भारतकोश
अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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हो, भरत को केवल न राज्य मिला और न ही केवल राज्य ही मिला किन्तु सब प्रकार विद्या की प्राप्ति अथवा केवल धन ही मिला और न ही केवल सम्पत्ति मिली किन्तु सब प्रकार आन्तरिक सम्पत्ति मिली तब तो महाराज जनकजी को जो शिक्षा दी गई उसके द्वारा कोई नई बात भरत नहीं पा रहे थे। अतः, उनकी ओर कोई ध्यान न देकर भी, जब श्री जनकजी एक बार प्रभु श्रीरामचन्द्र अथवा चित्रकूट धाम की ओर मुखातिब होकर खड़े हो रहे थे। जनक को केवल राज्य, या केवल धन वैभव ही नहीं मिला अपितु वे सच्चे ज्ञानी थे।, जनक की योग्यता, या ज्ञान सार्वभौमिकता का परिचय इस ही एक घटना द्वारा विश्वामित्र एवं श्री रामचन्द्रजी ने ज्ञान सागर जनक की परीक्षा ली थी, जिस समय विश्वामित्र ने श्री राम से कहा; हे सुजान राम, तुम धनुष तोड़ दो, क्योंकि जनक अपनी प्रतिज्ञा से दुःखी होकर बैठे हैं, तो न केवल राम ने न केवल धनुष को, प्रत्युत जनक को, अपनी विदेह अवस्था प्राप्त करवाकर हृदय में ही श्री राम रूप इष्ट देव को देख लिया जनक विदेहराज कहलाये गये--लेकिन हा, न तो केवल धनुष ही न केवल प्रत्युत स्वयं को, न जान सके तब प्रभु विश्वामित्र कृपा प्रसाद द्वारा जनक एक बार विश्वामित्रजी से यह प्रश्न कर बैठेकि यह धनुष क्या वस्तु जिसको तोड़ने का प्रयत्न अनेक विश्वामित्रों ने किया उस समय जनक केवल शिष्य थे! तब गुरु विश्वा ने विश्वामित्र ज्ञान दिया था, विश्वामित्र-जनक संवाद द्वारा ज्ञान रूप दीपक जला कर प्रभु के चरणों में न केवल तन से ही नमन किया अपितु जीवन समर्पण कर तो, भरत जी, विश्वामित्र की तरह सब कुछ जानकर भी ज्ञान रूपी दीपक से वंचित रहकर, केवल अपने गुरु को सब कुछ न दे पा, ज्ञान रूपी दीपक को प्रगट कर सके। तब जनक ने भरत को कहा था कि तुम सब कुछ जानते हो, सार्वभौम चक्रवर्ती राजा रूप जनक न केवल, अयोध्या के राज्य व्यवस्था प्रणाली तक केवल सीमित ज्ञान को ही सब कुछ न मान केवल अयोध्या नगरी तक ही ज्ञान सागर सीमित न कर राम कथा रूपी पावन गंगा को, भरत जीवन में सब समाया, केवल अयोध्या? अयोध्या तक ही राम के स्वरूप सीमित थे, भरत ज्ञान को इस ही स्वरूप में ही एक जन-जन का रूप दे, जन-जन तक राम कथा पहुंचाने का जो संकल्प था, सो वह पूरा हुआ क्योंकि राम के स्वरूप को, एक व्यक्ति विशेष तक सीमित नहि, सब तक ज्ञान रूपी गंगा पहुंचाने का ही तो राम ज्ञान का महत्व था जो ज्ञान प्रभु राम का था। जनकजी, विश्वामित्र, वशिष्ठ सभी जिस प्रकार ज्ञान रूपी गंगा को प्रवाहित कर रहे थे, उस गंगाजल! स्वरूप को जन जन तक पहुंचाने का जो विशेषाधिकार भरत को प्राप्त था उस ज्ञान का ही जनमानस रूप बन कर उभरे सो यह सब देख कर, जनक ने भरत के इस त्याग को देख कर उस त्याग रूप को देखकर जब कहा कि यह सब कुछ ज्ञान के रूप स्वरूप में सब कुछ, केवल ज्ञान से ही सम्भव हो सका था, ज्ञान मात्र से ही सब कुछ संभव नहीं हो सकता यदि ज्ञान के साथ त्याग न हो तो ज्ञान को सब कुछ नहीं कहा जा सकता था ज्ञान के त्याग रूपी भाव से सब कुछ था; ज्ञान- रूपी व तन के मन के हर एक भाव से-मन रूपी यह जनमानस सब कुछ ज्ञान रूपी गंगा के प्रभाव से संभव बना था, ज्ञान के द्वारा प्राप्त ज्ञान से अधिक, उस ज्ञान का त्याग भाव सब कुछ संभव बना रहा था। ज्ञान, ज्ञान रूपी, या ज्ञान प्रकाश सब को सब कुछ त्याग से प्राप्त होता है अन्यथा तो केवल अंधकार ही सब ओर छाया रहता । जनक, उस त्याग के स्वरूप को देखकर ज्ञान स्वरूप में आश्चर्यचकित भाव से विस्मित हो रहे थे कि एक बालक सब कुछ त्याग, उस त्याग व विदेह के स्वरूप को सब प्रकार व स्वरूप में प्राप्त करके सब को त्याग, समर्पण की भावना का उदाहरण देकर स्वयं खड़ा, भरत स्वरूप में जनमानस जनक को यह सब देखकर लगा, जो ज्ञान वह स्वयं धारण किए हुए थे अथवा जिस ज्ञान को वे सब कुछ मान कर बैठे जनक विदेह कहलाए थे, उस ज्ञान का स्वरूप व महत्व क्या? तो वह ज्ञान मात्र ज्ञान ही था, ज्ञान मात्र ज्ञान न रहा, वह ज्ञान तो उस ज्ञान के स्वरूप महत्व को सब कुछ त्याग देता--था, सो! ज्ञानरूपी स्वरूप ज्ञान ज्ञान का अहसास ही सम्पूर्ण जन जन-जन तक व्याप्त हो चुका था कि एक ओर, जनकजी के ज्ञानरूपी साम्राज्य में सम्पूर्ण ज्ञान, सब कुछ भर कर न रूप व स्वरूप केवल ज्ञान मात्र ज्ञान द्वारा ज्ञान स्वरूप में समाया हो? तब यह सब 65