सुख, वा पश्चात्काल सब समय प्रजा सन्तापरहित रूप हो सब जन एक मण्डल रूप हो विलाप कर रोने लगे वा कहने, हेपिता हमारे जनक कहां विराजित रहे वा अब कहां गये, कृपाकर सो कहो वा बताइये; हम लोगों को दर्शन दो; हम सब जन दीन, हीन दुखी हो रहे हैं जन जन का रूप वा दशा को देख दया करो सो जन कह रहे हैं, सो क्या दशा वा भाव कहा जाय? प्रजा के लोग वा स्त्रियां वा बाला मात्र कह रही हैं! हमारे जनक जी, महाराज जनक जी; प्रजापालक पिता जी, प्रजापालक जी सुनो जन की वा विलाप-विलाप कर-कर रोते वा पुकार रो-रोकर वा नेत्रों द्वारा अश्रुपात सब प्रजा विलाप कर रही, पुकार रही! देख सो दृश्य जन कांप उठे वा डर गये सब, प्रजाजन ऐसा कर दशा विलाप कर रो रहे थे, उस समय जनक जी का भी हृदय भर आया वा भर आने पर स्वयं भी द्रवित हो रहे थे, सो सब दृश्य विह्वल हुआ, सो उस समय जन सब रो रहे थे, सो दशा जन की जनक देख--सब को देखकर कहने लगे, प्रजा सुनो! सो समय जन सम्बोधन कर जनक जी कह रहे प्रजा सुनो सब धैर्य रखो सब स्वरूप नाश न हो; महाराज जी, सबको सो स्वरूप विदेह-भाव की ओर लक्ष्य कराके वा उपदेश कर समझा रहे थे वा कह रहे थे जन हमारा वा सब न कोई काल तक रहे हैं सब का काल आता वा सब लय अवस्था को प्राप्त हो विदेह स्वरूप रूप में मिल-जुल कर अन्तर्ध्यान हो जा रहे, सब का काल आ रहा सो प्रजाजन भी अपने-अपने रूप व निज स्वरूप में लय हो जा रहे हैं॥ जनक सब प्रजा सन्मुख बैठ कर सब को उपदेश देकर समझा रहे थे सब प्रजाजन रो रहे थे वा सब जन विलाप कर रहे थे जनक जी सब जन को देख वा समझा रहे थे जन-पुकार कर अपना दुख कह रहे, उस समय को देखकर के; सो दृश्य को देखकर के, सब जन रो रहे थे जनक महाराज उपदेश कह रहे थे॥ उस समय के दृश्य को जन सब देख रहे थे जनक विदेह स्वयं काल रूप में लय स्वरूप धारण कर रहे थे, जनक सब को उपदेश दे रहे थे, सो जनक उपदेश का भाव इस प्रकार जन से कह रहे--हे प्रजा सब सुनो, अपने को स्वरूप मान कर मन को सब त्याग करो, सब त्याग कर मात्र का एक निज स्वरूप जानो, स्वरूप ही तो नाम, नाम रूप-रंग रहित सो उस लय स्वरूप को जन सब प्राप्त हो सुख पावे वा विदेह हो? जनक जी के वचन सुने थे? जनक उपदेश प्रजाजन को, कह प्रजाजन सब सुनकर शांत हुए; जनक विदेह रूप धारण कर रहे थे वा सब जन देख रहे वा शांत हो कर बैठ गये; सब प्रजा रो रो कर कह रही, महाराज जी धन्य पिता जी सब जन को सत्य मार्ग दिया; आपका उपदेश सदा ही सब काल में सब जन याद रखे हैं! सो ज्ञान-सार प्रजा सब पा कर धन्य हुई, जनक सब प्रजा को सो रूप में रूप हो कर शांत कर रहे थे, तब जन... विदेह- रूप देख रहे हैं! जनक जी महाराज के पास सब लोग हाथ जोड़ कर बैठ रहे; जनक जी का वचन अमृत तुल्य रहा, जन व प्रजा--का सो ज्ञान-मार्ग खुल कर प्रकाश रूप हो गया; जनक जी सब प्रजा जन को सत्य का मार्ग दिखाया गया, सो जन विदेह स्वरूप सुनकर के जनक को नमन कर रहे 100