अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्यामा का मनपसन्द भोजन, उसका मनपसन्द पहरावा और, उसका अधिक समय अपने कमरे में--सब कुछ उसका अपना था और इन बातों पर किसी का कोई अधिकार नथा, लेकिन उसका प्रत्येक कार्य किसी अन्य, विशेषकर रानी जी की आज्ञा! यह बात कभी उस अनाथ कन्या की समझ में नहीं आई कि रानी अधिकार का प्रयोग केवल कठोर भाषा तक सीमित क्यों रखती हैं और, इस सब बातों पीछे वास्तविक रूप किसका है अथवा उसका क्या स्वरूप? यह रानी का केवल ढोंग मात्र था? किन्तु यदि यह सब ढोंग मात्र होता, श्यामा को क्या लाभ पहुँचा हाय री अभागिनी! रानीजी इस प्रकार का व्यवहार क्यों कर रही हैं यह समझ पाना श्यामा की बुद्धि से परे था, विशेषकर उस परिस्थिति मेंजब श्यामा; किसी को मुंह दिखाने योग्य नथी, रानीजी नेउस समय अपना विशाल अन्तःकरण खोलकर रख दिया था। उस समय वह रानीजी की विशालता तथा उदारता की तुलना अपनी सास की संकीर्णता से किये बिना न रह सकी। वह बारम्बार रानीजी की ओर देख रही थी कि रानीजी की बातों मेंउसे कहीं छल-कपट दिखाई दे लेकिन जब कभी भी श्यामा नेरानीजी को देखा, रानीजी केचेहरे पर कठोरता थी; रानीजी की वाणी मेंव्यंग्य, कटुताएवं ईर्ष्या-द्वेष था; वह रानीजी सेकांपती थी! उस समय वह सोच रही थी कि हे प्रभु, रानीजी केअन्तर्मन मेंक्या भरा हुआ हैतथा यह सब नाटक वेक्यों कर रही हैं। श्यामा, यह सब सच तो मान नहीं सकती थी कि कोई उसकी सेवा इस प्रकार भी कर सकता हैकि स्वयं कष्ट सहकर भी सामनेवाले को आराम दिया जाए। ऐसा दयालु भाव तो केवल श्यामा केमाता-पिता अथवा देवेन्द्र का हो सकता था। वह श्यामा को सांत्वना देनेकेलिए उसकी सास केविषय मेंगलत विचार प्रकट करती; उस समय श्यामा को यह विचार भी आया कि हेभगवान्! यह संसार भी क्या केवल धोखा है? या मनुष्य का नाम कपटी प्राणी है? वास्तव में छल-कपट करना ही इसका स्वाभाविक गुण हैतथा मानव हृदय मेंदया-धर्म नाम का कोई अंश नहीं? क्या सब लोग ऐसे ही हैं! क्या सब संसार ही छल-कपट का ही रूप मानकर जी रहाहै? श्यामा रानीजी की ओर देख कर आश्चर्य सेस्तब्ध मात्र होकर बैठी-बैठी सब कुछ देख रही थी; रानीजी नेसारे विषय को व्यंग्य मेंक्यों बदल दिया? वह स्वयं अपराधिन की तरह सिर झुकाये, अपराधी की तरह रानीजी की बात सुन रही थी। रानीजी का भाषण जारी था, "और हाँ! तुम्हारा स्वास्थ्य तो ठीक रहता हैना, तुम्हारी दवाई समयपर पहुँच जाती होगी। तुम्हारी देखरेख मेंतो कोई कमी नहीं रहती? यदि नौकरानी सेकोई शिकायत हो तोबतलाना तथाहाँ, तुम यह सारी दवाइयाँ समय पर पीती हो ना? मुझे सच बताना? रानीजी श्यामा केउत्तर की बाट नजोहते हुए, अपना सिर हिलाकर वहां सेचलती बनी। उन दोनों महिलाओं का यह एक ऐसा नाटक था, जिसे वे स्वयं समझती, पर वे दोनों नहीं, श्यामा अपनी इस सास की सांत्वना को स्वीकार करनेकेलिए बाध्य नहोकर भी विवश थी... ! श्यामा आश्चर्यचकित होकर सास की ओर देख रही थी कि यह उस महिला का रूप कैसेहो सकता हैजो श्यामा केलिए कभी विष की गांठ बनी हुई थी। वह श्यामा को अपनेरास्तेका कांटा समझ कर उस पर नित्य नयेअत्याचार किया करती थी। श्यामा रानीजी केइस छल-कपट पूर्ण व्यवहार को देखकर सिर पकड़ कर बैठ गई। उसका सिर चकराने लगा। वह समझ नहीं पा रही थी कि वह अपनेजीवन मेंकहां सेआकर कहां फंस गई है। यह सब क्या नाटक हो रहा है, रानीजी नेश्यामा की ओर मुंह करके मुस्कुरा कर कहा, श्यामा अब तुम सो जाओ; सब समय सिर पर व्यर्थ की चिन्ताएं मत सवार रखो! श्यामा सोच रही थी कि रानीजी का हृदय कितना कोमल हैअथवा रानीजी का यह केवल दिखावा मात्र है--क्या रानीजी सचमुच बदली? अथवा केवल नाटक? श्यामा को इस बात का आश्चर्यथा, कि जिन सासने जीवनभर उसेएक मीठा शब्द नबोला, वह आज उसके साथ मीठी बातेंकर रही थी। वह सास जिसने श्यामा को कभी बहू रूप मेंस्वीकार नहीं किया था वह आज श्यामा को 'मेरी बहू' कहकर पुकार रही थी, जिस सास ने श्यामा को कभी अपनेकमरे मेंपैर भी नहीं रखनेदिया था, वही सास आज श्यामा केकमरे मेंआकर उसके स्वास्थ्य की चिन्ता कर रहीथी, जिसको देखकर श्यामा कांप उठती थी, वही सास आज श्यामा को प्रेमपूर्वक सहला रही थी! यह सब श्यामा को समझ नहीं आ रहा था, सच क्या थाऔर झूठ क्या, यह वह समझ नहीं पा रही थी। यह सब देखकर श्यामा आश्चर्य-चकित थी! वह स्वयं अपनेआपको कोस रही थी कि उसने सास को कभी प्यार क्यों नहीं किया। उसने रानीजी को क्यों नहीं पहचाना! वह रानीजी केचरणों मेंगिरकर अपनेअपराधों की क्षमा मांगना चाहती थी, पर हिम्मत नहीं जुटा सकी! यह सोच कर श्यामा का हृदय भर आया था कि हेप्रभु, श्यामा क्या कर रही है? उसने तो आज तक अपनी सास को अपना समझकर प्यार ही नहीं किया। इस विषय मेंश्यामा का दोष नथा। सास नेश्यामा केलिए कभी प्यार नहीं दर्शाया; यह सोच कर श्यामा अपने-आपसे लज्जित हो रही थी; श्यामा रानीजी केबारे मेंसोच कर अपनेको कोसती हुई बैठी थी। श्यामा विचारमग्न थी, कि 72