अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइस कारण प्रभु नाम, प्रभु रूपके जप और ध्यान रूप पुरुषार्थ को तो सब कोई कर सकते हैं। विचार ही से साधनसाध्य सब गुण प्रगट हो जाते हैं। विचार ही से जीव का विचारवान् पद हो कर संशय निवृत्त होता है, भ्रम नष्ट होता है; भय का डर दूर हो कर संशय रहित हो कर जीव सुख रूप आनन्द को प्राप्त होता हुआ निज रूप स्वरूप होता है॥ अब विचार का साधन बताते हैं। प्रथम जिस बात को विचारेगा उस पर ही मन को थिर कर लेवे, अन्य संकल्प त्याग देवे, अन्य संकल्पों को त्याग करके जो मन एक बात पर थिर होगा तभी ही तो उस बात सम्बन्धी विचार सिद्धान्त हृदयङ्गम हो कर मन को निज स्वरूप आनन्द पद को प्राप्त करा सकेगा और मन विमल होकर सब ओर ज्ञान प्रकाश ही को देखेगा और फिर एकान्त स्थानमें बैठ कर मनकी चञ्चलताको त्याग कर विचार रूप ध्यान करे, एकचित्तता चित्त को ठहरा करके सदा सत्संग और सत्शास्त्र अनुशीलनपूर्वक विचार करता रहना चाहिये; और सन्तजनकी संगति, सन्मुख हो कर सब बात विस्तार पूर्वक पूछे॥ जैसे गृहस्थी अपने काम पर तो ध्यान रख कर सावधानी से यत्नवान् रहता है, अपनी कार्यकुशलता द्वारा अपने सब काम सुधारता है। सत्कार्योपयोगी वस्तुओं को एकत्र करता है? व्यापार चतुराई, समय देख कर, सावधानी, युक्ति, बुद्धि द्वारा विचार कर मन में निश्चय करके जो काम आरम्भ करेगा? उस का फल अवश्य भलाई ही होगा। इसी प्रकार से विचार रूप मन की लग्न लगा कर यथार्थ साधनके नियम को, गुण को जानकर उस बात रूपी विद्या को ग्रहण कर के यत्न से उस साधन द्वारा अपने मन एकाग्रता से जो विचार मन को थिर करेगा तो? इस अभ्यास से विचारवान् का चिन्तनीय रूप जो मन सत्स्वरूप हुआ, उसही का ध्यान रूप मन रूप हो गया। इससे परे दूसरा कोई साधन नहीं॥ अब विचार करो, विचार द्वारा मन से ही यह सारा जगत् दृश्यमान हो कर भास रहा है। विचार ही स्वरूप रूप से दृष्टि रूप हो कर रहा; सो तो विचार रूप स्वयं आप ही रहा न? किस लिये कि; यथार्थ रूप विचार से स्वयं ही सब ओर प्रकाश दृष्टि गोचर हो रहा है न? विचार ही द्वारा सब कुछ दृश्य से अदृश्य और अदृश्य से सब दृश्य बना, दृश्य को त्याग कर के सत्स्वरूप प्रकाशको सब ओर देख कर, अपने स्वरूप रूप सत्य विचार से सब कुछ लय होता देख कर यथार्थतः सर्वव्यापी प्रकाश सच्चिदानन्द रूप प्रकाश ही को स्वयं जान कर सब ओर व्यापक अपने रूप प्रकाश रूपको ही देख रहा॥ हां, विचार रूप सब प्रकाश का नाम ही यथार्थ है, उस नाम को ही सब जप कर लेते हैं; सो रूप तो मन रहा, सो यत्न सब हुआ; तो फिर मन का लय कैसे हो? इस से विचार रूप को ही तो नाम रूप करके स्मरण ही करना ही सब काम बनता है। केवल स्मरण यत्नशीलता से ही तो मन लीन होता है; सो ध्यान का रूप विचार द्वारा ही तो सिद्ध हो सकता है॥ अब इस पर विचार करके देखो कि, विचार से ध्यान न स्वरूप हुआ॥ नाम का अभ्यासी पुरुषार्थ से स्मरण द्वारा जब मन को थिर करके नाम का ध्यान स्वरूप रूप-रङ्ग प्रकाशादि रूप देखा, यथार्थतः जो ध्यान स्वरूप लय स्वरूप प्रकाश का साक्षात्कार हुआ, तो सो रूप प्रकाश रूप हो कर स्वयं प्रकाशवान् स्वरूप प्रकाश स्वरूप से सम्बन्ध को पाकर लय हो कर नाम रूप लय--हो गया। इससे तो विचार रूप ज्ञान का साधन रूप ही तो सिद्ध हुआ; केवल ध्यान रूप नाम का स्मरण द्वारा प्रकाश का ध्यान करने से सब का लय साक्षात्कार न हुआ; केवल नाम रूप ही सब का लय कारण साधन न हुआ, केवल ही न हुआ मन, विचार द्वारा ही नाम का मन में ध्यान रूप लय, यथार्थतः ध्यान ज्ञान से स्वरूप प्रकाश का प्रकाश रूप साक्षात्कार रूप में प्राप्त रूप सब सत्यमय हुआ॥ स्मरण रूप का साधन द्वारा मन का ध्यान तो हो सकता रूप ध्यान द्वारा ज्ञान की प्राप्ति विचार से ही, सो विचार रूप ही तो सब का मूल कारण स्वरूप हुआ कि जिस से यत्न द्वारा विचार ज्ञान से ही प्रकाश साक्षात्कार-रूप सब... में ही प्रकाश पाया गया--कि जिस बात से सन्देह दूर, सब भ्रम निवृत्त हुआ! इस कारण से नाम ध्यान से ज्ञान का स्वरूप हुआ, विचार से स्वरूप प्रकाश का सो तो सब ओर ज्ञान रूप ही हो कर प्रकाश में स्वरूप ज्ञान का ध्यान ज्ञान ही का प्रकाशक ज्ञान ही स्वरूप, सब ओर ज्ञान ही हुआ॥ 71