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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

विचारो, जिसका आत्माराम अनादिसे कर्मयोग से बन्धन को प्राप्त था उसे ज्ञान से मुक्त किया गया ऐसा विचार करके उस आत्मा का स्मरण करना चाहिये जिससे उसका यह भाव नष्ट हो जाता कि यह जीवात्मा कर्मों द्वारा आच्छादित हुआ ही रहता है, सो सब मिथ्या, इस निमित्त जिस रूप से यह अपने स्वरूप द्वारा ज्ञात? केवल एक ज्ञाता ही प्रतिभासित हुआ रूपसे रूप रहा, इस प्रकार उस सब स्वरूप शुद्धता द्वारा प्राप्त हुआ जो सर्वथा शुद्ध सो परमात्मा आत्मा का ही रूप है सो वह परमात्मा इस जीव को शरण हो ऐसा ध्यान करो, जिससे यह ज्ञान प्राप्त होवे, जिससे यह सब कर्म जाल नष्ट होकर मोक्ष सुख को प्राप्त होवे; जिस आत्मा के सब कर्म क्षय हुए वही तो सिद्ध, अरू जिस के सब पदार्थ ज्ञान द्वारा जाने सो सर्वज्ञ और जिसने सब कर्मों को नाश कर अ--क्षय सुख अ--न्त प्राप्त हो गया सो मोक्ष प्राप्त कहावे; जिस प्रकार आत्माराम अपने ही सुख में मग्न; जिस प्रकार ज्ञानीजन भय से रहित हुए आत्मरूप में मग्न, राग- द्वेषादि से शून्य व सब प्रकार कल्याण रूप केवल, ऐसा ध्यान कर जो कि इस तरह अपनी आत्मा का रूप ही समझ कर शरण ग्रहण करता है सो भव्य, जो कि सन्मार्ग को ही राह पर पग धरेगा

जिस प्रकार केवली का रूप कहा सो केवल ज्ञानीजन के स्वरूपको समझकर उस प्रकार रूप को प्राप्त हो मुक्ति मार्ग द्वारा सिद्धपद पावेगा? तो केवल ज्ञानी सब सिद्धपद के धारक ही तो हैं ऐसा जानकर निश्चय करके ही जान, ज्ञानवान ही निश्चय को ही धारण किया करता, जिसे कि केवल ज्ञानस्वरूप ही सब ही कहा

इस ही तरह कर्मों द्वारा सब रूप जीव अशुद्ध रूप देखा सो सब अज्ञानजन ऐसा कह कर सब कर्मों द्वारा ही तो १ प्रकार स्वरूप समझा, अज्ञानजन अज्ञानी, जिन्हें अज्ञान स्वरूप कर्मयोगवश है, जिसे कि केवल ज्ञानी कर्म द्वारा बंधा रूप जान के स्वरूप को ही इस तरह अशुद्ध मान के ज्ञान कर्म दोनों को एक स्वरूप ही कह दिया सो १ प्रकार ही का अज्ञान को प्राप्त हुआ

इस ही पर इस तरह कर्म द्वारा सब अशुद्ध रूप जीव अज्ञान को प्राप्त हुआ, अज्ञानजन ही कर्मयोग से बंधा है, सो ही १ तरह कथन किया सो कर्म ही रूप स्वरूप को कह दिया जिससे जीव के स्वरूप को केवल ही कहा गया, केवल रूप ही आत्मा स्वरूप सब कहा गया सो इस जीव के स्वरूप को केवल रूप समझ ही कहा जो कर्म के फल को रूप आत्मा रूप ही कहा गया सो केवल रूप अशुद्ध ही रूप में ज्ञानियों द्वारा ही कहा गया सो ही अशुद्ध कर्म का स्वरूप रूप हुआ, सो शुद्ध ही हुआ अज्ञानवश, अज्ञानजन तो इस ही प्रकार सब कर्म अशुद्ध ज्ञान द्वारा कह दिया सो ही तो इस तरह से ही कहा, सो अज्ञानवश ही तो अज्ञान रूप एक-एक रूप जीव के स्वरूप कथन किया गया

क्रोध, मान, छलछिद्र, मायाचार--इन द्वारा जिस तरह जीव अशुद्ध कर्म को फल रूप ही तो ही ही प्राप्त होता रहा, जिस तरह जीव को ज्ञान द्वारा अशुद्ध समझा? जिसका रूप, अज्ञानवश होने से स्वरूप कभी भी समझा? ज्ञान द्वारा तो केवल रूप प्रत्यक्ष एक प्रकार १ ही स्वरूप शुद्धरूप देखा सो, १ प्रकार प्रत्यक्ष ज्ञान द्वारा रूप प्रत्यक्ष देखा सो केवल सो, जो जीव ऐसा ध्यान धर ज्ञान को पावे?

केवल ज्ञानस्वरूपवान् निज स्वरूप आत्मस्वरूप सब तरह से ज्ञानी समझता ही जाता सब रूप ही तो, कर्म फल द्वारा ही सब प्रकार आत्मस्वरूप जाना ही सब तरह ज्ञान ही तो प्राप्त हुआ समझा, अज्ञानजन अज्ञान द्वारा ज्ञान स्वरूप सब कर्म कहा, सो कर्म का रूप, सो ही रूप ही सब तरह से ही रूप ही ज्ञान रहा!

कर्म का संबंध आत्मा के साथ ही संबंध रहता सो सब अज्ञान द्वारा सब अज्ञान ही कहा सो अज्ञान; कर्म ही संबंध से, सब रूप अज्ञान ही रहा स्वरूप ज्ञान सब कर्म फल के साथ अज्ञान से, कर्म ही रूप अज्ञान, सो ही रूप अज्ञान स्वभाव अज्ञान भाव द्वारा कहा ही, ज्ञानवान इस संबंध द्वारा सब ही त्याग रूप, १ सब त्यागवान् हो, १ सब त्यागी हो, १ सब आत्मज्ञान हो; ज्ञानवान जीव तो व्यवहार के अधीन निश्चयनयरूप रूप सब ज्ञानवान का स्वरूप ही सब प्रकार भिन्न भाव से ही स्वरूप सब आत्मा का, जिस ही का स्वरूप ही आत्मा से भिन्न भिन्न रूप आत्माराम का निश्चयनय से सब कर्म क्षय 99

राजा को सम्बोधन कर जन कहने लगे- हे नृप, हमारे महाराज विदेहराज जनक जब तक, अपने पास रहे; कभी हम लोगों न को, दुख स्पर्शमात्र न हो, वरन् आनन्द व सब प्रकार सुख सौभाग्य को प्राप्त कराया करते वा महाराजा को सुधारे गये, कभी किसी प्रकार कष्ट--दुख नहीं था; जबतक जनक जी महाराज राज्य वर्तमान उपस्थित वा जब तक वे रहे तबतक प्रजामात्र सब ही आनन्द मंगल भोगवती वा सब जन घर घर में सुख चैन से रह रहे वा महाराजा के गुण गान कर रहे वा सुख समय भोग समय व्यतीत कर सब प्रकार सुख रहे॥ पश्चात्काल प्रजा कहने लगी वा कहने में ऐसा भाव प्रकट वा प्रकाशमान हो रहा था कि? क्या पिता जनक हमारे न रहे वा हम अनाथरहित हो गये अथवा न, फिर मिले क्या? जब तक पिता रहे, तब तक सर्व सुख, वा पश्चात्काल सब समय प्रजा सन्तापरहित रूप हो सब जन एक मण्डल रूप हो विलाप कर रोने लगे वा कहने, हेपिता हमारे जनक कहां विराजित रहे वा अब कहां गये, कृपाकर सो कहो वा बताइये; हम लोगों को दर्शन दो; हम सब जन दीन, हीन दुखी हो रहे हैं जन जन का रूप वा दशा को देख दया करो सो जन कह रहे हैं, सो क्या दशा वा भाव कहा जाय? प्रजा के लोग वा स्त्रियां वा बाला मात्र कह रही हैं! हमारे जनक जी, महाराज जनक जी; प्रजापालक पिता जी, प्रजापालक जी सुनो जन की वा विलाप-विलाप कर-कर रोते वा पुकार रो-रोकर वा नेत्रों द्वारा अश्रुपात सब प्रजा विलाप कर रही, पुकार रही! देख सो दृश्य जन कांप उठे वा डर गये सब, प्रजाजन ऐसा कर दशा विलाप कर रो रहे थे, उस समय जनक जी का भी हृदय भर आया वा भर आने पर स्वयं भी द्रवित हो रहे थे, सो सब दृश्य विह्वल हुआ, सो उस समय जन सब रो रहे थे, सो दशा जन की जनक देख--सब को देखकर कहने लगे, प्रजा सुनो! सो समय जन सम्बोधन कर जनक जी कह रहे प्रजा सुनो सब धैर्य रखो सब स्वरूप नाश न हो; महाराज जी, सबको सो स्वरूप विदेह-भाव की ओर लक्ष्य कराके वा उपदेश कर समझा रहे थे वा कह रहे थे जन हमारा वा सब न कोई काल तक रहे हैं सब का काल आता वा सब लय अवस्था को प्राप्त हो विदेह स्वरूप रूप में मिल-जुल कर अन्तर्ध्यान हो जा रहे, सब का काल आ रहा सो प्रजाजन भी अपने-अपने रूप व निज स्वरूप में लय हो जा रहे हैं॥ जनक सब प्रजा सन्मुख बैठ कर सब को उपदेश देकर समझा रहे थे सब प्रजाजन रो रहे थे वा सब जन विलाप कर रहे थे जनक जी सब जन को देख वा समझा रहे थे जन-पुकार कर अपना दुख कह रहे, उस समय को देखकर के; सो दृश्य को देखकर के, सब जन रो रहे थे जनक महाराज उपदेश कह रहे थे॥ उस समय के दृश्य को जन सब देख रहे थे जनक विदेह स्वयं काल रूप में लय स्वरूप धारण कर रहे थे, जनक सब को उपदेश दे रहे थे, सो जनक उपदेश का भाव इस प्रकार जन से कह रहे--हे प्रजा सब सुनो, अपने को स्वरूप मान कर मन को सब त्याग करो, सब त्याग कर मात्र का एक निज स्वरूप जानो, स्वरूप ही तो नाम, नाम रूप-रंग रहित सो उस लय स्वरूप को जन सब प्राप्त हो सुख पावे वा विदेह हो? जनक जी के वचन सुने थे? जनक उपदेश प्रजाजन को, कह प्रजाजन सब सुनकर शांत हुए; जनक विदेह रूप धारण कर रहे थे वा सब जन देख रहे वा शांत हो कर बैठ गये; सब प्रजा रो रो कर कह रही, महाराज जी धन्य पिता जी सब जन को सत्य मार्ग दिया; आपका उपदेश सदा ही सब काल में सब जन याद रखे हैं! सो ज्ञान-सार प्रजा सब पा कर धन्य हुई, जनक सब प्रजा को सो रूप में रूप हो कर शांत कर रहे थे, तब जन... विदेह- रूप देख रहे हैं! जनक जी महाराज के पास सब लोग हाथ जोड़ कर बैठ रहे; जनक जी का वचन अमृत तुल्य रहा, जन व प्रजा--का सो ज्ञान-मार्ग खुल कर प्रकाश रूप हो गया; जनक जी सब प्रजा जन को सत्य का मार्ग दिखाया गया, सो जन विदेह स्वरूप सुनकर के जनक को नमन कर रहे 100

कहना उचित था उनका उस समय विचार करके; पर जब समय बदल गया, विचार का रूप बदला व्यावहारिक, स्वरूप व्यावहारिक भी उनका बदला होगा इसलिए जो परम्परागत या पुराने संत हो गये, समाजशास्त्र को या मानव जीवन दोनों को जो दृष्टि प्रदान करने वाले ऋषि-मुनि हुए अथवा समाज को जो दिशा-निर्देश देने वाले सिद्ध संत, धर्मधुरंधर-मनीषी मनीषी उनके द्वारा दिए, समय-समय-विशेष विशेष प्रसंग विशेष संदर्भ को व्यक्ति क्या तो रूढ़ि बनाकर या उसको सनातन सिद्धांत मानकर बैठ गया; परिणामतः जाति-वर्ण आश्रमव्यवस्थाएं बनीं, समय का रूप बदला पर जब काल की गति बदली व्यावहारिक स्वरूप को न तो समझ पाये उस पर आधारित जो जो भी समाजव्यवस्थाएं बनीं परिणामतः संकीर्ण बनती चली गईं उनका विलोपन हो! फिर जो नवीन दृष्टा समाजव्यवस्थाओं को रूप देने का प्रयास बना रहा, उसने फिर मानव जीवन अथवा समाजशास्त्र को किसी नये दृष्टिकोण अथवा दिशा अथवा आयाम को जो भी रूढ़ या जड़ या हठ बनाया था, उसका स्वरूप संकीर्ण बनता चला गया निष्कर्षतः यह कि चाहे समाज शास्त्र मनुष्य जीवन अथवा विश्व का जो भी व्यावहारिक रूप का स्वरूप रहा; पर जब तक, व्यक्तिनिष्ठा-जातिनिष्ठाओं को लेकर बना रहेगा तब तक समाजव्यवस्थाएं भले ही बनती रहें, व्यक्ति का व्यक्तित्व या मानव समाज उस रूप और सीमा तक ही अपने समाजव्यवस्था अथवा अपने को देखता या समझ सकता है। अतः यदि समाजव्यवस्था को सुंदर रूप देना है। समाज का यदि सुंदर स्वरूप, कल्याणकारी स्वरूप लाना हो अथवा लाना चाहे समाज! मात्र व्यक्ति-निष्ठा या जातिनिष्ठता अथवा संप्रदायनिष्ठता आधारित रूप, रूढ़ि-वादी स्वरूप समाप्त हो सके, उसके स्थान पर एक मानवीय गरिमा, विश्व कल्याणार्थ मानवीय दृष्टिकोण जब समाजशास्त्री अथवा जो व्यवस्था दे रहा, व्यवस्था समाज को प्रदान करने का प्रयास करने वाले मनुष्य जन जब तक नहीं सोचेंगे समाजव्यवस्था का आधार यह हो, मानव मात्र को एक रूप में देख कर उसके लिए समाजव्यवस्था समाज- शास्त्र निर्माण कर ही न सकेगा वह समाज का उत्थानकारी रूप, समाज का--विश्व-समाज निर्माण का रूप न होकर संकुचित रूप ही समाजव्यवस्था का स्वरूप बना रहेगा; पर इसके पर मानव समाज को मानव जीवन अथवा मानव मन को जब तक इन सब संकीर्णताओं ऊपर उठ कर समष्टि-चेतना स्वरूप में मनुष्य मात्र दृष्टि नहीं देता-देखता, विश्वरूप, रूप, रूप, विराट्, विराट्, विराट्--इन स्वरूपों द्वारा वह, पर से परे तत्व अथवा चेतना रूप समष्टि का रूप न समझे; परिणामतः, जब तक वह न समझेगा तब-तक! वह केवल रूप ही प्रत्यक्ष होकर संकीर्ण बनता चला जायगा अतः, समाज और उसका, उस समाज का जो व्यावहारिक दृष्टिकोण बन सकता उस रूप तक वह नहीं पहुँचेगा, जब तक वह उस परम स्वरूप को, जो सत्य रूपी तत्व समाज का समाजशास्त्रादि या अन्य शास्त्र जिनका भी रूप समझा जाता, व्यावहारिक रूप अथवा जो समाजशास्त्रा मानव मन द्वारा निर्मित समाजव्यवस्था के व्यवस्थापक या ऋषि जन या व्यवस्थापकगण जो सोच कर गए थे। उनका तात्पर्य, उस समय व्यावहारिक स्वरूप का था रूप में सनातन रूप से जो नियम प्रतिपादित, उस समय व्यवस्था के लिए बनाए गए थे , इसलिए उनको सनातन मान कर के ही जो समाज शास्त्री उस पर आधारित व्यवस्था बना रहे हैं वह समय बीत जाने पर संकीर्ण बनती जाती है; परिणाम तो यही होगा समाज अथवा मानव जीवन संकीर्ण बनता जाएगा या समय पर वह रूप इस सीमा पर पहुंच कर समाप्त होगा ही? इसके लिए उपाय क्या हो यह सोचें एक विचार रूप तो यह बना कि समाजशास्त्र का सिद्धांत ही बदल दिया जाए; परिणामतः जो रूप सनातन या मानव जीवन मूल्यों का या सनातन रूप का था उस तत्व न मान कर केवल व्यवस्था को रूप देते चले गए जिसके परिणाम स्वरूप भी नए रूप नए समाजशास्त्री बदलते गये हां, इतना तो हुआ समय समय पर जो अवतारी पुरुष या महापुरुष न हुए, उन महापुरुषों द्वारा अपने समय में मानव जीवन और समाज को दिशा प्रदान करने का प्रयास अवश्य ही उस समय जिस रूप स्वरूप विशेष काल विशेष में उस चेतना का विस्तार रूप चाहा, उतना रूप निखरा जब उस रूप को लेकर जो जो भी व्यवस्थाएं बनीं या व्यवस्थाएं जन रूप समाज द्वारा या तो समाजशास्त्र रूप दिया गया, परिणामतः उस समय कुछ न कुछ समाज का व्यक्तित्व निखरा और आगे दिशा मिली रूप तो परिवर्तनशील रहा और रहेगा भी, समाज या देश जब तक रहेगा संशय बना ही रहेगा सिद्धांत या जो रूप सोचा गया? समाज का स्वरूप कौन संभाले कि जिससे वह सनातन दृष्टि को लिए रहे, समाज व्यवस्था समाज का स्वरूप जन का रूप भी निखरता रहे? उपाय यही हो सकता कि जो भी समाज, या जो व्यक्ति न हो समाज को दिशा प्रदान करे तो वह ज्ञान का प्रकाश दे। 101

जब यह सब कुछ परमात्मा का दिया हुआ विद्यमान रहता हुआ, इस मनुष्य शरीर रूप उत्तम रथ द्वारा जिस ईश्वर रूपी गन्तव्य स्थान पर पहुंचना था उस गन्तव्य स्थान परमात्मा रूपी घर को छोड़ कर उल्टे रास्ते पर चला कर जिस प्रकार रथ रूपी घोड़ों-- इन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों, मन, बुद्धि--का संचालन या निग्रह न हो, तो परिणाम यही होगा जैसा अन्धे चालक सारथी संचालन के रथ का या तो विध्वंस रूपी विनाश रूपी-दलदल में पड़ कर नष्ट हो जायेगा; परमात्मा साक्षात्कार रूप परम आनन्द रूपी; मोक्ष-धाम को छोड़कर यह जीव नरक भोगेगा इसलिये शास्त्र का कहना है जिस प्रकार मनुष्य को, उस परमात्मा का दिया हुआ सब कुछ रथ रूपी साधन का ठीक-ठीक सदुपयोग या उपयोग न करने से तथा उस रथ रूपी मन का भी निग्रह न हो सकने के कारण जो मनुष्य अपने उस चरम लक्ष्य परमात्मा-प्राप्ति? सर्वोत्तम स्थिति अर्थात् मोक्ष को न प्राप्त होकर, या उस रथ पर चढ़ कर अपने घर पहुंच कर सुख भोग न कर सके--तो परिणाम यही हो कि भवसागर रूपी संसारी दलदल में वह पड़ कर नष्ट हो जाय तो, वह परमात्मा का दिया हुआ यह मानवरूपी साधन, या जिस पर वह स्वयं बैठा परमात्मा के साक्षात्कार के निमित्त साधन बनकर आया था यह सब व्यर्थ हो जायगा या उस मन-रथ पर चढ़ कर संसार में, या उस रथ पर बैठकर केवल अधोगति कुयोनि ही; भुगतता हुआ वह कष्ट को ही भोगता हुआ भटकता रहेगा सो, सांसारिक विषयों का ही भोग करे, वासनाओं का ही शिकार रहे, जिससे मन का नाश न होकर, नये-नये जन्मों का कारण बन सके, कर्मसंस्कार एकत्र होते ही रहें जिससे उस जीवात्मा सारथी को आवागमन के बन्धनों में बंधना ही पड़े तो परिणाम यही, कि उस जीव रूपी सारथी को परमात्मा के निकट न पहुंचकर, न मोक्ष को ही; प्राप्त होकर संसार के इस गन्दे नाले रूपी दलदल या जन्म मरण रूपी भव-सागर में पुनः-पुनः कष्ट ही सहना जिस तरह सारथी बुद्धि का काम है; घोड़ों को ठीक तरह से सम्भाल कर रखना जिससे रथ अपनी राह पर ठीक-ठीक चले जिससे रथ में बैठा हुआ स्वामी अपने अभीष्ट स्थान तक पहुंच सके, उसी तरह से जीवात्मा सारथी का कर्त्तव्य होना चाहिये कि परमात्मा रूप स्वामी को, जो इस मानवरूपी रथ में बैठा हुआ है, परमात्मा तक पहुंच कर मुक्ति प्राप्त करे। यदि ऐसा न किया गया तो उसका यह शरीर रूप रथ सांसारिक दलदल में फंसकर नष्ट हो जायेगा। जिस प्रकार यदि मन पर नियन्त्रण न हो सका, तो परिणाम यही होगा जैसा किसी अन्धे सारथी के हाथ में घोड़े छोड़ दिये जायं, तो वह घोड़े जिधर मर्जी होगी उधर ही ले जाकर खाई में पटक देंगे! ठीक इसी तरह विवेकहीन मन मनुष्य को अपनी इच्छा के अनुसार ले जाता है, सब प्रकार की दुर्दशा करता हुआ नष्ट कर देता है, अतः इस पर पूर्ण संयम रखना ही श्रेयस्कर होगा इसके लिये यह उपाय बताया गया कि, बुद्धि रूपी सारथी को ठीक प्रकार शिक्षा दी जाये जिससे कि वह, सही काम करने में समर्थ हो सके । यदि बुद्धि रूपी सारथी, परमात्मा रूपी मालिक की आज्ञा में रहेगा और मन रूपी लगाम को खींच कर रखेगा, तथा इन्द्रियों को, सांसारिक सुख-भोगों की ओर जाने से रोकेगा तब ही यह आत्मा रूपी जीवात्मा इस भवसागर रूपी भवचक्र से छूट कर परमात्मा के उस आनन्द को पा सकेगा, अन्यथा यदि बुद्धि रूपी सारथी ठीक न होकर मन के आधीन हो गया, फिर तो मन रूपी लगाम ढीली होकर इन्द्रियां रूपी घोड़े रथ को उस दलदल में गिरा देंगे और आत्मा रूपी स्वामी का पतन होकर वह कभी परमात्मा को प्राप्त न कर सकेगा और न उस परम आनन्द को प्राप्त कर सकेगा। अतः, जीवात्मा रूपी स्वामी को, बुद्धि रूपी सारथी को ठीक मार्ग पर चलने के लिये प्रभु की शरण में जाने को कहना चाहिये; ताकि जीवात्मा रूपी जीव, इस भव सागर पार लग सके। क्या जीव को जन्म-मरण रूपी चक्कर से छूटना ही अभीष्ट नहीं है? क्या वह इन सब जन्म-जन्मान्तरों के कष्ट से छुटकारा नहीं पाना चाहता? अवश्य ही पाना चाहता है। यदि पाना चाहता है तो उसे अपने इस मानवरूपी रथ को, सही मार्ग पर चलाना होगा ताकि वह इस सांसारिक दलदल में न फंसे और अपने अभीष्ट परम धाम वैकुण्ठ को प्राप्त कर सके। ईश्वर की कृपा से सब काम सिद्ध हो सकते हैं यदि मनुष्य, न उस मार्ग को! त्याग ही करेगा 102

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विचारशीलताका, जिससे प्रत्येक मनुष्य यह अनुभव कर सकता तथा जान और समझ सकता कि मुझ जैसा सब कुछ ईश्वर प्रदत्त ईश्वर प्रदत्त शक्तिके दुरुपयोग द्वारा मनुष्य पर नियन्त्रण कर सकनेका भ्रम और दम्भ उसके जीवनका विकराल विषाक्तस्वरूप बनकर खड़ा हो जाता है। जिसका परिणाम होता है कि वह दम्भ ही व्यक्तिगत तथा सामाजिक सुख शान्ति तथा सन्तोष और प्रीति प्यार व रस को नष्टभ्रष्टकरके मानव जीवनका सारा स्वाद ही समाप्त कर देता है। इन्सानियत-शून्यता! हर क्षण भय व्याप्त रहेगा विनाशका! विनाशका भय उसका ही संहार कर देता है। इस पर भी मानव यदि उस ईश्वरीय रस और सत्यताको समझ न सके, अथवा उस समझका ही दुरुपयोग कर सन्मार्गके स्थानपर विपथगामी हो जाय तो भाई, जहां चिन्तन समाप्त हुआ, अथवा जो केवल स्वार्थमयी दृष्टिकोण बना कर विचारनेका प्रयत्न मात्र हुआ तथा जिसे मात्र यह स्मरण रहा कि संसार का सब कुछ मेरे भोगका साधन मात्र है और उसके लिए, केवल यह विचार स्वाभाविक और सत्यनिष्ठ मान लिया गया कि, प्रत्येक की चेष्टा सफलताका, पद, धन और वैभवका ही नाम मात्र रह गया। उस सफलता में सत्यता तथा शुद्धताके विचार कितने उपयोगी समझे गये अथवा न समझे जा सके। इस पर विचार करने की अपेक्षा, स्वार्थपरायणता इतनी भयानक हो जाय कि सारा जीवन मात्र स्वार्थका पोषक और विचारहीनताका ही रूप बन जाय तो फिर उस प्रभु प्रदत्त विचार-शक्ति का प्रयोजन ही क्या रह गया, जिसके अभाव मात्र मात्र से, नर का पशुके रूप में रूपान्तरित हो जाना संभव है? विचार शक्ति समाप्त होगी, विचारहीनता जन्म ले लेगी तथा उस विचार हीनता, वासना का ही रूप धारण कर सब कुछ अपने भोगका अंग मान बैठेगी और तब मनुष्य मनुष्यताके स्तरसे गिर कर पशुताके स्तर पर आ कर विचरण करेगा, वासनाओं तथा इच्छाओं का, केवल वह दास--गुलाम बनकर रह जाय इसका क्या उत्तर हो यह बात क्या है, या इसके का रूप क्या है? वासनाओं का दास बन कर, वासनाओं का रूप क्या होगा इसका जो रूप दिखाई देगा वासनाका वह स्वरूप और भयानक रूपान्तरित हो वासनाके ही रूप स्वरूप धारण करेगा। मानव तो केवल विचारहीनता का ही नाम वासनाका होगा या वासनाका ही, केवल वासनाओं का सम्मिश्रण रूप ही यह रूप धारण करेगा क्या, विचार ही वासनाका स्वरूप है, वासनाके वशीभूत होकर मनुष्य जो कुछ कर्म करता अथवा विचार कर बैठता अथवा उस के सब विचार विचारहीनता बनकर रह जायंगे? उस अवस्था को न तो कोई विचारशीलता कह सकेगा? न उस रूप को न मन, बुद्धि तथा न उस कर्म, वचन का रूप, जो वासनाके वशीभूत हो, उस वासनाका स्वरूप होगा? सारा स्वरूप ही वासना! वासनाका जो रूप ही उस रूपमें दिखाई देगा वह विचारहीनता वासनाका ही रूप बन कर खड़ा हो जा कर सारे जीवनका रस समाप्त कर विनाशका ही स्वरूप बना देगा कि नहीं? उस अवस्था में वासना की तृप्तिका भी अन्त हो चुका होगा तथा वासना ही उस समय केवल--एक इच्छा, जिसके लिए न केवल भोग का भाव, वासना, तृष्णा, सब कुछ मिटकर केवल एक विचारहीनताका ही रूप बन कर उस को समाप्त कर देगा? वासना क्या? वासना तो उस अवस्था को वासना भी वासना के रूप में स्वीकार न किया जाय, वासना का जो स्वरूप अपने आप में बन वासना के स्वरूप का विचार ही, वासनाओं का प्रभाव ही सब कुछ समेट समाप्त वासना का केवल रूप, वासना; तृष्णा वासना बन कर नहीं रहसकती, न वह वासना तृष्णाका रूप धारण कर सकती है। जो इस तरह की स्थिति होगी वहां वासना का ही साम्राज्य होगा तथा, उस समय की वासनाका केवल एक ही विकरालरूप भयानक स्वरूप होगा कि जिस अवस्था में मनुष्य अपने विचार की क्षमता को शून्य बनाकर--उस रूपमें जहां इच्छा तथा जो वासना तृष्णाका रूप धारण कर सब कुछ नष्ट कर देगी जिसका स्वरूप होगा, वासना का रूप केवल वासना बनकर, एक मात्र इच्छा तृष्णा वासना बनकर केवल उस सीमा पर्यन्त विचारहीनता को ले जा कर उस शून्य रूप में उस वासनाका जो स्वरूप प्रस्तुत होगा वह, केवल एक वासना मात्र ही सब कुछ बनकर रह जायगी। आज तक के इतिहास में भी हम केवल वासनाके साम्राज्य को ही सब रूपों में विनाशका रूप समझकर विचारते व देखते आये। वासना साम्राज्य रूप धारण करके विनाश, केवल वासना विकराल रूपमें ही विनाश का कारण न होकर उस सीमा तक भी चला गया कि जहां वासना अपने सम्पूर्ण प्रभाव द्वारा केवल अपने स्वरूप को ही भोग कर वासनाके नाश का कारण बनकर अन्त में उस रूपमें शेष रह जायगी जो विचारहीनताका रूप ही बन कर रहेगा, जो उस समय के वासनाके उस रूप द्वारा रूपान्तरित हो! 104

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यद्यपि यह बात सर्वथा सत्य नहीं मानी जायगी कि वर्तमान काल में जितने भी पन्थ और सम्प्रदाय विद्यमान हैं; उनका जन्म केवल स्वार्थवश ही हुआ होगा। वस्तुतः उनका जन्म मानव-चेतना के जागरण के रूप में ही हुआ होगा। विभिन्न प्रकार के मत-मतान्तरों द्वारा मनुष्य के विभिन्न मनोभावों को सन्तुष्ट होने का अवसर मिला, व्यक्तिगत रूप से भी मानव का अहं तुष्ट हुआ, उसकी विचार-शक्ति का विकास हुआ। यह भी सम्भव है कि तात्कालिक सामाजिक आवश्यकता के अनुसार उनका उदय उपयोगी रहा हो। इस आधार पर यदि इन सम्प्रदायों के जन्म को उपयोगी मान भी लिया जाय, तो भी इनकी वर्तमान उपयोगिता संदिग्ध है। आज इन सम्प्रदायों की उपयोगिता क्या है? क्या ये मानव-कल्याण के साधन हैं? क्या आज का पथभ्रष्ट मनुष्य इनसे कोई प्रकाश ग्रहण कर सकता है? क्या ये मानव को मुक्ति का सन्देश दे सकते हैं? आज सम्प्रदाय के नाम पर मानव का शोषण किया जा रहा है। मानव-कल्याण के नाम पर बने सम्प्रदाय आज मानव के सबसे बड़े शत्रु बन गये हैं। आज सम्प्रदाय और पन्थ सामाजिक वैमनस्य के सबसे बड़े कारण बन चुके हैं। सम्प्रदाय के नाम पर आज मानव-मानव का शत्रु बना हुआ है। क्या यह धर्म है? क्या यह ईश्वर का आदेश है? जिस परमात्मा, ईश्वर, अल्लाह, गॉड अथवा प्रकृति का नाम लेकर यह सब किया जा रहा है! क्या सचमुच? परमात्मा का आदेश सम्प्रदायवाद फैलाना है? क्या परमात्मा सम्प्रदायों के नाम पर मानव का रक्त बहाने का आदेश देता है? ईश्वर को यदि एक माना जाय, तो क्या ईश्वर अपने ही अंश रूपी मानव को इस प्रकार आपस में लड़ाने का काम करेगा? सम्प्रदायवाद आज मानव-समाज के लिए एक ऐसा महारोग बन चुका है; जिसका यदि समय रहते, कोई उचित उपचार न किया गया, तो सम्प्रदाय के नाम पर मानव-समाज का अस्तित्व ही समाप्त हो जायगा, अतः इस रोग का शीघ्र उपचार करना आवश्यक है। क्या मानव सम्प्रदायवाद से मुक्ति पा सकता है? क्या सम्प्रदायवाद का अन्त सम्भव है? क्या मानव सम्प्रदायवाद के चंगुल से मुक्त हो सकता है? क्या यह सम्भव है कि वह बिना सम्प्रदाय के, धार्मिक कहला सके, क्या यह सम्भव है, कि वह धर्म का पालन तो करे किन्तु किसी सम्प्रदाय का अंग न बने! अवश्य ही ऐसा सम्भव है। धर्म का वास्तविक रूप मानव, सम्प्रदाय से परे होकर अपना सकता है। धर्म का मूल स्वरूप सम्प्रदाय से सर्वथा भिन्न है। सम्प्रदाय तो एक बाह्य आवरण है। जिस प्रकार विभिन्न सम्प्रदाय अपने-अपने सिद्धान्तों को विभिन्न ढंग से व्यक्त करते हैं, उसी प्रकार धर्म का कोई बाह्य आवरण नहीं होता, वह आन्तरिक है; सम्प्रदाय परिवर्तनशील है, धर्म अपरिवर्तनशील है; सम्प्रदाय में संकीर्णता होती है, धर्म व्यापक है, धर्म सार्वभौम है। सम्प्रदाय किसी विशेष व्यक्ति या सिद्धान्त से सम्बन्ध रखता है जब कि धर्म का सम्बन्ध किसी व्यक्ति विशेष से न होकर सार्वभौम सत्य से होता है; धर्म सत्य स्वरूप है। सम्प्रदाय का सम्बन्ध तो केवल मानव से है, मनुष्य के आचार-विचार तक ही सीमित है; धर्म का सम्बन्ध समस्त सृष्टि से है। सम्प्रदाय तो धर्म की संकुचित व्याख्या मात्र है, जिसके आधार पर सम्प्रदाय प्रवर्तक, धर्माचार्य अपनी शक्ति का विस्तार करते हैं! सम्प्रदाय संकुचित विचार, संकीर्ण दृष्टिकोण प्रदान करता है! सम्प्रदाय बन्धन है, सम्प्रदाय अन्धविश्वास सिखाता है। धर्म तो मानव को मुक्त करता है। धर्म तो मानव को बन्धन से छुड़ाता है। धर्म का स्वरूप सत्य है। सम्प्रदाय का स्वरूप अन्धविश्वास पर टिका है। धर्म का स्वरूप विवेक पर आधारित है, धर्म में सत्य का दर्शन होता है। धर्म मानव को उदार बनाता है। सम्प्रदाय ने, सम्प्रदायवाद को जन्म दिया है, जिसने मानव समाज को छिन्न-भिन्न कर दिया; मानव को मानव से लड़ाया। सम्प्रदाय ने मानव का विवेक छीन लिया। आज सम्प्रदाय अन्धविश्वास का दूसरा नाम बन चुका है। सम्प्रदाय के नाम पर मानव अन्धविश्वासी बन चुका है। मानव सम्प्रदाय के जाल में इस प्रकार जकड़ा जा चुका है कि वह विवेक से काम लेना भूल चुका है। आज सम्प्रदाय का बोलबाला है; आज मानव सम्प्रदाय के जाल में ऐसा फँसा हुआ है कि सम्प्रदाय के नाम पर वह कुछ भी करने को तत्पर रहता है। सम्प्रदाय ने मानव को संकुचित कर दिया है। सम्प्रदाय के कारण मानव का दृष्टिकोण अत्यन्त संकीर्ण हो चुका है। सम्प्रदाय के कारण मानव का धर्म भ्रष्ट हो चुका है। सम्प्रदाय ने मानव का शोषण किया है। मानव-कल्याण के नाम पर मानव का शोषण, यह कैसा धर्म है? आज सम्प्रदाय के नाम पर मानव का शोषण हो रहा है। सम्प्रदाय ने मानव-समाज को अनेक टुकड़ों में बाँट दिया। इन सम्प्रदायों की आज कोई आवश्यकता नहीं, इनका अन्त ही श्रेयस्कर है। सम्प्रदायों के कारण आज मानवता सिसक रही है; सम्प्रदाय मानव को लड़ाने का काम कर रहे हैं। आज आवश्यकता इस बात की है, कि मानव को इस अन्ध-कूप से बाहर निकाला जाय। आज आवश्यकता इस बात की है; कि धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझा जाय।

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इसलिए पहले इसका विचार करो, कि परमात्मा का स्वरूप क्या या कैसा पदार्थ होगा। विचार करने पर यही सिद्ध होता कि वह एक पदार्थ या परमात्मा ही जगत् का कर्त्ता होगा, सो कर्त्ता जो कोई पदार्थ बनता कर्त्ताका वा कर्त्तापन जिसमें वा जिससे रहा क्या? सो जो कर्त्ता सो वह एक जगत्कर्त्ता सर्वशक्ति न वा केवल सर्वथा कर्त्ता पदार्थ सर्वथा जगत् कर्त्ता बनता कभी कर्तापन उसमें छूटा। कर्त्ता सो क्या उस कर्ता न था? इसलिए केवल जो जगत् का, बनता सर्वशक्तिमान् का होगा सब पदार्थ केवल कर्त्ता क्या सब से सब कर्त्ता शक्ति-रूप ही जग हुआ, कभी छूटा। सर्वशक्तिमान् उसका नाम जग का जो कर्ता सो ही, वा जो कर्त्ता सो जगत् कर्त्ता जग बना कर्त्ता परमात्मा का कर्त्ता नाम सब कर्त्ताका स्वरूप नहीं! जो जग कर्ता सोईके कर्त्ता का ही? जग कर्त्ता ऐसा जो जगत् जगत्कर्त्ता रूप का कर्त्ता उस कर्त्ताका, जगत् ही कर्त्ता रूप कर्त्ता होगा, जिससे जगत् का कर्त्ता कर्त्ता ही जगत् का सब कर्त्ताका नाम कर्त्ता रूप ही हुआ सो कर्त्ता कर्त्ता जगत् का ही जगत् ही कर्ता ही का सब कर्त्ता कर्ता जगत् का कर्त्ता ही कर्त्ता जगत् का ही सब कर्त्ता कर्त्ता ही जगत् का सब कर्त्ता कर्त्ता ही कर्त्ताका सो कर्त्ता ही सब कर्त्ता नाम कर्त्ता कर्त्ताका रहा, कर्त्ताका स्वरूप ही सब से सब कर्त्ता नाम सब कर्ता ही, वा कर्त्ता ही जगत् सब उस कर्त्ता जगत् का, उस कर्त्ता का कर्त्ता जगत्, जगत् कर्त्ताका सो कर्त्ता जगत् उस कर्त्ता कर्त्ताका सब कर्त्ता का सब कर्त्ता उस जगत् का, सो ही उस कर्त्ताका कर्त्ताका ही कर्त्ता सब जगत् कर्त्ता का सब सो ही सो कर्त्ताका कर्त्ताका ही कर्त्ता जगत् कर्त्ता जग कर्त्ता कर्त्ता का होगा, कर्त्ता ही कर्त्ता का कर्त्ता ही कर्त्ता सो जग का ही सो ही कर्त्ता सो कर्त्ता ही जगत् सब कर्त्ता जगत् कर्त्ता सब ही जगत् जगत् का कर्त्ताका ही; जिस प्रकार कर्त्ता का वा कर्त्ता ही; कर्त्ता कर्त्ता कर्त्ता सब ही जग, सब ही वा, सो ही कर्त्ता सब कर्त्ता ही जग का कर्त्ता ही कर्त्ता ही जग का कर्त्ता ही सब कर्त्ताका ही; सो कर्त्ता, उस कर्त्ता ही कर्त्ता जगत् रहा, जगत्, कर्त्ता कर्त्ता स्वरूप कर्त्ता कर्त्ता ही जगत्का, जग कर्त्ता कर्त्ता कर्त्ता जग कर्त्ता जग कर्त्ता कर्त्ता? कर्त्ता कर्त्ताका कर्त्ताका जगत् का होगा ही? जग कर्त्ता ही कर्त्ता ही जगत्का सब कर्त्ता सब ही कर्त्ता का होगा वा, जगत् ही कर्त्ता ही कर्त्ता जगत् ही कर्त्ताका जग ही सब ही सब कर्त्ता ही कर्त्ता रहा, कर्त्ता ही कर्त्ताका ही कर्त्ता ही कर्त्ताका ही सो ही सब कर्त्ता जग जग का सब जग न कर्त्ता कर्त्ता कर्त्ता ही कर्त्ता, जग का कर्त्ता कर्त्ता ही कर्त्ताका ही कर्त्ता कर्त्ता कर्त्ता जग का कर्त्ता कर्त्ता कर्त्ता कर्त्ताका जगत्-कर्त्ता जग का कर्त्ता सब कर्त्ता होगा कर्त्ता ही सब जग कर्त्ता ही का कर्त्ता जग--का कर्त्ता ही, कर्त्ता जग का, वा कर्त्ता कर्त्ता सब कर्त्ता जग उस कर्त्ता ही जग सब सब जगत्--ही जग-जग ही कर्त्ता जगत् कर्त्ता का, सो कर्त्ता कर्त्ता, ही जगत् का कर्त्ता कर्त्ता जग का सब कर्त्ता ही कर्त्ता ही, जग कर्त्ता कर्त्ताका ही जग कर्त्ता जग सब जगत् कर्त्ताका ही वा परमात्मा जगत् का जो होगा सब कर्त्ता कर्त्ता कर्त्ताका सो कर्त्ता सब जगत् कर्त्ता का कर्त्ता होगा, कर्त्ता कर्त्ता कर्त्ता कर्त्ता ही; सो ही सब कर्त्ता कर्त्ता कर्त्ता कर्त्ता जग का ही कर्त्ता सब ही जग जग कर्त्ता कर्त्ता जगत् कर्त्ता का कर्त्ता जगत् का कर्त्ता कर्त्ताका ही जगत् सब कर्त्ता कर्त्ता कर्त्ता ही; कर्त्ता ही कर्त्ता कर्त्ताका ही कर्त्ता जगत् कर्त्ता ही सो सो कर्त्ता ही कर्त्ता जग कर्त्ताका ही सब कर्त्ता जगत् कर्त्ता ही सो ही सो सो कर्त्ता ही कर्त्ता कर्त्ता ही कर्त्ता ही कर्त्ता कर्त्ताका कर्त्ता ही, कर्त्ता ही जग का कर्त्ता ही, कर्त्ता कर्त्ता ही; उस ही कर्त्ता कर्त्ता ही कर्त्ता ही कर्त्ता ही ही जग कर्त्ता जग सब कर्त्ता ही, कर्त्ता कर्त्ताका ही कर्त्ता सब जग कर्त्ता कर्त्ता कर्त्ता कर्त्ता ही कर्त्ता ही कर्त्ता कर्त्ता जगत् कर्त्ता जग कर्त्ता सब कर्त्ता जग कर्त्ता- कर्त्ता कर्त्ता ही सब, कर्त्ता सब कर्त्ता ही सब ही सब कर्त्ताका, कर्त्ता ही सो कर्त्ता ही कर्त्ता कर्त्ता ही, जग सब कर्त्ता ही, कर्त्ता सब जग जग कर्त्ता कर्त्ता ही सब ही जग कर्त्ता, कर्त्ता कर्त्ताका जग, कर्त्ता जग कर्त्ता जग सब कर्त्ता जग, जग कर्त्ता जग कर्त्ता ही कर्त्ता ही, वा कर्त्ता ही कर्त्ता जग 108

इस प्रकार विचार करके वह उस वणिकपुत्रको घर ले आया। इसके बाद वह उस दिन रात भर अपने घरमें रहा और सबेरा होने पर उस वणिकपुत्रको ले राजाके पास पहुँचा। राजाके द्वारपर पहुँचकर उस पहरेदार ने सब बातें राजा से कह दीं। राजा, यह बात सुनकर कि उसने किसी पर स्त्रीका स्पर्श किया होगा और अपने मनमें पाप माना होगा, तभी यह मरना चाहता था, बहुत आश्चर्य चकित हुआ; इसलिए उस पर दया करके पहरेदार, सब बात राजा से विस्तार पूर्वक कह चुका तो राजाने पूछा कि तू सब समाचार विस्तार पूर्वक कह जिससे यह निर्णय किया जा सके कि अपराध का मुख्य कारण कौन है। पहरेदार ने कहा कि महाराज यह सब बात तो राजाके सामने कह चुका परन्तु यह व्यक्ति, जो अपनी इच्छासे मर, रहा अपने अपराधके कारण और अपने प्राणोंका उत्सर्ग कर, पाप धो रहा है यह राजा ही के योग्य बात है। राजा ने कहा कि इस प्रकार न केवल पहरेदार की प्रार्थना पर विचार किया न वरन् अपने न्याय की दृष्टि से विचार किया। इन सब बातोंको सुनकर राजा, सब कुछ जान लेने के बाद उस पर दया आ गई। तब राजाने पहरेदारको सत्कार पूर्वक उसके घर भेज दिया। उस घर आकर पहरेदार-पुत्र को, जो बहुत सुन्दर था, और सब प्रकार से रूपवान् था यह सब बात कह सुनाई। तब उस पहरेदार के पुत्रको उस स्त्रीका रूप; मन में विचार कर-करके शोक से सब काम धन्धे छोड़ दिये और वह वियोगके कारण रात दिन चिन्तामें ही डूबा रहने लगा। उस समय सब लोग इसके परिवार के सब लोग चिन्ता में, विह्वल हो कर इधर उधर फिर रहे थे। पर जब चिन्ता किसी तरह दूर न हुई तो अन्त में पहरेदार के पुत्रने चिन्ता से व्याकुल हो कर प्राण त्याग दिये। परिवार में शोक छा गया। तब उस समय पहरेदार का एक ही पुत्र होने के कारण उसका ऐसा दुःख हुआ, पहरेदार और पहरेदारनी ने रोते, पीटते हुए शव, चिता बना जलाना तय किया, और चितामें न जाने, जल जाने के बाद, उस पहरेदार ने भी, अपने जीवनको नष्ट करने के लिये, जो आग पहरेदारके लिये जलायी गयी थी उसी जलती चिता, पहरेदारने जलने वाले के पश्चात्ताप स्वरूप चितामें कूद कर प्राणोंका उत्सर्ग कर दिया। यह सब देखकर स्त्री ने सोचा। उसके बाद उस पहरेदार की स्त्री भी अपने स्वामी का देहान्त होने पर उनके साथ ही जल मरी। इसप्रकार पति का शव और पुत्र का शव दोनों को गोद में रख कर, स्वयं न जाने क्यों, जल कर भस्मसात हो गयी। इसके बाद उस पहरेदार की स्त्री के मरने का समाचार जब उस सुन्दर वणिक-कन्या को मालूम हुआ कि उसके कारण ही यह सब हुआ अर्थात् पति का वियोग पहरेदार पुत्रका मरण तत्पश्चात् माता व पिता दोनों का भी देहान्त उसने विचारपूर्वक यह सब सोच कर निश्चय किया, कि मैं ही सब पाप की मूल कारण हूँ इसलिए न केवल इस पाप का फल मुझे भी भोगना चाहिये अपितु इस अपराध में अपराधी समझकर मै भी, पतिव्रता के नियमों के साथ, उस अग्नि में कूद अपनी जीवनलीला समाप्त कर दूँ! तब वह भी उस आग में चिन्ताग्नि में कूद कर भस्म हो गयी। पहरेदार की स्त्री चिन्ताग्नि में उस प्रकार से जल, तो उस आग का कष्ट शांत हो गया। विक्रम बेताल से कहे! कि वणिकपुत्र वणिक की तो बात छोड़ इस प्रकार से, इनमें सब से बढ़ कर पापी कौन था। जिसने पहरेदार को इस प्रकार जीवन गँवाने दिया। इस बात का उत्तर मुझे शीघ्र ही दे, तब शव ने, इस प्रकार से फिर प्रश्न किया, जिस पर शव मुख से यह उत्तर आया कि इनमें पहरेदार का पाप अधिक था जिसने अपने प्राणोंको त्याग दिया, पर जो व्यक्ति विवेक हीन होता, उस पर इसका अधिक प्रभाव पड़ता पहरेदार का कर्तव्य था केवल अपनी पहरेदारी करना उस परिवारका नहीं। इसलिए पहरेदार सब पापों का मूल कारण था। इस प्रकार बेताल के वचन सुनकर महाराज विक्रमादित्य चुप हो गये और पेड़ की ओर चल दिए। बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। विक्रमादित्यने पूछा? --हे राजा! पहरेदार दोषी था, जिसने सब अपराध अपने सिर लिया, और केवल पहरेदार ही पापी था, क्योंकि राजा ने उसे इस पहरेदारी करने का काम दिया था और उसने वणिक पुत्र, राजा का अपमान! राजा उस पहरेदारको प्राणदण्ड दे सकता था। पहरेदार ने सब बातें न छिपाईं, इसलिए राजा ने उसकी जान बख्श दी। दूसरा पापी पहरेदारका पुत्र था, जिसने! पर स्त्रीके सौन्दर्यको देखकर प्राण दिए। राजाने पूछा कि वणिक पुत्र का क्या दोष, तो शव बेताल ने कहा कि, राजा न्याय सब प्रजा के लिये समान रूप से करता है। इसलिए इसका दोष; या सब पापों का मूल कारण केवल राजा ही था। राजा को पाप का फल भोगना ही होगा। इस प्रकार यह वार्तालाप समाप्त हुआ। 109

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व्यवस्था का भार जिस पुरुष विशेषके अधिकार में हो वह राजा कहावे, प्रजाके सुख दुःख देखना ही जिनका काम हो, प्रजाके रक्षण का जिम्मा, सो सब राजा का काम इत्यादि प्रमाणों से सिद्ध हुआ कि महाराज दशरथ के अधिकार में सब काम ठीक ही था जो उस पर दोष धरे, राजा सब बात में प्रजाके आधीनार्थ न्याय युक्त प्रजागण के सुख हित को ही परम न्याय वा कर्त्तव्य-कर्मनिष्ठ समझ अपनी स्त्री वियोग के दुःखको सहते प्रजाके लिये ऐसा शोक महा-दुःख सह ऐसा कर्तव्यनिष्ठ हुए? सो संक्षेप उत्तर सुनो सो यों है, राजा सब बात में प्रजाके आधीनार्थ न्याय--वा प्रजाका प्रबन्ध तो अवश्य ही, प्रजा हित सर्व कार्य्यार्थ प्रबन्धका काम तो था परन्तु ऐसा तो न था कि जो बात, प्रजा कहे वही सर्वथा स्वीकार्य्य हो, राजा सब बात न्याय, धर्मयुक्त, नीति, कर्म- वाद, विचार, प्रत्यक्ष, सत्य, शास्त्र, प्रमाण, युक्तियों से विचारता था, ऐसा अन्धा धुन मन--मुख ना करता, अविचारित, अन्यायी बातको राजा सर्व प्रजाके ही क्या सब लोक भर के भी मत को मान कर जो काम ना होय वह कदापि नही कर सका राजा ज्ञान, वैराग्यवान् परम धीर, सो काम प्रजाके ही सुख के लिये सर्वथा नही करता जिस काम का फल लोक-परलोक दोनों को दुःख रूपी नरक दायक होने प्रजाका जिस पर केवल भ्रमरूप ही, भय था, जिसका यथार्थ निराकरण राजा और प्रजागणने सब, राजा और प्रजा--के प्रबन्धार्थ प्रजाके ही मन- मत पर छोड़ दिया निष्पाप सीताजीको त्यागने से, सर्व प्रजा सम्बन्धी सब प्रजा मण्डल का काम सब राजा, प्रजा, न्याय, नीतिप्रबन्ध, जो सब था, सब नष्ट भ्रष्टता, अनर्थक सर्व ही हो सकता सिद्ध प्रजाके प्रबन्ध के नियमों से तो यह बात थी, राजा सब प्रजाके आधीनार्थ न्याय का प्रबन्ध तो, उसके प्रत्येक न्याय नीति विषयक कार्य्यों में अवश्य होता परन्तु प्रजा सर्व विषयके अनधिकारिणों के हाथों सब ना छोड़ा जाता है, इसका प्रमाण? यथा राजा को प्रजागणके सब काम करने पड़ते हैं; सब प्रजाके ही तो सब काम हैं, सो भी सब प्रजा कहे, तो भी यह काम नहीं होता कि प्रजा कहे कि चोरी करने पर न दण्ड दिया जावे वा जो जिस पर डाका मारे सो ना तो दिया जा वा सर्व काम सर्व प्रजाके लिये छोड़ दिया, फिर तो सब काम प्रजा ही का बिगड़ कर सब सर्व ही नाश होना सिद्ध होवे सो राजा ऐसा कभी अपने मन नावे सो प्रजाके प्रबन्ध का नियम सब शास्त्र सब न्याय, प्रमाण से, यों रहा सिद्ध हुआ सो यह दूसरा कारण तिस भ्रम भर से जो हुआ सो सब न्याय वा कर्त्तव्य-धर्मनिष्ठा, कार्य्याकार्य्यके वा प्रबन्धके नियमों के सर्वथा विरुद्ध सर्व अन्यायी सिद्ध होता है, जो अज्ञानान्ध सब, भ्रम कार्य्यकारी प्रजा सम्बन्धके बहकावे मात्र सर्व राज नियम ना हो सका विचारता, फिर कर्त्तव्यता कैसी; सब भ्रम त्याग कर सब न मान कर, व अपनी परम कर्त्तव्य-कर्मनिष्ठा बात को ही सर्वथा ही पालन कर सका था। दूसरा यह भी विचारने का बात सिद्ध प्रजाके प्रबन्ध--नियमों से सब प्रजा और प्रजाके प्रबन्ध--नियमों के आधीन सर्व प्रजा कार्य्य सम्बन्ध सम्बन्धी पुरुष, केवल व्यवस्था प्रबन्ध के नियमों से ही आधीन सब प्रबन्ध सम्बन्धी हो कर, सदा सब व्यवस्था सब काम में, प्रजा परस्पर मिल कर अपने प्रबन्ध कार्य्य सब वा व्यवस्था-सम्बन्धी सब काम को कराती, प्रजा को ही आज्ञा सब पर ही सदा प्रबन्ध सम्बन्धी सब, परस्पर सब, प्रबन्ध सम्बन्धी सर्व पर, ही ही प्रजाका सब पर हाथ रहता वा प्रबन्ध--नियमों की आज्ञा प्रजा ऊपर सब काम सब प्रजा करती सब थी, उस सब बात को छोड़कर, इस बात सबही ना बात का सर्व काम प्रजा जन-वर्ग के आधीन तो ना था कि केवल १ प्रजावर्ग की बात पर ही राजा सब काम करने उद्यत वा प्रबन्ध का कर्त्ता सो सब बात भी भ्रम भर, वा धोखे का काम रहा, सब न्याय वा नीति से परे रहा, ना तो सब प्रमाण सिद्ध; ना तो कोई न्याय; सब बात सर्वथा अशुद्ध; 111

इस पर रावण के मामा मारे गये और अनेक राक्षस व्याकुल होकर रण से भागने लगे तब यह देखकर यह भी रण को चल पड़ा। उस समय विभीषण राम जी से प्रार्थना कर के कहने लगे कि हे राम जी इस का नाम वज्रदंष्ट्रक निशा चर है। यह महाबली और यह मायावान् विद्या युक्त है। यह मायावी लङ्का पति का मन्त्री भी कहला कहाता है; सो हे वीर, राक्षस सब कपट को जान्ने वाले हैं, इन पर सो; कपट विद्यायुक्त; कपट रस-भरपूरयुक्त; हो शस्त्र बल, सम्बल युत निज भुजबन्ध कठोर निज बाण सहाय सहाय। कपि दल मार भार सोइ गिरा गिराय सो यह ॥ इति राम कथायां लङ्का काण्डे, रावण का सेनापति, वज्रदं ष्ट्र राक्षस का संग्राम और बाण वर्षा से कपि कटक भंग सो सुन कपि चंचल, विरचत दल रण रंग। कपि अङ्गद बलवान्, सम्मुख ह्वै रण रंग॥ सो बाण वर्षा से जब कपि, कटक विकल होकर रण से भाग चला तो अङ्गद जी कूद कर रणक्षेत्र में आय कर सब को पुकारा कहां जाते हो तुम सब शूर शूरमा होकर भागते हो अपने कुल को लजाते और शूरता के बल को कलंक लगाते हो। सब पीछे फिरो हमारी शरण आओ, यह जो बाण वर्षा कर कपट विद्या से रण कर रहा है इसको अभी मिटाता इतना कह कर अङ्गद महाबली रण में आया सो हाथ में एक वृक्ष ले बाणों के जाल को काटता हुआ वज्रदंष्ट्र के रथ पर आ पहुंचा। और रथ को एक वृक्ष से मारा जिस से वज्रदंष्ट्र रथ छोड़ गदा ले नीचे कूद पड़ा। तब दोनों में बड़ा भारी युद्ध होने लगा। अङ्गद जी का हाथ जब खाली था तब वज्रदंष्ट्र ने एक गदा अङ्गद पर, चलाई सो उस वार को अङ्गद जी ने बचा लिया। जब अङ्गद जी खाली हाथ देखे, राक्षस ने गदा चलाई तब अङ्गद जी ने भी, उस राक्षस को दोनों हाथ पकड़ कर उस की गदा छीनी गदा से उस को मारना चाहा। तब उस ने ढाल से गदा के वार को रोक लिया सो वार खाली न गया। ढाल के दो टुकड़े हो गये, तलवार से वार भी अङ्गद जी पर किया सो; तलवार पकड़ अङ्गद हाथ से छीन फेंकने लगे वज्रदंष्ट्र आगे बढ़ अङ्गद छाती ऊपर मुष्टिका प्रहार किया। तब अङ्गद ने एक मुष्टि से उस दुष्ट राक्षस कपटी को पृथ्वी पर गिरा दिया सो पृथ्वी पर गिरते ही फिर उठ खड़ा हुआ सो देख अङ्गद जी ने तलवार से उस का सिर काट दिया; फिर तो राक्षसों की सेना, जो बची, सो भागी, उन पर कपि दल सो सब कपि लङ्का सम्मुख भागि परे। कपि अङ्गद सुजान, सम्मुख ह्वै मारि डरे॥ सो बाण कटक के मारे से, रावण के सेनापति वज्र दंष्ट्र मारे जाने पर राक्षस सेना लङ्का को भागी, तब, रावण, विभीषण के वचन सुन कर कपि दल फिर गया और कपि कटक से, बचे जो राक्षस अपने प्राण बचा कर लङ्का भागे थे, सो रावण के दरबार में कहने लगे कि हे देव सब सेना को कपि दल मार, बाण वर्षा निष्फल कर गया सो यह सुन कर रावण, मस्तक हिला कर उस सम्पूर्ण कथा को सुन क्रोध से कांप उठा सो फिर अपने एक शूर वीर अकम्पन नामक सेना पति को रण को भेजा; यह बाण चलाने में बड़ा निपुण था इस का सारा बल बाण विद्या पर ही निर्भर था; सो यह बाण विद्या से जब बाण बरसाने लगा तब कपियों का दल घबराया, सो सब दल अङ्गद के पास भाग कर आया, सो यह अकम्पन भी बाण वर्षा करता हुआ आगे को बढ़ा, तब कपि दल भाग कर हनुमान् के पास गया और कहने लगे, हे वीर रक्षा करो, दल पर! सो सुन कर पवन--सुत रण में अकम्पन को मारकर कपि दल को शरण दी फिर रण का रंग देख सो सुन कपि चंचल, विरचत दल रण रंग। कपि हनुमान् महान्, सम्मुख ह्वै रण रंग॥ सो जब ऐसा कपि दल को विकल देख कर देखा तो, हनुमान् सब से आगे बढ़ हाथ एक वृक्ष ले अकम्पन की ओर चले सो अकम्पन ने उस को आते देख बाण वर्षा से वृक्ष के, टुकड़े टुकड़े कर दिये फिर उस वृक्ष को फेंक दूसरे वृक्ष को हनुमान् जी अकम्पन पर फेंकने लगे, सो उस बाण विद्या वाले ने उस वृक्ष को तलवार से काट दिया तब एक भारी वृक्ष, जो बहुत से फल 112

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इस प्रकार सभी आश्चर्यचकित होकर, परस्पर बोले, अवश्य देखकर, यह गणेश, प्रथम पूजनीय देव ही हो यह प्रकट हुए, जो मनुष्य इन को न प्रथम पूजे, विघ्नेश्वरदेव उसे, ऐसा स्वरूप कर देते फिर कभी मनुष्य स्वरूप नहीं पाते; ऐसा जान सभी गणेश जी के पाद पद्म सिर नवाकर और सब जगत्पति जगदाधार ब्रह्मा विष्णु आदि देवता दोनों कर जोड़े हाथियों सहित उस हाथी स्वरूपधारी को विनय करने लगे, हे देव जगत् के जो विघ्नकर्ता अथवा जो जो स्वरूप धारण किया सोई तुम्हारा रूप सर्वविदित सब को भय नाशक हुआ, सो सो स्वरूप तुम्हारा पूजें; तुम्हारी जो पूजा निष्काम मन करके विघ्न नाश हेतु से करे अथवा सकाम अपने मन की मनोकामना को शीघ्र पावे; ऐसा कह सब अपने अपने धाम को गये। द्वितीय अध्याय में यह कथा विस्तार से कही गई कि पार्वती गणेशजी सहित, स्नान करने को गई गंगाजी के तट बैठकर विचारने लगीं कि गणेशजी जब तक गृह पर रहे किसी को भय नहीं हुआ जब से यह कैलाश पर्वत पर आये सब को भय व भ्रम का विस्तार बना सो कुछ न कुछ उपाय ढूंढना योग्य है जो भय निवारण हो, यह विचार के गंगाजी तट पर महादेवालय से जल ला कर पूजा की, स्नान उपरान्त उस जल वस्त्र व अंगों का मैल धो डाला, गंगा जी के तट पर जो पुतला बनाया सो केवल पुतला रूप ही न देखकर दो नेत्रों से विचारने लगे कि ऐसा रूप किसी का कभी नहीं देखा जिसने त्रिलोकी को मोहित किया; इसमें प्राणदान देकर कौन कष्ट को न पावेगा सो तो जल ही में बहाना योग्य विचारकर गंगा में फैंक दिया, गंगा स्वरूप से उत्पन्न हुआ जल में से न निकला, गंगा पार्वती का विचार दोनों के मनन करने से दोनों का एक पुत्र उत्पन्न हुआ सो सब जीव भक्षण करने लगा सो जो जो उस स्वरूप को जो जो पुकारते, सब को गंगा पुत्र ही कह कर पुकारते रहे सो यह न कहकर कि गणेशजी का रूप सब को यह है? सब के स्वरूप से उत्पन्न हुआ दोनों के दो नाम कर सब को इस सब बात विदित हुई, दो नाम एक व नाम सब भिन्न-भिन्न स्वरूप नाम भिन्न-भिन्न होने पर गणेशजी कहलाये सो, भिन्न-भिन्न स्वरूप धारे अनेक प्रकार कथन किया, विनायक स्वरूप सब के मनोरथों को पूर्ण करने का रूप बताया यह सब स्वरूप दोनों ने देखा सो सत्य माना; फिर सब विघ्न निवारण करने पर दो ही नाम रहे एक द्वै-मातु कहलाये जो सब पर कृपा करने, विनायक सो जो विघ्न को दूर करते हैं, सो विचारकर सब देवता लोग, जो जो नाम जिसे रुचिकर हुआ पुकारे? सो शिव पार्वती ने सब रूप को देख व दो स्वरूप मान सब विघ्न नाश कर सब कुछ दिया ऐसा जानकर विचारते, सब उस स्वरूप को नमस्कार करते हुए सब सुख पाये सो गणेशजी दोनों स्वरूप धारे सो इस प्रकार सब सब को दो रूप से सब को सहायता करते--तो सब देवताओं ने एक द्वैमातुर नाम धर उत्सव के साथ शिव गणों सहित सब रूप पूजा की।

इति द्वितीय अध्याय

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जाएगा, चाहे वह किसी तरफ जाए, चाहे वह इस बात समझे बिना मरेगी, चाहे वह समझ पाए, प्रयोजन यह नहीं प्रत्येक विचार, चाहे किसी रूप में हो, चाहे वह एक रूप रहा और फिर बदल कर गया हो, चाहे वह रूप जो सब कुछ देख रहा था और उस रूप का हिस्सा था जिसे उसने देखा गया हो, कभी नहीं होगा; चेतनागत होना भिन्न है, चेतनागत होना भिन्न है; चेतनागत होना भिन्न है, चेतनागत बदलना भिन्न चीज जब तक हम उस हिस्से तक नहीं आ जाते जहां हम यह अनुभव करते हैं कि हम उस समग्र प्रवाह का भाग, जिसे हम मन कहते हैं बल्कि हम उससे भी आगे चले जाते हैं सामान्य दिशा, तो जो कुछ होता हुआ हम देखते हैं, चेतनागत उलट-फेर, चेतनागत उतार-चढ़ाव इत्यादि उस सब पर हम हंस सकते हैं। चेतनागत समस्याओं सुलझाने का यह एक ढंग मन का हिस्सा हो सकता है लेकिन जब मन शांत होता है तब मन के तल की समस्याओं को सुलझाने जैसी कोई समस्या ही नहीं बचती इसी तरह एक ही चेतना के भिन्न स्तरों पर जो कुछ होता है वह चेतना स्वयं है, जो सब कुछ देख रही होती है। चेतना के इस अवलोकन रूप को जब हम पहचान लेते हैं विचारों के स्तर पर जो कुछ घटित होता है तब सब कुछ समझ में आता है। लेकिन जब हम विचारों के स्तर पर, जो सब कुछ घट रहा होता है उस पर ध्यान ही नहीं दे सकते तब विचारों द्वारा सब कुछ समझने की चेष्टा व्यर्थ, दिशाहीन व भ्रामक किसी तरह विचारों द्वारा तो हम दो-चार मिनटों तक ध्यान लगा सकते हैं, फिर हम पहले ही की तरह--या कहें कि मन जिस तरह से चल रहा था उसी में, विचारों की भिन्न गति पकड़ लेते हैं। ध्यान न तो, जो हो रहा होता है उसे तय कर देने पर भी आ पाता है। जैसा घट रहा हो, उसे देखिये; जो हो रहा उसे देखिये; जो हो रहा होता देख रहे मन को देखने लग जाने का कोई सवाल नहीं पैदा होता। विचार प्रवाह से, जो उस समय चल रहा होता-होता है तब तक अपने आप छूट जा सकते जब तक हम अपने मन को देखते नहीं? या विचारों द्वारा अपने विचार प्रवाह को उस स्थिति में ला कर ही समाप्त हो, ताकि जो कुछ घट रहा होता है उसे देखने समझना बंद हो जाए और इस तरह से ही चेतनागत या विचार उतार-चढ़ाव को मिटा दिया जा सके। या, चेतना द्वारा उतार-चढ़ाव देखने योग्य बना दिया जा, सब चेतना को मिटा कर दिया, तो इसके अतिरिक्त तो कुछ नहीं तो या तो चेतना का रूप इस तरह से स्थिर अवस्था को प्राप्त हो जाए; स्थिरता की दशा अवस्था के रूप में चेतना एक स्थान पर टिकती रहे, जब चेतना इस प्रकार मन के तल पर ठहरने लग जाए तो मन स्थिर, विचार विहीनता स्थिति में आ जाता है। तब सब कुछ शांत, सब कुछ स्थिर; चेतनागत रूप विचारों में नहीं रहता, चेतना का स्वभाव ही चेतना यही रूप है जो सब कुछ देख रहा होता विचार एक प्रवाह बन जाते, ... शायद, विचार ही चेतना का रूप है, चेतनागत उतार का एक रूप है, जो कभी इस रूप में और कभी न जाने किस रूप में बदल कर चेतनागत स्तरों ज्ञान के सब कुछ जानने के नियम के रूप में ही काम करता होगा, केवल उस चेतना, जिसे हम सब देखना समझना व पाना चाहते हैं, चेतना के उस रूप को देखना कठिन है, जिस पर इस या उस चेतना द्वारा किसी प्रकार--प्रकार का प्रभाव या असर पड़ रहा हो, जो चेतना भिन्न रूप चेतनागत से भिन्न स्तरों तक ले जाती चेतनागत स्तरों पर जो कुछ घट रहा होता है सब मन की दशा कही जा सकती है। जो कुछ हो रहा होता है वह मन चेतना का ही एक रूप बन जाता लेकिन कभी चेतना से अलग हो जाता मालूम पड़ता? क्या चेतना से मन अलग? चेतनागत स्तरों पर जो कुछ भी घटता है, देखना शुरू कर दें तब यह सब एक ही नजर आता, या विचार केवल देखने का साधन न हो, सब विचारों से अलग एक विचार शांत स्थिति में बदल चेतनागत ज्ञान अपने आप प्रकट हो जाता और चेतना स्वयं अपने आप को ही हर रूप में जान पाती विचार चेतना द्वारा चेतना को जान पाते हैं या मन की मदद? या जो कुछ चेतना का हिस्सा है या चेतनागत, जिसे कभी जाना गया है? या जो सब कुछ उस चेतना का ही या चेतनागत के आधार पर चेतना-सहित चेतना का ही सब कुछ तो न हो केवल चेतना स्वयं ही अपने-आप ही सब कुछ 116

श्वेताम्बरसम्प्रदाय का समस्त साधु समुदाय इस काल्पनिक परम्परा अनुसार तीर्थंकर का उत्तराधिकारी बनकर विहार करता रहा और संघ को यह उपदेश भी देता रहा—हे भव्यजीवो, केवल ज्ञानादि तो नष्ट हो चुका मगर उसका अंश हमारे पास मौजूद है। साधु परम्परा से प्राप्त संघ का यह अंश ही भगवान् का अंश है। इसके दर्शन ही प्रभु दर्शन हैं। इसके कथन का पालन यह वह समय था जब संसार भारत का नाम तक नहीं जानता था। केवल इसी देश में संसार का वह प्रकाश जग रहा था। वह धर्म का प्रकाश जिसके कारण यह देश जगद्गुरु कहलाया था। उस समय जब भारत केवल अपनी सीमाओं में ही बंधा हुआ नहीं, बल्कि एशिया खण्ड तक फैला हुआ था तब यह नहीं था कि समस्त संसार में धर्म का नामोनिशान नहीं था। धर्म सदा समस्त भू मण्डल पर फैला हुआ था; पर भारत में, विशेषकर जैन धर्म की परम्परा में वह धर्म था जिसे हम, अहिंसात्मक धर्म कह सकते हैं। वह धर्म, जो हर प्राणी को जीने का समान ही अधिकार प्रदान करता था। संसार के अन्य भागों में फैला हुआ धर्म बलिप्रथा से युक्त था। भगवान् महावीर, बुद्ध ने इस बात का विरोध किया—‘अहिंसा परमो धर्म!’ धर्म हिंसा नहीं सिखाता। धर्म दया सिखाता है। जो धर्म का प्रचार करने निकल पड़े क्या वे? केवल इस देश में? उस देश में? श्वेताम्बरियों का दावा चाहे जो हो, तथ्य तो सामने है। जब मौर्य काल तक जैन धर्म का प्रसार देश में ही नहीं बल्कि उस समय ज्ञात अन्य देशों में फैला था। तब यह क्यों मान लिया जाए कि इसके बाद जब संघ का विघटन हुआ, तब श्वेताम्बर संघ, जो मध्य देश में ही सीमित होकर रह गया, अपने आपको ही सब कुछ मान ले और अन्य मुनियों का जो देश व अन्य देशों में धर्म प्रचार कर रहे थे? उस प्रचार को उन मुनियों को ही भूल जाए। दिगम्बर यह दावा नहीं करते, ... नहीं, यह उनका या संघ का दावा नहीं है--यह दावा आज खोज--खोज कर निकाल कर रखा गया है। भारत के बाहर बौद्ध मत का प्रचार गया व फैला, ... पर जो बौद्ध धर्म से भी पुराना है। भारत की सीमा के--इन पार देशों मिस्र--तक पहुँचा वह श्वेताम्बर नहीं, बल्कि जैन दिगम्बर मुनि परम्परा थी। इसका अर्थ यह है कि इस देश में बौद्ध धर्म का प्रचार होने के पहले ही जैन मुनि जो श्वेताम्बर नहीं थे जैन धर्म को दूर देशों तक ले जा चुके थे। यह भी कहा जा सकता है कि केवल मध्य देश ही नहीं, बल्कि उस समय सारे भारतवर्ष में जहाँ पर भी जैन थे, वे केवल वे जैन थे, जो दिगम्बर कहलाए। जब दिगम्बर जैन सारे भारतवर्ष में फैले हुए थे तो श्वेताम्बर ही; श्वेताम्बर ही सारे भारत के एकमात्र जैन कैसे कहलाए जाते। इस वास्तविक ऐतिहासिक तथ्य को झुठ--लाया नहीं जा सकता, जिसे आज दिगम्बरों द्वारा ही केवल प्रचारित नहीं किया जा रहा है। अन्य देशों के इतिहासकार तथा शोध कर्ता विभिन्न खोजों के माध्यम से इस बात को प्रमाणित कर रहे हैं। युरो--पीय विद्वानों का योगदान इस दिशा में अधिक है। उन्होंने अपने देश के इतिहास में कुछ ऐसे प्रमाण-चिह्न पाए जो इस बात को प्रमाणित करते हैं। यहाँ यह कहना आवश्यक हो जाता है; चाहे दिगम्बर का प्रसार अन्य देशों में कितना भी हुआ हो उसका इस बात से कोई सम्बन्ध नहीं है कि भारत में जैन धर्म, जो कि एक मात्र धर्म था, उस समय जब तक मौर्य काल समाप्त नहीं हुआ तब तक भारत के बाहर के देशों में तो बढ़ रहा था मगर भारत में ही उसकी जड़ें कट जाने की शुरुआत हो गई। श्वेताम्बर जो कुछ प्रचार करते; वह केवल स्वयं को प्रमाणित करने अथवा संतुष्ट करने हेतु? इसे यह बात भली भांति समझ लेनी चाहिए। इतिहास केवल श्वेताम्बर परम्परा का प्रचार नहीं करता। इतिहास साक्षी है दिगम्बर मुनि संघ की उस त्याग और तपस्या का जिसने कभी हार नहीं मानी। अनेक बार देश में धर्म को बचाने के लिए स्वयं अपने अस्तित्व को दांव पर लगा दिया। इतिहास साक्षी है उस समय का भी, जब दिगम्बर मुनि, संघ व धर्मरक्षक आचार्य कुन्द कुन्द हुए। यह वह समय था, जब श्वेताम्बर संघ अपने आप को आगे ले जाने का दावा कर रहा था मगर उस दावा करने वाले को उस बात का लेश मात्र ज्ञान न था कि वह दावा कितना खोखला है; जब कि मात्र १ या दो ही लोग उस सम्प्रदाय के पास ऐसे थे। 117

यथा २६-२७ इन दोनो श्लोक मे यह बात कही गयीकि जो ज्ञान स्वरूप को नही जानता सो तो अविद्या का कार्य है यह संशय होताहै, सो ऐसा नही हो सकता है क्यो कि यह संशय ज्ञान ही का प्रकार है सो, सो ज्ञान हुआ सो हुआ, ज्ञान स्वरूप का नही हुआ इस से यह रूप भी ज्ञान ही का है, जो यह रूप न होवे, तो न कोई भेद ज्ञान हो और न कोई ज्ञान स्वरूप को जाने इस से संशय भी ज्ञान का स्वरूप है अविद्या स्वरूप को जो रूप ज्ञान नही कहा सो सत्य ही कहिये संशय के स्वरूप को ज्ञान ही माना है सो यह तो ठीक ही परंतु इस बात स्वरूप मे यह भेद ज्ञान प्रकाश रूप अज्ञान ज्ञान का प्रकाश सो भेद प्रकाशक है, इससे यह बात सिद्ध होती है कि ज्ञान मे भेद का लेश भी नही? तो यह तर्क-वितर्कयुक्त नही किंतु मिथ्या बात है, दृष्टांत-सिद्धांत मे बहुत भेद होता है जो सब प्रकार का भेद सर्वत्र मान लिया जावे तो ज्ञान और ज्ञेय का भेद प्रकाश जैसा इस ग्रन्थ कार ने निश्चय कर के मान लिया है सो इस का सर्वथा नाश हो जावेगा इस लिये जो सिद्धांत के अनुकूल हो सो ही सत्य मान लिया जाता है परंतु जैसा सिद्धांत मान लिया गया है इस से तो यह ग्रन्थ कर्ता का कथन सब प्रकार अशुद्ध ठहरता है॥ २५॥ विज्ञानमय से ले के मनोमय पर्यंत पंच कोषों का स्वरूप कह दिया अब, प्राण और देह का स्वरूप कहते हैं— कर्मरूपैस्तु तैः सर्वैः सहितः प्राणमयो भवेत्। पञ्चीकृतमहाभूतसम्भवो देह उच्यते॥ प्राणमय कोष कर्म और, देह अन्नमय कोष है॥ अब इन दोनों के स्वरूप को विस्तार पूर्वक, आगे के श्लोक मे कहेंगे सो, विद्याभ्यास करने वाले सब जीवो को उचित है कि प्राण क्रिया रूप को और शरीर को देह रूप जाने॥ इस से क्या सिद्ध हुवा कि, प्राण रूप जो क्रिया विज्ञानमय से लेकर देह पर्यंत का रूप है; जीवात्मा नित्य है, क्योंकि क्रिया का कर्ता और देह स्थिर है॥ २५॥ इस से आगे ज्ञान का जो रूप कहा सो सर्वथा असंभव है सो इस प्रकार कि ज्ञान रूप तो प्रकाश और निश्चय ज्ञान का नाम है, सो तो सर्वथा जड नही किंतु चैतन्य का ही रूप सदा बना रहता है, परंतु क्रिया का नाम ज्ञान कदापि नही कहा जाता और देह का नाम अन्नमय, क्रियावान् से भिन्न ही होता है; सो सबका रूप इन तीन बात मे सिद्ध होता है; सो आगे कहते हैं— प्राण से ले कर देह पर्यंत सब का स्वभाव एक जैसा नही किंतु भिन्न भिन्न माना गया है और अन्न से देह का कारण माना है इससे सिद्ध हुवा कि देह नित्य नही किंतु अनित्य है॥ इस प्रकार देह, मन और प्राण इन तीनों का पृथक् पृथक् रूप दिखलाया, सो इन सब से भिन्न ही जीवात्मा का स्वरूप है जो यह रूप न माने तो संसार मिथ्या ठहरता है इस से जो इन तीनों का ज्ञाता है, वही जीव चेतन कहा गया है॥ २८॥ अब देह के विषय मे यह कहते हैं— यद्यपि जीव का स्वरूप और देह का स्वरूप बहुत ही भिन्न है, तथापि विद्याभ्यास से यह सिद्ध होता है कि देह ही जीव का आश्रय है इसी देह विषे जीव रह कर कर्म करता है इस हेतु देह को कर्म की भूमि कहा गया है॥२९॥ 118