अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार विचार करके वह उस वणिकपुत्रको घर ले आया। इसके बाद वह उस दिन रात भर अपने घरमें रहा और सबेरा होने पर उस वणिकपुत्रको ले राजाके पास पहुँचा। राजाके द्वारपर पहुँचकर उस पहरेदार ने सब बातें राजा से कह दीं। राजा, यह बात सुनकर कि उसने किसी पर स्त्रीका स्पर्श किया होगा और अपने मनमें पाप माना होगा, तभी यह मरना चाहता था, बहुत आश्चर्य चकित हुआ; इसलिए उस पर दया करके पहरेदार, सब बात राजा से विस्तार पूर्वक कह चुका तो राजाने पूछा कि तू सब समाचार विस्तार पूर्वक कह जिससे यह निर्णय किया जा सके कि अपराध का मुख्य कारण कौन है। पहरेदार ने कहा कि महाराज यह सब बात तो राजाके सामने कह चुका परन्तु यह व्यक्ति, जो अपनी इच्छासे मर, रहा अपने अपराधके कारण और अपने प्राणोंका उत्सर्ग कर, पाप धो रहा है यह राजा ही के योग्य बात है। राजा ने कहा कि इस प्रकार न केवल पहरेदार की प्रार्थना पर विचार किया न वरन् अपने न्याय की दृष्टि से विचार किया। इन सब बातोंको सुनकर राजा, सब कुछ जान लेने के बाद उस पर दया आ गई। तब राजाने पहरेदारको सत्कार पूर्वक उसके घर भेज दिया। उस घर आकर पहरेदार-पुत्र को, जो बहुत सुन्दर था, और सब प्रकार से रूपवान् था यह सब बात कह सुनाई। तब उस पहरेदार के पुत्रको उस स्त्रीका रूप; मन में विचार कर-करके शोक से सब काम धन्धे छोड़ दिये और वह वियोगके कारण रात दिन चिन्तामें ही डूबा रहने लगा। उस समय सब लोग इसके परिवार के सब लोग चिन्ता में, विह्वल हो कर इधर उधर फिर रहे थे। पर जब चिन्ता किसी तरह दूर न हुई तो अन्त में पहरेदार के पुत्रने चिन्ता से व्याकुल हो कर प्राण त्याग दिये। परिवार में शोक छा गया। तब उस समय पहरेदार का एक ही पुत्र होने के कारण उसका ऐसा दुःख हुआ, पहरेदार और पहरेदारनी ने रोते, पीटते हुए शव, चिता बना जलाना तय किया, और चितामें न जाने, जल जाने के बाद, उस पहरेदार ने भी, अपने जीवनको नष्ट करने के लिये, जो आग पहरेदारके लिये जलायी गयी थी उसी जलती चिता, पहरेदारने जलने वाले के पश्चात्ताप स्वरूप चितामें कूद कर प्राणोंका उत्सर्ग कर दिया। यह सब देखकर स्त्री ने सोचा। उसके बाद उस पहरेदार की स्त्री भी अपने स्वामी का देहान्त होने पर उनके साथ ही जल मरी। इसप्रकार पति का शव और पुत्र का शव दोनों को गोद में रख कर, स्वयं न जाने क्यों, जल कर भस्मसात हो गयी। इसके बाद उस पहरेदार की स्त्री के मरने का समाचार जब उस सुन्दर वणिक-कन्या को मालूम हुआ कि उसके कारण ही यह सब हुआ अर्थात् पति का वियोग पहरेदार पुत्रका मरण तत्पश्चात् माता व पिता दोनों का भी देहान्त उसने विचारपूर्वक यह सब सोच कर निश्चय किया, कि मैं ही सब पाप की मूल कारण हूँ इसलिए न केवल इस पाप का फल मुझे भी भोगना चाहिये अपितु इस अपराध में अपराधी समझकर मै भी, पतिव्रता के नियमों के साथ, उस अग्नि में कूद अपनी जीवनलीला समाप्त कर दूँ! तब वह भी उस आग में चिन्ताग्नि में कूद कर भस्म हो गयी। पहरेदार की स्त्री चिन्ताग्नि में उस प्रकार से जल, तो उस आग का कष्ट शांत हो गया। विक्रम बेताल से कहे! कि वणिकपुत्र वणिक की तो बात छोड़ इस प्रकार से, इनमें सब से बढ़ कर पापी कौन था। जिसने पहरेदार को इस प्रकार जीवन गँवाने दिया। इस बात का उत्तर मुझे शीघ्र ही दे, तब शव ने, इस प्रकार से फिर प्रश्न किया, जिस पर शव मुख से यह उत्तर आया कि इनमें पहरेदार का पाप अधिक था जिसने अपने प्राणोंको त्याग दिया, पर जो व्यक्ति विवेक हीन होता, उस पर इसका अधिक प्रभाव पड़ता पहरेदार का कर्तव्य था केवल अपनी पहरेदारी करना उस परिवारका नहीं। इसलिए पहरेदार सब पापों का मूल कारण था। इस प्रकार बेताल के वचन सुनकर महाराज विक्रमादित्य चुप हो गये और पेड़ की ओर चल दिए। बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। विक्रमादित्यने पूछा? --हे राजा! पहरेदार दोषी था, जिसने सब अपराध अपने सिर लिया, और केवल पहरेदार ही पापी था, क्योंकि राजा ने उसे इस पहरेदारी करने का काम दिया था और उसने वणिक पुत्र, राजा का अपमान! राजा उस पहरेदारको प्राणदण्ड दे सकता था। पहरेदार ने सब बातें न छिपाईं, इसलिए राजा ने उसकी जान बख्श दी। दूसरा पापी पहरेदारका पुत्र था, जिसने! पर स्त्रीके सौन्दर्यको देखकर प्राण दिए। राजाने पूछा कि वणिक पुत्र का क्या दोष, तो शव बेताल ने कहा कि, राजा न्याय सब प्रजा के लिये समान रूप से करता है। इसलिए इसका दोष; या सब पापों का मूल कारण केवल राजा ही था। राजा को पाप का फल भोगना ही होगा। इस प्रकार यह वार्तालाप समाप्त हुआ। 109