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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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विचारो, जिसका आत्माराम अनादिसे कर्मयोग से बन्धन को प्राप्त था उसे ज्ञान से मुक्त किया गया ऐसा विचार करके उस आत्मा का स्मरण करना चाहिये जिससे उसका यह भाव नष्ट हो जाता कि यह जीवात्मा कर्मों द्वारा आच्छादित हुआ ही रहता है, सो सब मिथ्या, इस निमित्त जिस रूप से यह अपने स्वरूप द्वारा ज्ञात? केवल एक ज्ञाता ही प्रतिभासित हुआ रूपसे रूप रहा, इस प्रकार उस सब स्वरूप शुद्धता द्वारा प्राप्त हुआ जो सर्वथा शुद्ध सो परमात्मा आत्मा का ही रूप है सो वह परमात्मा इस जीव को शरण हो ऐसा ध्यान करो, जिससे यह ज्ञान प्राप्त होवे, जिससे यह सब कर्म जाल नष्ट होकर मोक्ष सुख को प्राप्त होवे; जिस आत्मा के सब कर्म क्षय हुए वही तो सिद्ध, अरू जिस के सब पदार्थ ज्ञान द्वारा जाने सो सर्वज्ञ और जिसने सब कर्मों को नाश कर अ--क्षय सुख अ--न्त प्राप्त हो गया सो मोक्ष प्राप्त कहावे; जिस प्रकार आत्माराम अपने ही सुख में मग्न; जिस प्रकार ज्ञानीजन भय से रहित हुए आत्मरूप में मग्न, राग- द्वेषादि से शून्य व सब प्रकार कल्याण रूप केवल, ऐसा ध्यान कर जो कि इस तरह अपनी आत्मा का रूप ही समझ कर शरण ग्रहण करता है सो भव्य, जो कि सन्मार्ग को ही राह पर पग धरेगा

जिस प्रकार केवली का रूप कहा सो केवल ज्ञानीजन के स्वरूपको समझकर उस प्रकार रूप को प्राप्त हो मुक्ति मार्ग द्वारा सिद्धपद पावेगा? तो केवल ज्ञानी सब सिद्धपद के धारक ही तो हैं ऐसा जानकर निश्चय करके ही जान, ज्ञानवान ही निश्चय को ही धारण किया करता, जिसे कि केवल ज्ञानस्वरूप ही सब ही कहा

इस ही तरह कर्मों द्वारा सब रूप जीव अशुद्ध रूप देखा सो सब अज्ञानजन ऐसा कह कर सब कर्मों द्वारा ही तो १ प्रकार स्वरूप समझा, अज्ञानजन अज्ञानी, जिन्हें अज्ञान स्वरूप कर्मयोगवश है, जिसे कि केवल ज्ञानी कर्म द्वारा बंधा रूप जान के स्वरूप को ही इस तरह अशुद्ध मान के ज्ञान कर्म दोनों को एक स्वरूप ही कह दिया सो १ प्रकार ही का अज्ञान को प्राप्त हुआ

इस ही पर इस तरह कर्म द्वारा सब अशुद्ध रूप जीव अज्ञान को प्राप्त हुआ, अज्ञानजन ही कर्मयोग से बंधा है, सो ही १ तरह कथन किया सो कर्म ही रूप स्वरूप को कह दिया जिससे जीव के स्वरूप को केवल ही कहा गया, केवल रूप ही आत्मा स्वरूप सब कहा गया सो इस जीव के स्वरूप को केवल रूप समझ ही कहा जो कर्म के फल को रूप आत्मा रूप ही कहा गया सो केवल रूप अशुद्ध ही रूप में ज्ञानियों द्वारा ही कहा गया सो ही अशुद्ध कर्म का स्वरूप रूप हुआ, सो शुद्ध ही हुआ अज्ञानवश, अज्ञानजन तो इस ही प्रकार सब कर्म अशुद्ध ज्ञान द्वारा कह दिया सो ही तो इस तरह से ही कहा, सो अज्ञानवश ही तो अज्ञान रूप एक-एक रूप जीव के स्वरूप कथन किया गया

क्रोध, मान, छलछिद्र, मायाचार--इन द्वारा जिस तरह जीव अशुद्ध कर्म को फल रूप ही तो ही ही प्राप्त होता रहा, जिस तरह जीव को ज्ञान द्वारा अशुद्ध समझा? जिसका रूप, अज्ञानवश होने से स्वरूप कभी भी समझा? ज्ञान द्वारा तो केवल रूप प्रत्यक्ष एक प्रकार १ ही स्वरूप शुद्धरूप देखा सो, १ प्रकार प्रत्यक्ष ज्ञान द्वारा रूप प्रत्यक्ष देखा सो केवल सो, जो जीव ऐसा ध्यान धर ज्ञान को पावे?

केवल ज्ञानस्वरूपवान् निज स्वरूप आत्मस्वरूप सब तरह से ज्ञानी समझता ही जाता सब रूप ही तो, कर्म फल द्वारा ही सब प्रकार आत्मस्वरूप जाना ही सब तरह ज्ञान ही तो प्राप्त हुआ समझा, अज्ञानजन अज्ञान द्वारा ज्ञान स्वरूप सब कर्म कहा, सो कर्म का रूप, सो ही रूप ही सब तरह से ही रूप ही ज्ञान रहा!

कर्म का संबंध आत्मा के साथ ही संबंध रहता सो सब अज्ञान द्वारा सब अज्ञान ही कहा सो अज्ञान; कर्म ही संबंध से, सब रूप अज्ञान ही रहा स्वरूप ज्ञान सब कर्म फल के साथ अज्ञान से, कर्म ही रूप अज्ञान, सो ही रूप अज्ञान स्वभाव अज्ञान भाव द्वारा कहा ही, ज्ञानवान इस संबंध द्वारा सब ही त्याग रूप, १ सब त्यागवान् हो, १ सब त्यागी हो, १ सब आत्मज्ञान हो; ज्ञानवान जीव तो व्यवहार के अधीन निश्चयनयरूप रूप सब ज्ञानवान का स्वरूप ही सब प्रकार भिन्न भाव से ही स्वरूप सब आत्मा का, जिस ही का स्वरूप ही आत्मा से भिन्न भिन्न रूप आत्माराम का निश्चयनय से सब कर्म क्षय 99