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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

साखी से क्या शिक्षा मिली?

कहना कि जब तक तुम्हारा उद्धार नहिं ! सो तुम्हारा जो पाप सो सब गया! यह सुनकर सबी लोगन को, जितिक लोग वहां हुते सब को मन बहुत प्रसन्न भया मानो के सबन को नया जिउ दिया वा मानो रंक को पारस मिल गया मानो के सब लोग नरक से स्वर्ग में गये सो इस साखी से क्या शिक्षा मिली? एक तो संसार सब पाप में भरा, दूसरा जो पाप में सो नर्क जाय ऐसा जो पाप सबन ऊपर सवार भया सब जन नरक में गिर गये सो गिरते गिरते, अब जो प्रभु ईसा मसी का नाम सुना मानो अमृत पिया, सो पाप मिट गया सो मानो नरक से स्वर्ग में गये, फिर पश्चात्ताप किया सब जन मुक्ति पाये! तिस लिये सब को भला काम सब को मन से करना सब जन मुक्ति पावैगे यह शिक्षा ली जानी अब सब जन मन शुद्ध मन से सुनो दूसरो जो वचन है सो सब बालकरूपन सब को सो इस वचन परमेश्वर सब जन को मन से सुनो सब जन! बालकरूप बालकरूप सब लोग भये? सो इस बात का मन में विचार न करो ऐसा जो सब लोग न भये; फिर यह न समझना अपना मन में जो हम लोग बालक तो नहिं बन सकते वा जो लोग बड़े हुवे सोई लोग तो ऐसा न समझो, बालकरूप रूप बालक सब लोग हो, .प्रभु का वचन सब जन मानो भला काम करो बालक जो सो बात सीखे सीखे, सब बात सीखे तो कहे, वा सीखे तो चले, सब बालक तो जहां सीखे तहां बालक चले सो कहे, बालक तो मन का सब भेद अपना बतलावे बालक का हृदय सदा निर्मल भया सो मन सदा काम करे बालक तो कपटी काम नहिं काम करे सो कपटी काम से सब दूरि रहो, कपटी काम जिसका हृदय भया सो क्या पावेगा? सब जन भला काम करो हां, यह जो संसार में सो अज्ञानता से, जिसका अज्ञान भया सो नरक को सो जाता है जो सो इस अज्ञानता को दूरि करो सो ज्ञान को करो सब लोगन कपट काम त्याग दो, कपट को मार दो, कपट काम नहिं करो; बालकरूप बनों सो बालकरूप काम सब लोग करो कपट सब हृदय से त्याग करो? पश्चात्ताप सब जन करो अपने पाप, जो पाप सो हृदय सब का सब को मारता, उस कपट को हृदय से त्याग करोगे? कपट को त्याग दो सब से प्यार सो करो, उस कपट को त्याग जो करोगे? --जिसके मन सब का प्यार निर्मल हो सब मन सब संसार का सो निर्मल रूप निर्मल हो कपट से दूर हो कपट को निकालो; जो पाप हो, सो सब को, प्रभु का जो ध्यान कर--जिसके सब पाप निर्मल भया निर्मल मन निर्मल सब जन करो, पश्चात्ताप सब जन पश्चात्ताप सब जन जो पाप हो! तिस लिये पश्चात्ताप सब जन पश्चात्ताप करो प्रभु से प्रार्थना कर, पश्चात्ताप करो--फिर सब, कपट को दूर कर, रो-रोकर प्रभु से दया की मांग करो प्रभु सब के पाप क्षमा करेगा सब जन को ज्ञान प्रभु न सिखाया, उस ज्ञान विचार के निर्मल हृदय सब जन करो ऐसा काम करो, कपट काम त्याग करो सब बालक बन जाओ प्रभु कहे, कपट तज कपट काम त्याग करो सब से मेल- जोल रखो कपट हृदय सब जन का मार सब जन पाप रूप कर सब जन जिसका हृदय कपट हो, सो नरक में जाता कपट काम त्याग करो सब जन, सो सब जन कपट रूप को त्याग के निर्मल, प्रभु से दया की प्रार्थना मांग के निर्मल हृदय बनो--सब जन प्रभु को, बालकरूप बनो, बालकरूप हो, बालक के मन छल नहिं सो उस जन को प्रभु दया करेगा सो दयालु परमेश्वर सब जन, दयालु रूप देखकर बालकरूप को दया करे, ज्ञान देगा सो ज्ञान पाके स्वर्ग को, सब जन प्राप्त हो सो, प्रभु का नाम, ईशवर, ईशवर का नाम स्मरण के रूप में सब जन, सो सो फल पाओ सब जनो! सो ईशवर-ईशवर का नाम नित्य नित्य बालकरूप बन पश्चात्ताप करेगा सो सब जन को ज्ञान पश्चात्ताप सब जन को ईशवर-ईशवर का नाम सब जन प्रभु को जपते रहो पश्चात्ताप प्रभु चरणन में नित्य सो तो सब बालकरूप रूप बनो नित्य जन सब सो प्रभु से दया पाओ प्रभु का ज्ञान 63

परमात्मा का सच्चा ज्ञान प्राप्त कर लेने पर जब जीवात्मा सब ओर सब में परमात्मा को देखता है तब, सर्वत्र अपने आत्म--स्वरूप रूप को सब ओर देखता हुआ जो सब तरफ अपने आत्म स्वरूप ब्रह्म को ही सब ओर देखता है अथवा जो प्रत्येक पदार्थ को अपने स्वरूप; आत्मा का ही रूप समझकर सब प्रकार संशय रहित निःसंदेह समस्त भूत अथवा प्राणी मात्र अपने ही परमात्मा को ही सब ओर सब में व्याप्त हुआ देखता हुआ, परमात्मा के दर्शन करता, उस समस्त जड़ वा चेतन संसार तथा प्रत्येक वस्तु को परमात्मा का रूप समझ कर उस परमात्मा को ही सब ओर देखता हुआ प्रत्येक को ही अपना रूप समझ कर सब में अपने आत्म भाव द्वारा सब को अपने ही तुल्य वा अपने रूप में ज्ञान कर लेता हुआ सब जगह अपने आत्म-भाव द्वारा सब में अपने को ही वा सब को अपने में व्यापक देखता, सब को अपने ही तुल्य जान कर; सबके प्रति यथायोग्य सुख वा दुःख के व्यवहार करता हुआ पश्चात् सब बातों तथा पदार्थों को सत्य, नित्य, चेतन एवं आनन्द रूप वा सर्वव्यापक को छोड़ कर किसी को भी अन्य भिन्न वस्तु को नहीं देखता हुआ जो सब ओर केवल परमात्मा देखता हुआ; सो जिस रूप में सब तरफ परमात्मा को देखता हुआ अन्य सब को उस परमात्मा की विभूति वा रूप समझता हुआ सब पदार्थों को ईश्वर व उस व्यापक परमात्मास्वरूप समझ कर परमात्मा के सिवाय अन्य कुछ भी सब ओर नहीं देखता हुआ सर्वत्र सब ओर केवल एक ही परमात्मा को सब ओर ही देखता हुआ सब ओर परमात्मा को ही व्यापक देखता हुआ कभी भी परमात्मा से अलग नहीं होता है और परमात्मा भी कभी भी उस जीवात्मा से भिन्न नहीं होता है। जैसे व्यापक आकाश सब ओर सब में सदा, वर्तमान ही सब तरफ सर्वव्यापक रूप में एक समान ही व्याप्त हो रहा है। घटपटादि सब पदार्थ उस आकाश में रहते हैं, आकाश कभी; सब में भी एक रस ही सदा ही व्यापक रहता हुआ सब में सर्व--सम भाव से, आकाश रूप ही, सब जगह घट में, सब जगह पट में; सब जगह भिन्न भिन्न सब पदार्थों रूप में समान रूप रहता, कभी भी उस व्यापक पदार्थ घट वा पट रूप में किसी से अलग नहीं, अलग रूप से नहीं जाना जाता। सो, सब ही पदार्थों को परमात्मा रूप ही सब ओर जानता, अपने आप ब्रह्म रूप को सब ओर व्यापक देखता हुआ जो सब ओर समता भाव देखता, कभी कभी परमात्मा रूप उस एक ही ब्रह्म रूप को सब जगह अलग अलग नहीं जानता; सो जिस समय जो जीवात्मा सब ओर सब में एक ही परमात्मा भाव को सब जगह समझ लेता है, सो परमात्मा के स्वरूप ज्ञान द्वारा, परमात्मा को कभी अपने स्वरूप से भिन्न, सब काल तथा सब ओर सदा सब में जान कर यथार्थ, आत्म-रूप समस्त जगत देखता। पश्चात् संसार के सब भावों को जानता हुआ जीवात्मा, केवल ब्रह्म ही सर्वव्यापक प्रत्येक भूत मात्र में एकत्व भाव धारण करता हुआ सब को एक समान ही सब में एक परमात्मा भाव देखता हुआ परमात्मा के साक्षात्कार स्वरूप ज्ञान को प्राप्त होता हुआ सब समय यज्ञादि क्रिया द्वारा सब प्रकार भोगों से विमुख हो कर उस ही ब्रह्म रूप में स्थित हो जाता हुआ सब में अपने भाव को धारण करता हुआ सब में एक ब्रह्म को धारण कर परमात्मा के स्वरूप में उस जीवात्मा द्वारा सदा सर्व--व्यापक सच्चिदानन्द रूप परमात्मा के साक्षात्कार को जीवात्मा द्वारा प्राप्त किया गया केवल परमात्मा के दर्शन कर, संशयवान पुरुष जिस प्रकार, अज्ञान अंधकार द्वारा सो, केवल संशय युक्त हो, संशय रूप, अविद्या, अज्ञान, भ्रम रूप केवल भ्रम युक्त संसारिक सुख भोग वासना रूप अनेक प्रकार अनेक प्रकार नाना प्रकार के दुःखों के भयानक दलदल में गिरता है? संशयशील सब ओर सब तरह नष्ट होता है, अविद्या अन्धकार अंधविश्वास अज्ञानता के वश हो संशयात्मा विनष्ट ही जीवात्मा, केवल जो सब ओर केवल एक मात्र ज्ञान को ही धारण कर के, जो ज्ञान द्वारा सब में उस केवल सत्य ब्रह्म, के नित्य रूप को देखता हुआ जीवात्मा ज्ञान द्वारा, केवल परमात्मा को जान कर सब ओर, आत्म-भाव जान कर, कभी किसी प्रकार भी ज्ञान अथवा उस ज्ञान द्वारा केवल परमात्मा के ज्ञान; सो सब ओर सदा केवल ही ज्ञान प्राप्त; उस ज्ञान द्वारा केवल ज्ञान को, ज्ञान-वान् ज्ञान-साधना से--सब सब ओर सब तरह से सब ही प्रकार के व्यवहार को करता हुआ केवल एक ब्रह्म भाव देखता हुआ सब ओर केवल उस परमात्मा को ही जान कर केवल एक ज्ञान द्वारा केवल ब्रह्म रूप परमात्मा साक्षात्कार ज्ञान द्वारा 64

हो, भरत को केवल न राज्य मिला और न ही केवल राज्य ही मिला किन्तु सब प्रकार विद्या की प्राप्ति अथवा केवल धन ही मिला और न ही केवल सम्पत्ति मिली किन्तु सब प्रकार आन्तरिक सम्पत्ति मिली तब तो महाराज जनकजी को जो शिक्षा दी गई उसके द्वारा कोई नई बात भरत नहीं पा रहे थे। अतः, उनकी ओर कोई ध्यान न देकर भी, जब श्री जनकजी एक बार प्रभु श्रीरामचन्द्र अथवा चित्रकूट धाम की ओर मुखातिब होकर खड़े हो रहे थे। जनक को केवल राज्य, या केवल धन वैभव ही नहीं मिला अपितु वे सच्चे ज्ञानी थे।, जनक की योग्यता, या ज्ञान सार्वभौमिकता का परिचय इस ही एक घटना द्वारा विश्वामित्र एवं श्री रामचन्द्रजी ने ज्ञान सागर जनक की परीक्षा ली थी, जिस समय विश्वामित्र ने श्री राम से कहा; हे सुजान राम, तुम धनुष तोड़ दो, क्योंकि जनक अपनी प्रतिज्ञा से दुःखी होकर बैठे हैं, तो न केवल राम ने न केवल धनुष को, प्रत्युत जनक को, अपनी विदेह अवस्था प्राप्त करवाकर हृदय में ही श्री राम रूप इष्ट देव को देख लिया जनक विदेहराज कहलाये गये--लेकिन हा, न तो केवल धनुष ही न केवल प्रत्युत स्वयं को, न जान सके तब प्रभु विश्वामित्र कृपा प्रसाद द्वारा जनक एक बार विश्वामित्रजी से यह प्रश्न कर बैठेकि यह धनुष क्या वस्तु जिसको तोड़ने का प्रयत्न अनेक विश्वामित्रों ने किया उस समय जनक केवल शिष्य थे! तब गुरु विश्वा ने विश्वामित्र ज्ञान दिया था, विश्वामित्र-जनक संवाद द्वारा ज्ञान रूप दीपक जला कर प्रभु के चरणों में न केवल तन से ही नमन किया अपितु जीवन समर्पण कर तो, भरत जी, विश्वामित्र की तरह सब कुछ जानकर भी ज्ञान रूपी दीपक से वंचित रहकर, केवल अपने गुरु को सब कुछ न दे पा, ज्ञान रूपी दीपक को प्रगट कर सके। तब जनक ने भरत को कहा था कि तुम सब कुछ जानते हो, सार्वभौम चक्रवर्ती राजा रूप जनक न केवल, अयोध्या के राज्य व्यवस्था प्रणाली तक केवल सीमित ज्ञान को ही सब कुछ न मान केवल अयोध्या नगरी तक ही ज्ञान सागर सीमित न कर राम कथा रूपी पावन गंगा को, भरत जीवन में सब समाया, केवल अयोध्या? अयोध्या तक ही राम के स्वरूप सीमित थे, भरत ज्ञान को इस ही स्वरूप में ही एक जन-जन का रूप दे, जन-जन तक राम कथा पहुंचाने का जो संकल्प था, सो वह पूरा हुआ क्योंकि राम के स्वरूप को, एक व्यक्ति विशेष तक सीमित नहि, सब तक ज्ञान रूपी गंगा पहुंचाने का ही तो राम ज्ञान का महत्व था जो ज्ञान प्रभु राम का था। जनकजी, विश्वामित्र, वशिष्ठ सभी जिस प्रकार ज्ञान रूपी गंगा को प्रवाहित कर रहे थे, उस गंगाजल! स्वरूप को जन जन तक पहुंचाने का जो विशेषाधिकार भरत को प्राप्त था उस ज्ञान का ही जनमानस रूप बन कर उभरे सो यह सब देख कर, जनक ने भरत के इस त्याग को देख कर उस त्याग रूप को देखकर जब कहा कि यह सब कुछ ज्ञान के रूप स्वरूप में सब कुछ, केवल ज्ञान से ही सम्भव हो सका था, ज्ञान मात्र से ही सब कुछ संभव नहीं हो सकता यदि ज्ञान के साथ त्याग न हो तो ज्ञान को सब कुछ नहीं कहा जा सकता था ज्ञान के त्याग रूपी भाव से सब कुछ था; ज्ञान- रूपी व तन के मन के हर एक भाव से-मन रूपी यह जनमानस सब कुछ ज्ञान रूपी गंगा के प्रभाव से संभव बना था, ज्ञान के द्वारा प्राप्त ज्ञान से अधिक, उस ज्ञान का त्याग भाव सब कुछ संभव बना रहा था। ज्ञान, ज्ञान रूपी, या ज्ञान प्रकाश सब को सब कुछ त्याग से प्राप्त होता है अन्यथा तो केवल अंधकार ही सब ओर छाया रहता । जनक, उस त्याग के स्वरूप को देखकर ज्ञान स्वरूप में आश्चर्यचकित भाव से विस्मित हो रहे थे कि एक बालक सब कुछ त्याग, उस त्याग व विदेह के स्वरूप को सब प्रकार व स्वरूप में प्राप्त करके सब को त्याग, समर्पण की भावना का उदाहरण देकर स्वयं खड़ा, भरत स्वरूप में जनमानस जनक को यह सब देखकर लगा, जो ज्ञान वह स्वयं धारण किए हुए थे अथवा जिस ज्ञान को वे सब कुछ मान कर बैठे जनक विदेह कहलाए थे, उस ज्ञान का स्वरूप व महत्व क्या? तो वह ज्ञान मात्र ज्ञान ही था, ज्ञान मात्र ज्ञान न रहा, वह ज्ञान तो उस ज्ञान के स्वरूप महत्व को सब कुछ त्याग देता--था, सो! ज्ञानरूपी स्वरूप ज्ञान ज्ञान का अहसास ही सम्पूर्ण जन जन-जन तक व्याप्त हो चुका था कि एक ओर, जनकजी के ज्ञानरूपी साम्राज्य में सम्पूर्ण ज्ञान, सब कुछ भर कर न रूप व स्वरूप केवल ज्ञान मात्र ज्ञान द्वारा ज्ञान स्वरूप में समाया हो? तब यह सब 65

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Below is the line-by-line transcription of the visual content as presented:

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सच्चिदानंद परमात्मा को नमस्कार होवे! इनके सहाय से प्रथम संस्कार विषय का विचार आगे किया जाता है? संसार में जितने पदार्थ, सब एक परमाणु से लेकर वा अनेक कार्य रूप होके वा आगे परिणाम को पावेंगे, सब एक परमाणु रूपी मूल ही से बने, वा परमात्मा ही सब जगत् को उत्पन्न वा संहारक वा पालक सर्वेश्वर कर्त्ता--धर्त्ता सबीका सर्व काल शरीरी! वो निराकार निरंजन, सर्वान्त--र्यामी सबका ही पालक! सृष्टिकर्त्ता वो अजन्मा प्रकाश, सर्वशक्ति दयावन्त ज्ञानमय, सबके ही मन बीच, व्यापिक सार! सो आप विचार कीजिए, वा सर्वान्तर्यामी रूप जान कर, अंतरात्मा से भय करो जी; अंतरात्मा रूप ही तुम रहो, अपनी आत्माको मत रोको; अंतरात्मा सब बातों का ज्ञान रूप, अपनी आत्माको जानो! संसारी जो मनुष्य सब परमेश्वर की आज्ञापालक प्रजावत् वो उस परमेश्वर पिता रूपके ही स्वरूप प्रजापालक सब एक समान प्रजावत् ही जाने परन्तु परस्पर सब मनुष्यन के ही वा अपने आत्मारूप ज्ञान प्रमाण होकर कोई भी अपने को वा पराई आत्मा सन्तान ही, अपने समान प्रजावत् सबको समझे ऐसा कभी भी परस्पर में ही दुःख ना उपजे संस्कार सो, अपने समान आत्माके सुख विषय दुःख ना ही कभी उपजे पिता वा माता वा अन्य वा अन्य सम्बन्धी के; सर्वकाल पिता ही सन्तान सुख को, सब संस्कार कर्म जान, विद्यावान् करके ही सब संस्कार कर्म जान अपने समान वा पर को भी, जो कि वो वा अपने संग सदाकाल संगी रहे; पराये सर्वकाल सुख से युक्त सब जन को वा सन्तान, सब काल ही, पिता की आज्ञा--का पालन योग्य सदा संसारी सब मनुष्यन को सब तरह से भी, अपने मन वचन से भी सब जन को सब सुख सन्तान विषय सदा काल जान कर सुख देवे, अपने सब को सब प्रकार सब सुख सर्व काल ही वा दुःख नाशक सुख दाता हो? ऐसा सर्वकाल जान अपने पिता रूप ही सदा रहे और जो कोई मनुष्य उत्तम विद्या वा वा जान के अन्य को देवे, अन्य पिता वा माता समान सुख भी, उत्तम ज्ञान सब विषय प्रमाण ही जान के सुख देवे सो उत्तम जन ही, उत्तम पिता ही; अपने माता वा वो जन, विद्या--दान का दाता, अन्य ज्ञान सब जान पिता रूप ही जान, वा वो उत्तम दाता ही; अन्य जन को वा जो ज्ञान देकर सन्मार्ग में चलाने वाला ही सब जन का पिता, सो अन्य सब जनका उत्तम पिता हो! संसारी सन्तान के पालक सब माता और पितावत् वा प्रजावत्, जो जन वा संस्कार विद्या सन्तान जान वा विद्यावान्--विद्यावती वा सन्तान सब जन वा सन्तान--सम्बन्धी वा पालक सब जन को उत्तमता से ही सन्तान को, गुणवान् करे, सो सब जगत् के सन्तान सब जन को सुख सम्बन्धी हो; जिस जन को विद्या वा संस्कार रूप उत्तम ज्ञान ना उपजा सो सब जन कैसे वा सन्तान उत्तम होवे, जब कि सन्तान को ज्ञान श्रेष्ठ ना होवे? जिस प्रकार से ही जैसा जन शिक्षा पा के सो सब जन बने; जिस जन पिता वा मां जैसा स्वरूप वा गुण संग जैसा बालक पा के सब प्रकार सब ही सो जन हो जाय, सो ही सब जन जाने; अपनी सन्तान को जैसा चाहेगा, वैसा ही जन बनायेगा ज्ञान से, जैसा कि सब प्रकार विद्यावान् सब जन जान सकता है? इसके बाद सब ही जान लेवे, जैसा कि वो विद्या ज्ञान ना--होने देकर वा ना जानेगा वो अपने समान मूर्ख ही बने, सब प्रकार सब जन ज्ञान रूप अभ्यास सब करे; अपना हित जान के; सब विद्या जान कर सब जन ब्रह्मचर्य-ब्रह्मचारिणी होकर विद्यावान् सब ही सन्तान सब प्रकार सब जन को सदा ज्ञान प्रकाश करे! सो वो सब जन ही सुख पा के सदा जन का हित जाने; पिता का ज्ञान सब ही बालक सब को जान के सदा सब जन ज्ञान दाता हो--कर सदा सुख ही दे। सो, वो ही जान ले जो कि सब जगत्, सब सन्तान, वा पिता प्रजावत् सबही सन्तान के जान कर सर्व जगत् में अपने सब प्रकार सब प्रकार का जानेगा; सब जन सदा काल सब जन प्रजावत् जाने, वो ही सब प्रकार से सब जन अपने वा अन्य सन्तान सब प्रकार के सब को अपने ही समान वा अन्य ज्ञानवान् सब को वा ही जाने, वो विद्या के प्रकाश विद्यावान् सब प्रकार विद्यावान् जान के, अपनी सन्तान सब जन को सदा ज्ञान सब देवे, सब काल 69

विचार करो कि जिस समय मनुष्य अ--विद्वान् था उस समय भी सत्य ही बोलता था जब कोई विद्या उसको अ--सिखाई, जिससे वह सत्य बोलता था; जिसने सत्य रचा उसी सत्य स्वरूप का यह उपदेश; सत्य स्वरूप न हो तो संशय; सत्य स्वरूप ही का यह सत्य वेद का उपदेश; सत्य स्वरूप परमात्मा का ही यह उपदेश अब यह संशय रह गया जिस समय किसी भाषा अथवा मनुष्य की उत्पत्ति ही नहीं हुई विद्या सिखाई किसने जो सत्य बोले अथवा सत्य जाने अथवा जो उपदेश ही किस बात का? हे भाई, हे सज्जनो, हे मित्र, हे विचार--वान्, जिससे यह सब हुआ उसने क्या विद्या न दिया जब कि स्वरूप ही प्रकाश का स्वरूप तेज का, जिसने आत्मा को प्रकाश किया अ--विद्या सब निवृत्त कर के अन्तःकरण में यह उपदेश, कि सब सत्य जानो न विद्या न आत्मा का ज्ञान न स्वरूप यह ईश्वर सब विद्या-प्रकाश स्वरूप का अन्तर्यामीस्वरूप परमात्मा विद्यमान था सो यह विद्या-प्रकाश किया, जिससे यह जाना व माना कि वह सब विद्या का भी प्रकाशक जिसने सब को बनाया वह सब सब विद्या जान ही सकता था, विद्या रचा, प्रकाश रचा; जिससे कि सब ज्ञान का सो सब वेद रचा सो सर्वशक्ति का यह ज्ञान, सो शक्तिवान् जिस को विचार प्रकाश सब में विचार दिया सो सर्व शक्तिवान् विद्या का प्रकाशवान् सब का प्रकाश विद्या का सो ईश्वर को सत्य ही जान सो, जिसने यह भी रूप रच कर विद्या प्रकाश सब किया सो? ईश्वर सब प्रकाशक; जिस का तेज प्रकाशमान सब का तेज रचा; जिस की शक्ति स्वरूप से सब रूप का तेज रचा; चराचर-परमेश्वर जिस का यह स्वरूप ही सत्य अ--द्वैत परमात्मा जग रचयिता सब विद्या प्रकाशक सर्वव्यापक सब विद्या सब सत्य प्रकाश सब आत्मा स्वरूप जिसने यह आत्मा प्रकाशमान; जिसने परात्पर स्वरूप जगत् रचा सो ईश्वर सत्य; परमात्मा स्वरूप सत्य सो, सो सब प्रकाशक जगत् का, सो सब अन्तर्यामी सब अ--द्वैत सत्य जग का रचा! सो सब जगत् रच अ--द्वैत सत्य रूप जग रचा! ईश्वर का उपदेश सब को, जो सत्य का, उपदेश, जिसने सब बनाया, जिस रूप का प्रकाशवान् रचा, जिसको सब विधि सब रीति सब अ--द्वैत सत्य विद्या सब रचा! सो सत्य का प्रकाश सो ही, सत्य ही सत्य उपदेश रचा? जिसका यह उपदेश! जो सत्य स्वरूप का ही प्रकाश सब विचार सत्यस्वरूप सत्य का ही स्वरूप ही प्रकाशवान् ज्ञान दाता सब ही का विचार सब विद्या सब प्रकार सब प्रकाश जग का प्रकाशक रचा विद्या सब का रूप रचा, सो विचार दिया, विद्या रूप विचार ही सत्य का ज्ञान सब ईश्वर का प्रकाश ज्ञान का सब रचयिता का अन्तर्यामी रचा; जिस का ज्ञान सब सत्य का ज्ञान सो सब रचा सो, सो विचार सब विद्या सब ईश्वर का ज्ञान, परमात्मा ही सत्य का तेज रचा सो प्रकाश सब का तेज रचा सो, सो ईश्वर सर्व ज्ञानवान्-सच्चा ज्ञान सब रूप जग का प्रकाश रूप का विचार सब का ज्ञान विचार सब में दिया विद्या-प्रकाश सब में विचार ही प्रकाश का रचा, सो विचार था, सब रूप का तेज रच अ--द्वैत विद्या रचा, विद्या सत्य रचा! सब रूप विचार रूप का रचा सो? ईश्वर का रचा सो रूप-सत्य जगत् सब का विद्या सत्य विचार का विचार विद्या विचार सब रचा सो? सत्य विचार का उपदेश, सत्य विचार का रचा! सत्य जान सब विचार प्रकाश का सत्य जगत्-रचा सो! सत्य विचार का रचा! सत्य का प्रकाश रचा जब विद्या सब ज्ञान सब रूप का रचा सब विद्या, ज्ञान रूप का ही सो ज्ञानवान् सत्य ही सब रूप का सो परमात्मा का रचा सत्य विद्या--रूपी का प्रकाश उपदेशक रचा; जिससे कि सब उपदेश रचा, उपदेश रचा! जिस का रूप-सत्य रचा सो, ज्ञानवान् ज्ञान अ--द्वैतवान् रचा! जग-प्रकाश रचा जगत् सत्य रचा, विद्या का प्रकाश रचा, जिसका सो विद्या अ--द्वैतवान्! विद्या रचा परमेश्वर जिसने सब का रूप विद्या रचा सो ज्ञानवान् का रूप का रूप, विद्या रचा, ज्ञान- दाता रूप न जो जग-रूपी रूप विद्या रचा रचा सो परमात्मा रूप न परमात्मा; सो सब प्रकाशवान् ज्ञान विद्या रूप में रचा सो, जो कि सब ज्ञान रूप विद्या का ही ज्ञानवान् सब जग का विद्या रचा ज्ञान रूप सो, ज्ञानवान् रचा सो, रूप रचा विद्या रचा सो सब विद्या रचा रचा रूप परमात्मा रूप सो सब का रूप रचा सो? सो ज्ञान का तेज विद्या रूप सो सब ज्ञान रूप का ही प्रकाश का रूप रचा ज्ञान का रचा सो जग सब प्रकाशक सो, सत्य ही रूप का रचा 70

इस कारण प्रभु नाम, प्रभु रूपके जप और ध्यान रूप पुरुषार्थ को तो सब कोई कर सकते हैं। विचार ही से साधनसाध्य सब गुण प्रगट हो जाते हैं। विचार ही से जीव का विचारवान् पद हो कर संशय निवृत्त होता है, भ्रम नष्ट होता है; भय का डर दूर हो कर संशय रहित हो कर जीव सुख रूप आनन्द को प्राप्त होता हुआ निज रूप स्वरूप होता है॥ अब विचार का साधन बताते हैं। प्रथम जिस बात को विचारेगा उस पर ही मन को थिर कर लेवे, अन्य संकल्प त्याग देवे, अन्य संकल्पों को त्याग करके जो मन एक बात पर थिर होगा तभी ही तो उस बात सम्बन्धी विचार सिद्धान्त हृदयङ्गम हो कर मन को निज स्वरूप आनन्द पद को प्राप्त करा सकेगा और मन विमल होकर सब ओर ज्ञान प्रकाश ही को देखेगा और फिर एकान्त स्थानमें बैठ कर मनकी चञ्चलताको त्याग कर विचार रूप ध्यान करे, एकचित्तता चित्त को ठहरा करके सदा सत्संग और सत्शास्त्र अनुशीलनपूर्वक विचार करता रहना चाहिये; और सन्तजनकी संगति, सन्मुख हो कर सब बात विस्तार पूर्वक पूछे॥ जैसे गृहस्थी अपने काम पर तो ध्यान रख कर सावधानी से यत्नवान् रहता है, अपनी कार्यकुशलता द्वारा अपने सब काम सुधारता है। सत्कार्योपयोगी वस्तुओं को एकत्र करता है? व्यापार चतुराई, समय देख कर, सावधानी, युक्ति, बुद्धि द्वारा विचार कर मन में निश्चय करके जो काम आरम्भ करेगा? उस का फल अवश्य भलाई ही होगा। इसी प्रकार से विचार रूप मन की लग्न लगा कर यथार्थ साधनके नियम को, गुण को जानकर उस बात रूपी विद्या को ग्रहण कर के यत्न से उस साधन द्वारा अपने मन एकाग्रता से जो विचार मन को थिर करेगा तो? इस अभ्यास से विचारवान् का चिन्तनीय रूप जो मन सत्स्वरूप हुआ, उसही का ध्यान रूप मन रूप हो गया। इससे परे दूसरा कोई साधन नहीं॥ अब विचार करो, विचार द्वारा मन से ही यह सारा जगत् दृश्यमान हो कर भास रहा है। विचार ही स्वरूप रूप से दृष्टि रूप हो कर रहा; सो तो विचार रूप स्वयं आप ही रहा न? किस लिये कि; यथार्थ रूप विचार से स्वयं ही सब ओर प्रकाश दृष्टि गोचर हो रहा है न? विचार ही द्वारा सब कुछ दृश्य से अदृश्य और अदृश्य से सब दृश्य बना, दृश्य को त्याग कर के सत्स्वरूप प्रकाशको सब ओर देख कर, अपने स्वरूप रूप सत्य विचार से सब कुछ लय होता देख कर यथार्थतः सर्वव्यापी प्रकाश सच्चिदानन्द रूप प्रकाश ही को स्वयं जान कर सब ओर व्यापक अपने रूप प्रकाश रूपको ही देख रहा॥ हां, विचार रूप सब प्रकाश का नाम ही यथार्थ है, उस नाम को ही सब जप कर लेते हैं; सो रूप तो मन रहा, सो यत्न सब हुआ; तो फिर मन का लय कैसे हो? इस से विचार रूप को ही तो नाम रूप करके स्मरण ही करना ही सब काम बनता है। केवल स्मरण यत्नशीलता से ही तो मन लीन होता है; सो ध्यान का रूप विचार द्वारा ही तो सिद्ध हो सकता है॥ अब इस पर विचार करके देखो कि, विचार से ध्यान न स्वरूप हुआ॥ नाम का अभ्यासी पुरुषार्थ से स्मरण द्वारा जब मन को थिर करके नाम का ध्यान स्वरूप रूप-रङ्ग प्रकाशादि रूप देखा, यथार्थतः जो ध्यान स्वरूप लय स्वरूप प्रकाश का साक्षात्कार हुआ, तो सो रूप प्रकाश रूप हो कर स्वयं प्रकाशवान् स्वरूप प्रकाश स्वरूप से सम्बन्ध को पाकर लय हो कर नाम रूप लय--हो गया। इससे तो विचार रूप ज्ञान का साधन रूप ही तो सिद्ध हुआ; केवल ध्यान रूप नाम का स्मरण द्वारा प्रकाश का ध्यान करने से सब का लय साक्षात्कार न हुआ; केवल नाम रूप ही सब का लय कारण साधन न हुआ, केवल ही न हुआ मन, विचार द्वारा ही नाम का मन में ध्यान रूप लय, यथार्थतः ध्यान ज्ञान से स्वरूप प्रकाश का प्रकाश रूप साक्षात्कार रूप में प्राप्त रूप सब सत्यमय हुआ॥ स्मरण रूप का साधन द्वारा मन का ध्यान तो हो सकता रूप ध्यान द्वारा ज्ञान की प्राप्ति विचार से ही, सो विचार रूप ही तो सब का मूल कारण स्वरूप हुआ कि जिस से यत्न द्वारा विचार ज्ञान से ही प्रकाश साक्षात्कार-रूप सब... में ही प्रकाश पाया गया--कि जिस बात से सन्देह दूर, सब भ्रम निवृत्त हुआ! इस कारण से नाम ध्यान से ज्ञान का स्वरूप हुआ, विचार से स्वरूप प्रकाश का सो तो सब ओर ज्ञान रूप ही हो कर प्रकाश में स्वरूप ज्ञान का ध्यान ज्ञान ही का प्रकाशक ज्ञान ही स्वरूप, सब ओर ज्ञान ही हुआ॥ 71

श्यामा का मनपसन्द भोजन, उसका मनपसन्द पहरावा और, उसका अधिक समय अपने कमरे में--सब कुछ उसका अपना था और इन बातों पर किसी का कोई अधिकार नथा, लेकिन उसका प्रत्येक कार्य किसी अन्य, विशेषकर रानी जी की आज्ञा! यह बात कभी उस अनाथ कन्या की समझ में नहीं आई कि रानी अधिकार का प्रयोग केवल कठोर भाषा तक सीमित क्यों रखती हैं और, इस सब बातों पीछे वास्तविक रूप किसका है अथवा उसका क्या स्वरूप? यह रानी का केवल ढोंग मात्र था? किन्तु यदि यह सब ढोंग मात्र होता, श्यामा को क्या लाभ पहुँचा हाय री अभागिनी! रानीजी इस प्रकार का व्यवहार क्यों कर रही हैं यह समझ पाना श्यामा की बुद्धि से परे था, विशेषकर उस परिस्थिति मेंजब श्यामा; किसी को मुंह दिखाने योग्य नथी, रानीजी नेउस समय अपना विशाल अन्तःकरण खोलकर रख दिया था। उस समय वह रानीजी की विशालता तथा उदारता की तुलना अपनी सास की संकीर्णता से किये बिना न रह सकी। वह बारम्बार रानीजी की ओर देख रही थी कि रानीजी की बातों मेंउसे कहीं छल-कपट दिखाई दे लेकिन जब कभी भी श्यामा नेरानीजी को देखा, रानीजी केचेहरे पर कठोरता थी; रानीजी की वाणी मेंव्यंग्य, कटुताएवं ईर्ष्या-द्वेष था; वह रानीजी सेकांपती थी! उस समय वह सोच रही थी कि हे प्रभु, रानीजी केअन्तर्मन मेंक्या भरा हुआ हैतथा यह सब नाटक वेक्यों कर रही हैं। श्यामा, यह सब सच तो मान नहीं सकती थी कि कोई उसकी सेवा इस प्रकार भी कर सकता हैकि स्वयं कष्ट सहकर भी सामनेवाले को आराम दिया जाए। ऐसा दयालु भाव तो केवल श्यामा केमाता-पिता अथवा देवेन्द्र का हो सकता था। वह श्यामा को सांत्वना देनेकेलिए उसकी सास केविषय मेंगलत विचार प्रकट करती; उस समय श्यामा को यह विचार भी आया कि हेभगवान्! यह संसार भी क्या केवल धोखा है? या मनुष्य का नाम कपटी प्राणी है? वास्तव में छल-कपट करना ही इसका स्वाभाविक गुण हैतथा मानव हृदय मेंदया-धर्म नाम का कोई अंश नहीं? क्या सब लोग ऐसे ही हैं! क्या सब संसार ही छल-कपट का ही रूप मानकर जी रहाहै? श्यामा रानीजी की ओर देख कर आश्चर्य सेस्तब्ध मात्र होकर बैठी-बैठी सब कुछ देख रही थी; रानीजी नेसारे विषय को व्यंग्य मेंक्यों बदल दिया? वह स्वयं अपराधिन की तरह सिर झुकाये, अपराधी की तरह रानीजी की बात सुन रही थी। रानीजी का भाषण जारी था, "और हाँ! तुम्हारा स्वास्थ्य तो ठीक रहता हैना, तुम्हारी दवाई समयपर पहुँच जाती होगी। तुम्हारी देखरेख मेंतो कोई कमी नहीं रहती? यदि नौकरानी सेकोई शिकायत हो तोबतलाना तथाहाँ, तुम यह सारी दवाइयाँ समय पर पीती हो ना? मुझे सच बताना? रानीजी श्यामा केउत्तर की बाट नजोहते हुए, अपना सिर हिलाकर वहां सेचलती बनी। उन दोनों महिलाओं का यह एक ऐसा नाटक था, जिसे वे स्वयं समझती, पर वे दोनों नहीं, श्यामा अपनी इस सास की सांत्वना को स्वीकार करनेकेलिए बाध्य नहोकर भी विवश थी... ! श्यामा आश्चर्यचकित होकर सास की ओर देख रही थी कि यह उस महिला का रूप कैसेहो सकता हैजो श्यामा केलिए कभी विष की गांठ बनी हुई थी। वह श्यामा को अपनेरास्तेका कांटा समझ कर उस पर नित्य नयेअत्याचार किया करती थी। श्यामा रानीजी केइस छल-कपट पूर्ण व्यवहार को देखकर सिर पकड़ कर बैठ गई। उसका सिर चकराने लगा। वह समझ नहीं पा रही थी कि वह अपनेजीवन मेंकहां सेआकर कहां फंस गई है। यह सब क्या नाटक हो रहा है, रानीजी नेश्यामा की ओर मुंह करके मुस्कुरा कर कहा, श्यामा अब तुम सो जाओ; सब समय सिर पर व्यर्थ की चिन्ताएं मत सवार रखो! श्यामा सोच रही थी कि रानीजी का हृदय कितना कोमल हैअथवा रानीजी का यह केवल दिखावा मात्र है--क्या रानीजी सचमुच बदली? अथवा केवल नाटक? श्यामा को इस बात का आश्चर्यथा, कि जिन सासने जीवनभर उसेएक मीठा शब्द नबोला, वह आज उसके साथ मीठी बातेंकर रही थी। वह सास जिसने श्यामा को कभी बहू रूप मेंस्वीकार नहीं किया था वह आज श्यामा को 'मेरी बहू' कहकर पुकार रही थी, जिस सास ने श्यामा को कभी अपनेकमरे मेंपैर भी नहीं रखनेदिया था, वही सास आज श्यामा केकमरे मेंआकर उसके स्वास्थ्य की चिन्ता कर रहीथी, जिसको देखकर श्यामा कांप उठती थी, वही सास आज श्यामा को प्रेमपूर्वक सहला रही थी! यह सब श्यामा को समझ नहीं आ रहा था, सच क्या थाऔर झूठ क्या, यह वह समझ नहीं पा रही थी। यह सब देखकर श्यामा आश्चर्य-चकित थी! वह स्वयं अपनेआपको कोस रही थी कि उसने सास को कभी प्यार क्यों नहीं किया। उसने रानीजी को क्यों नहीं पहचाना! वह रानीजी केचरणों मेंगिरकर अपनेअपराधों की क्षमा मांगना चाहती थी, पर हिम्मत नहीं जुटा सकी! यह सोच कर श्यामा का हृदय भर आया था कि हेप्रभु, श्यामा क्या कर रही है? उसने तो आज तक अपनी सास को अपना समझकर प्यार ही नहीं किया। इस विषय मेंश्यामा का दोष नथा। सास नेश्यामा केलिए कभी प्यार नहीं दर्शाया; यह सोच कर श्यामा अपने-आपसे लज्जित हो रही थी; श्यामा रानीजी केबारे मेंसोच कर अपनेको कोसती हुई बैठी थी। श्यामा विचारमग्न थी, कि 72

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□□ □□ □□□□ □□□, □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□; □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□; □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□! □□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□-□□□ □□ □□□□ □□□□□□□□, □□□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□; □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□, □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□□, □□□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□□, □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□, □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □ □□ □□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□□□□ □□ □□ □□; □□□□ □□□□-□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□, □□□□□□□ □□□□ □□□□-□□□□ □□? □□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□--□□□□□□□□! □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□, □□□ □□□ □□; □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□-□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□, □□-□□ □□□ □□ □□□□□□□□! □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□; □□□□□ □□□ □□□□ □□, □□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ 74

□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □ □□□□ □□□□ □ □□□□, □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□, □□□□□ □ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□, □□□□ □□□□ □ □□□□ □□□□□ □□□□□□□ □□□, □□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□□, □□□□□□ □ □□□□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□, □□□ □□□□□□□ □□□□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□, □□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□, □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□, □□□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□□ □□□□□□□ □ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□, □□□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□, □□ 0.00 ; □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□, □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□; □□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□, □□ □□□□□□ □□□; □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□, □□□ □□ □□□□□ □□□, □□ □□□□□ □□□; □□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□, □□ □□□□□□ □□, □□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□□, □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□, □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□? □□ □□□□□□□□ □□□□□□ □□□ □ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □ □□□; □□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□, □□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□ □□ □□□□ □□; □□□□□ □□□□□ □□□□□ □□ □ □□□□□□, □□□□ □□□□□□ □ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□ □□ □□□□ □□; □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□; □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□ □ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□, □□□ □□□□ □□; □□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□; □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □ □□ □□□□□□, □□□□□□□□ □ □□□□□□□, □□□□□ □ □□□□, □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □ □□□□□□, □□□ □ □□□□□□□, □□□□□ □□□ □ □□□□□□, □□□□□ □□□ □ □□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□-□□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□, □□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□, □□□□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□; □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□, □□ □□□ □□□□□□ □□□, □□□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□□, □□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□-□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□; □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □ □□□□□ □□□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□□□, □□□□□□□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□! □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□, □□□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□, □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□! □□□□ □ □□□□ □□□□ □ □□□□, ... 75

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□□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□, □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□□□□, □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□, □□ □□□□□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □ □□, □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□--□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□? □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□, □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□? □□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□, □□□□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□-□□□ □□□, □□□□□□, □□□□□□□ □□□□□ □ □□□? □□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□, □□□□ □□ □□□□ □□□! □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□□! □□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □ □□□, □□□ □□□□□ □ □□□□ □□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□ □ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□? □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□, □□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□; □□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□, □□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□; □□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□□□, □□□ □□□□□ □□□□ □□; □□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□; □□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□, □□□□ □□ □□□ □□□□; □□□□□□□ □□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□, □□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □ □□, □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□, □□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □ □□□□, □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□-□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□, □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□; □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□, □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□, □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□; □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□-□□□□ □□□□□ □□□ □□; □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□, □□□□□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□, □□□□ □□; □□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□, □□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □ □□□□ □□ □□□□□ □□□□, □□ □□□□ □□ □□□□□□□, □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□□, □□□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□, □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□□□ □□□□□□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □ □□□□ □□□□ □ □□□□, ... □ □□□ □□□ □□□□□, □ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□--□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□, □□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□- □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□, □□□□□ □ □□□□ □□□□ □□□□ □ □□□□ □□□ □□□□□, □ □□□□ □□□ □□□□□; □ □□□ □□□ □□□□□ □□□, □□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□-□□□□□□; □□□□, □□□□ □□□□□□, □□□□ □□□□- 77

□□□□ □□□□□□-□□□□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□-□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□, □□□□, □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□; □□□ □□□□ □□□□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□□□, □□□ □□□ □□□□□□□□□ □□□, □□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□, □□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□, □□□ □□ □□□ □□□, □□□ □□ □□□ □□□, □□ □□□□□□□□ □□ □□□, □□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□, □□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □ □□□ □□ □□□□ □□, □ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □ □□□□ □□□□ □ □□□□, ... □ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□, □ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□? □□□ □□□□□ □□□ □□□□, □□□ □□□□; □□ □□□□□ □□□ □□□□□, □□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□□□, □□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□, □□□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□; □□□□□ □□□ □□□□, □□□□ □□□□ □□! □□ □□□ □□□□, □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□-□□□ □□□ □□ □□□ □□□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□, □□□□ □□□□□, □□□□ □□□□□□□□□, □□□□ □□□□□ □□□□, □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□ □□□ □□, □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□, □□ □□--□□□□□□ □□ □□□, □□□□□ □□□□! □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□, □□□□□□! □□□□□ □□□□□□ □□□□□-□□□□□ □□□□□; □□□□ □□□□□□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□□□ □□□□, □□□□ □□□□; □□□□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□□, □□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□; □□□□□□ □□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□; □□□□□ □□□□; □□□□□ □□□□; □□□□□□□□ □□□□□□□□□ □□ □□□□□, □□□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□? □□□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □ □□□ □□□□□□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□! □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□? □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□! □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□, □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□; □□□□ □□□□□ □□□□, □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□□; □□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□, □□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□, □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□! □□□□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□; □□□□□ □□□□! □□□ □□□□□ □ □□□, □□□ □□□□ □□□ □ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□□□ □□ □□--□□□□ □□□□□□ □□--□□□ □□□□□ □□, □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□, □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□, □□□□□ □□□, □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□, □□□□□□-□□□ □□ □□□ □□□□, □□□□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□, □ □□□ □□ □ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□? □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□? □□□□ □□□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□? □□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□, □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□--□□□□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□□! □□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□□□ □□ □□, □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□□ □ □□□□□, 78

▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯-▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯-▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯; ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯; ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯ ▯▯▯▯-▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯; ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯? ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯! ▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯; ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯; ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯--▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯! ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯; ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯? ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯... ! ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯; ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯... ▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯; ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯? ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯! ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯! ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯? ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯? ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯-▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯! ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯; ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯-▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯; ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯-▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯-▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯!

अवश्य ही इसका परिणाम यह हो कि मनुष्य अंधा हो जाय! वैयक्तिक स्वार्थ बढ़ता जायगा; इसका प्रभाव सब क्रियाकलापपर पड़ता जाय विचार की परंपरा असीम विस्तार-क्षेत्रवाली होने और क्रियाकलाप सीमित होने से मस्तिष्क तथा हृदय दोनों पर ही प्रभाव का आधिक्य रहता हुआ यह सब कुछ केवल मानसिक क्रियाकलाप बनकरही वैयक्तिक जीवनकी सीमा में बंधकर संकुचित रह जायगा और वैयक्तिक संकीर्णता बढ़ायगा जो स्वयं व्यक्तिवादी सभ्यता बनकर विश्व शांतिमें बाधक नहोगी क्या? इस वैयक्तिक क्रियाशीलता का प्रभाव यदि अन्य किसी दिशा अभिमुख नहोजायगा तो, वह प्रभाव केवल एक इस ओर क्रियाशीलताको विकृत करनेवाला-- मात्र होगा; उसका वैयक्तिक क्रियाकलाप आवश्यकता से कम और वह विचार की ओर बहुत अधिक प्रभाव डाले सकेगा। विचार क्रिया का स्वरूप स्वयं बन जायगा आवश्यकता के कम रूप में उपस्थित होकर अपने रूपमें? केवल इस विचारमें विश्वास रखकर नहीं केवल इसपर ही सब कुछ छोड़ देना व्यर्थ होगा मस्तिष्कपर भार अधिकताका, यह उचित क्रियाशीलताका! यह समाज-रचना, इसका विकास नहीं; विकास नाम तो व्यक्ति अथवा समाजकी उस सब क्रिया शक्तिमें निहित क्रिया रूप विकास-शक्तिका उपस्थित होनाहै, जो केवल विचारमें नहीं; केवल विचारशक्तिके ही रूप द्वारा नहीं क्रियाशीलता का भी, कार्य को क्रियान्वितकरके ही जो समाज को इस स्थितिमें लाने का कारण बनेगी शक्ति, जिससे स्वतः उसका रूप ही यह क्रियात्मकतापर आधारित क्रियात्मकता ही रूप हो इस वैयक्तिक क्रियाका भी जो समाज को इस स्थिति की ओर ले जायगी जिस दिशा में विचार और यह रूप दोनों ही रह सकेंगे और समाज स्वयं एक ऐसे रूप में उपस्थित हो सके जिसकी क्रिया का यह विचार वैयक्तिक क्रियाकलाप की समानता और सहयोगपर आधारित बना रहेगा, तभी वह स्वतः न रहकर समाजकी सेवाका रूप बनसकेगा तो, जहां वैयक्तिक रूप का क्रियाकलाप मस्तिष्कपर ही अधिकताका प्रभाव डाले रहने की आवश्यकता होगी, वैयक्तिक क्रियाकलाप का स्वरूप स्वतः कम आवश्यकता लिये हुए, वैयक्तिक क्रियाकलाप उस रूप ओर रूपमें रूप धारण कर सकेगा जो समाज की ओर जानेवाले क्रियाकलाप का कारण बन सकने योग्य केवल इतना ही नहीं कि केवल विचार का प्रभाव केवल मस्तिष्कपर ही सीमित रहेगा; केवल विचारमें? फिर उसका प्रभाव व्यक्ति स्वयं पर प्रभाव डाले बिना क्रिया रूपमें क्यों न होगा? केवल मस्तिष्कपर ही प्रभाव का परिणाम तो विचार का यह रूप स्वरूप होगा ही, मस्तिष्क स्वयं विकृत होकर रहेगा ही, जिसका असर सब क्रियापर पड़े बिना न रह सकेगा जो केवल विचारपर ही बल देते रहकर वैयक्तिक क्रियाशीलताको संकुचित बनाते हैं; इस रूपकी क्रियाशीलता समाज को स्वस्थ रूप देनेमें समर्थ हो सके क्या? इसका तो रूप ही इस रूप में समाज बनकर सामने आवेगा, जो केवल एक ऐसे समाज का रूप बना सकेगा जो विचार, विचार, सब कुछ सोच और समझ तो सकता हैपर करनेके समय शिथिल होकर केवल उस रूप में केवल एक विचार बन जायगा, जिसे केवल विचार ही कहसकेंगे; कोई रूप क्रिया का नहीं होगा क्रिया व्यक्ति को क्रियाशील बनकर रूप देगी, व्यक्ति का विचार जब क्रिया का रूप ले; तब विचार सफल होगा ही, विचार मस्तिष्कपर कोई विकृत भार डालनेमें असमर्थ ही रहेगा और समाज-रचना, व्यक्ति अथवा रूप संबंधी सब क्रिया को स्वतः सफल बनानेमें समर्थ हो ही सकेगा। जब क्रिया स्वयं समाजके स्वरूप में निर्मित होती रहेगी और यह रूप समाज को स्वतः एक नया जीवन प्रदान करेगा जो व्यक्ति तथा उस समाजके परस्पर संबंधपर ही नहीं, वैयक्तिक तथा सामाजिक दोनों क्रियाओंके इस रूप और क्रियाशीलताको भी स्वस्थ रूप प्रदान करेगा, जिससे यह विचार; केवल मस्तिष्कपर भार ही न बनकर रह जाय केवल न रहकर, जब स्वतः समाजका रूप बनकर, नया स्वरूप; समाजको रूप की सहायता इन दोनों रूप क्रियात्मक और विचारात्मक जिनका मस्तिष्कपर प्रभाव पड़ता है। यदि केवल एक तरफका प्रभाव ही इन दोनों शक्तियोंपर पड़ा तो समाज विकृत बनजायगा और! केवल क्रिया एक विकरालता लेवेगी; या तो केवल विचार क्रिया शक्तिहीन रूप में समाज को बनायगा जिससे केवल शून्य रहेगा; क्रिया शून्य हो, जन-बल केवल विचारपर ही आधारित रह जाय तो समाज केवल विचारके ही आधार समाज का रूप बन जायगा, जिससे समाज का रूप और क्रिया दोनों नष्ट होकर ही, व्यक्तित्व केवल एक विडंबना वैयक्तिक रूप और उस क्रियाकलाप का जो क्रियाशीलता को रूप देवे, वह केवल हो; न तो केवल विचारात्मक भार क्रियाकी क्रियाशीलताको नष्ट ही करने पावे आवश्यकता का रूप यदि सब कुछ होने लगे तो न केवल एक व्यक्ति, न केवल एक मस्तिष्कपर, सब कुछ भार बनकर समाप्त होगा

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यद्यपि वह साधन केवल ध्यान स्वरूप साधन था, इसलिए उसके द्वारा सिद्ध होने वाला फल भी केवल मन की ही सीमा तक बना रहा, पर जो साधक-साधना का रस, रस का रहस्य जानता नहीं था, उसे ध्यान स्वरूप साधना का स्वरूप न समझ, केवल सांसारिक दृष्टि से उसके लाभ या स्वरूप समझना ही पर्याप्त न समझ, उसकी सत्यता सिद्ध करने हेतु प्रमाण मांग ही बैठा? वह प्रमाण क्या मांग बैठा केवल यह प्रमाण नहीं, चमत्कार स्वरूप ही मांग पर बैठा जिस रूप से ज्ञानियों, संतों का विश्वास उठता; पर जो सच्चे थे, स्थिति के ज्ञाता, स्वरूप ज्ञाता, साक्षात्कार भाव-युक्त मन की गति ज्ञाता, स्वयं मन ज्ञाता या स्वरूप मन ज्ञाता, पर जब वह सत्य का ज्ञाता, स्वरूप ज्ञाता, ज्ञान का पूर्ण ज्ञाता था उसने तो जान ही लिया न वह केवल ज्ञान के रूप को सत्य ही जानने वाला, उसे तो रूप का प्रमाण साक्षात्कार ही रूप में देना होगा जो रूप स्वयं देखना चाहता था? इसका तो यह अर्थ हुआ भक्तराज प्रह्लाद को ज्ञान पूर्ण था, ज्ञान रूप का भी ज्ञान था; ज्ञान का रूप केवल ज्ञान सीमा तक ही रहा यह जानकर ही उसने ज्ञान दिया, प्रभु तो सब घट में वास है; कश्यप तो ज्ञान रूप शब्द को, या उस शब्द स्वरूप लाभ को? शब्द के स्वरूप लाभ को समझ न सका इसलिए उसका ज्ञान रूप लाभ केवल शंका रूप में बना रहा, जिस रूप से उसका वह ज्ञान था; केवल रूप ही ज्ञान रूप का वास या वास का रूप ही ज्ञान रूप लाभ समझ लिया जाता क्या? सब कुछ सत्य रूप में प्रकट हुआ? ऐसा क्यों रूप का वास केवल ध्यान के रूप को समझकर ही ज्ञान का रूप माना गया, इससे वह साध्य रूप से सिद्ध न हो सका, इससे सब साधन व्यर्थ कहलाने लगा, जब तक ध्यान, साधन रूप स्वरूप ज्ञान का यह सत्य न ज्ञान में पूर्ण रूपमयी था, प्रह्लाद ने इस रूप का रस-रूप देखा समझा हिरण्यकश्यप तो इस रूप के प्रभाव को नहीं जान रहा था इसलिए उसने पूछा कि तू जो कहता रहा कि सब में ज्ञान, सब दिशा सब काल-दिशा का वास है तो बता कि यह जो, प्रह्लाद ज्ञान का साधन है या तू जो समझता है, या केवल यह प्रह्लाद का ज्ञान ही सब का वास जानकर समझ रहा, यह सोच कर सब का रूप ज्ञान का वास रूप समझ रहा था केवल प्रह्लाद ज्ञान का ही, इसी रूप जान कर ही यह सब में केवल ज्ञान स्वरूप वास रूप को जान रहा था रूप का स्वरूप ज्ञान, ध्यान स्वरूप का ज्ञान था, इससे कश्यप जान नहीं सका स्वरूप ज्ञान रूप ज्ञान रूप हुआ ज्ञान रूप का जो ज्ञान स्वरूप रूप का ज्ञान समझ सकता जो ज्ञान का वास केवल ध्यान रूप में ही था वह रस-रूप तो बन रहा था पर, इस रस का रूप, रस का वास, रस का ज्ञान, रस का साधन, सब कुछ जो ज्ञान था... तो वह सब तो प्रह्लाद रूप साधन समझ रहा, पर कश्यप कैसा! प्रह्लाद सब का प्रमाण था? सब का साधन रूप ज्ञान था? कश्यप अज्ञान रूप साधन रूप का साधन रूप में ही यह ज्ञान था, कैसा? जब वह, ज्ञान ऐसा समझता था, तो बता, कहां, कहां भगवान है? या तो इस खंभे में भगवान है? सब ओर, चारों ओर, जिस खंभे में तूने देखा! तो बता सब का रूप, प्रभु, जो सब प्रह्लाद का स्वरूप बन कर वास कर रहा है सब में सब रूप बनकर! प्रह्लाद क्या समझ रहा? ज्ञान स्वरूप रस, स्वरूप के रस साधन किया! या तो ज्ञान ही सब कुछ था, सब ज्ञान रूप वास का वास रूप सब रस का वास था; पर केवल ज्ञान रूप ज्ञान का वास रूप ज्ञान में ही था, ज्ञान रूप का प्रभाव साक्षात्कार का रूप! ज्ञान स्वरूप रूप का रस, ज्ञान स्वरूप का वास था! जब उस का वास दिखा तो, वह ज्ञान रूप साधन कैसे बन रहा? या तो प्रह्लाद का केवल ज्ञान रूप वास ही था सब, इसका रस कैसा था? केवल ज्ञान रूप सब मन का वास स्वरूप ही रहा या रस रूप का प्रभाव न था इसलिए ज्ञान रूप वास रूप हुआ जिससे वास काल-दिशा ज्ञान रूप प्रभाव के प्रभाव से यह सब साधन रूप ज्ञान का प्रभाव बना; इसलिए प्रह्लाद का यह साधन ज्ञान था, प्रह्लाद के इस साधन द्वारा सब साधन सिद्ध रूप हुआ था, जब वह कश्यप द्वारा पूछा गया; प्रह्लाद सब प्रकार सब ओर से? प्रह्लाद सब ज्ञान स्वरूप रूप रहा? कश्यप सब प्रकार क्या समझा? या तो वह भी ज्ञान स्वरूप ही ज्ञान रूप समझ, जो ज्ञान के सब सत्य स्वरूप प्रकार सब रूप बना जिससे उसका ज्ञान प्रभाव स्वरूप हुआ ज्ञान रूप हुआ सब ज्ञान का स्वरूप रूप बनकर प्रगट हुआ जिससे कश्यप रूप ज्ञान सब मन का विश्वास हो गया जिससे ज्ञान रूप सब वास हो कर, जो ज्ञान के सब स्वरूप द्वारा सब घट में था, वह 82