अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
पृष्ठ 64, कुल 183 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरमात्मा का सच्चा ज्ञान प्राप्त कर लेने पर जब जीवात्मा सब ओर सब में परमात्मा को देखता है तब, सर्वत्र अपने आत्म--स्वरूप रूप को सब ओर देखता हुआ जो सब तरफ अपने आत्म स्वरूप ब्रह्म को ही सब ओर देखता है अथवा जो प्रत्येक पदार्थ को अपने स्वरूप; आत्मा का ही रूप समझकर सब प्रकार संशय रहित निःसंदेह समस्त भूत अथवा प्राणी मात्र अपने ही परमात्मा को ही सब ओर सब में व्याप्त हुआ देखता हुआ, परमात्मा के दर्शन करता, उस समस्त जड़ वा चेतन संसार तथा प्रत्येक वस्तु को परमात्मा का रूप समझ कर उस परमात्मा को ही सब ओर देखता हुआ प्रत्येक को ही अपना रूप समझ कर सब में अपने आत्म भाव द्वारा सब को अपने ही तुल्य वा अपने रूप में ज्ञान कर लेता हुआ सब जगह अपने आत्म-भाव द्वारा सब में अपने को ही वा सब को अपने में व्यापक देखता, सब को अपने ही तुल्य जान कर; सबके प्रति यथायोग्य सुख वा दुःख के व्यवहार करता हुआ पश्चात् सब बातों तथा पदार्थों को सत्य, नित्य, चेतन एवं आनन्द रूप वा सर्वव्यापक को छोड़ कर किसी को भी अन्य भिन्न वस्तु को नहीं देखता हुआ जो सब ओर केवल परमात्मा देखता हुआ; सो जिस रूप में सब तरफ परमात्मा को देखता हुआ अन्य सब को उस परमात्मा की विभूति वा रूप समझता हुआ सब पदार्थों को ईश्वर व उस व्यापक परमात्मास्वरूप समझ कर परमात्मा के सिवाय अन्य कुछ भी सब ओर नहीं देखता हुआ सर्वत्र सब ओर केवल एक ही परमात्मा को सब ओर ही देखता हुआ सब ओर परमात्मा को ही व्यापक देखता हुआ कभी भी परमात्मा से अलग नहीं होता है और परमात्मा भी कभी भी उस जीवात्मा से भिन्न नहीं होता है। जैसे व्यापक आकाश सब ओर सब में सदा, वर्तमान ही सब तरफ सर्वव्यापक रूप में एक समान ही व्याप्त हो रहा है। घटपटादि सब पदार्थ उस आकाश में रहते हैं, आकाश कभी; सब में भी एक रस ही सदा ही व्यापक रहता हुआ सब में सर्व--सम भाव से, आकाश रूप ही, सब जगह घट में, सब जगह पट में; सब जगह भिन्न भिन्न सब पदार्थों रूप में समान रूप रहता, कभी भी उस व्यापक पदार्थ घट वा पट रूप में किसी से अलग नहीं, अलग रूप से नहीं जाना जाता। सो, सब ही पदार्थों को परमात्मा रूप ही सब ओर जानता, अपने आप ब्रह्म रूप को सब ओर व्यापक देखता हुआ जो सब ओर समता भाव देखता, कभी कभी परमात्मा रूप उस एक ही ब्रह्म रूप को सब जगह अलग अलग नहीं जानता; सो जिस समय जो जीवात्मा सब ओर सब में एक ही परमात्मा भाव को सब जगह समझ लेता है, सो परमात्मा के स्वरूप ज्ञान द्वारा, परमात्मा को कभी अपने स्वरूप से भिन्न, सब काल तथा सब ओर सदा सब में जान कर यथार्थ, आत्म-रूप समस्त जगत देखता। पश्चात् संसार के सब भावों को जानता हुआ जीवात्मा, केवल ब्रह्म ही सर्वव्यापक प्रत्येक भूत मात्र में एकत्व भाव धारण करता हुआ सब को एक समान ही सब में एक परमात्मा भाव देखता हुआ परमात्मा के साक्षात्कार स्वरूप ज्ञान को प्राप्त होता हुआ सब समय यज्ञादि क्रिया द्वारा सब प्रकार भोगों से विमुख हो कर उस ही ब्रह्म रूप में स्थित हो जाता हुआ सब में अपने भाव को धारण करता हुआ सब में एक ब्रह्म को धारण कर परमात्मा के स्वरूप में उस जीवात्मा द्वारा सदा सर्व--व्यापक सच्चिदानन्द रूप परमात्मा के साक्षात्कार को जीवात्मा द्वारा प्राप्त किया गया केवल परमात्मा के दर्शन कर, संशयवान पुरुष जिस प्रकार, अज्ञान अंधकार द्वारा सो, केवल संशय युक्त हो, संशय रूप, अविद्या, अज्ञान, भ्रम रूप केवल भ्रम युक्त संसारिक सुख भोग वासना रूप अनेक प्रकार अनेक प्रकार नाना प्रकार के दुःखों के भयानक दलदल में गिरता है? संशयशील सब ओर सब तरह नष्ट होता है, अविद्या अन्धकार अंधविश्वास अज्ञानता के वश हो संशयात्मा विनष्ट ही जीवात्मा, केवल जो सब ओर केवल एक मात्र ज्ञान को ही धारण कर के, जो ज्ञान द्वारा सब में उस केवल सत्य ब्रह्म, के नित्य रूप को देखता हुआ जीवात्मा ज्ञान द्वारा, केवल परमात्मा को जान कर सब ओर, आत्म-भाव जान कर, कभी किसी प्रकार भी ज्ञान अथवा उस ज्ञान द्वारा केवल परमात्मा के ज्ञान; सो सब ओर सदा केवल ही ज्ञान प्राप्त; उस ज्ञान द्वारा केवल ज्ञान को, ज्ञान-वान् ज्ञान-साधना से--सब सब ओर सब तरह से सब ही प्रकार के व्यवहार को करता हुआ केवल एक ब्रह्म भाव देखता हुआ सब ओर केवल उस परमात्मा को ही जान कर केवल एक ज्ञान द्वारा केवल ब्रह्म रूप परमात्मा साक्षात्कार ज्ञान द्वारा 64